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5 रुपये में पेट भर खाने की योजना पर लगा ग्रहण

देश में भले ही एक रुपये से लेकर पंद्रह रुपये में भरपेट खाना खाने की हवाई बातें की जा रही हो, लेकिन झारखंड में ये हकीकत है कि आज भी यहां महज पांच रुपये खर्च कर आप भरपेट भोजन खा सकते हैं. लेकिन लगता है कि राज्य के गरीबों के कम खर्च पर भोजन का यह निवाला राज्य की नई सरकार के गले से नहीं उतर रहा है.

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देश में भले ही एक रुपये से लेकर पंद्रह रुपये में भरपेट खाना खाने की हवाई बातें की जा रही हो, लेकिन झारखंड में ये हकीकत है कि आज भी यहां महज पांच रुपये खर्च कर आप भरपेट भोजन खा सकते हैं. लेकिन लगता है कि राज्य के गरीबों के कम खर्च पर भोजन का यह निवाला राज्य की नई सरकार के गले से नहीं उतर रहा है. दरअसल सूबे की अर्जुन मुंडा सरकार ने 15 अगस्त 2011 को मुख्यमंत्री दाल-भात योजना के तहत एक महत्वाकांशी योजना की शुरुआत की थी, जिसमें गरीबों को महज पांच रुपये में दोपहर का भरपेट भोजन दिया जाता है. लेकिन इन दिनों इस योजना पर ग्रहण लगा हुआ है.

झारखंड में निजाम बदलते ही ऐसा लगता है कि सियासत का मिजाज भी बदल गया है. राज्य की महत्वाकांशी ‘मुख्यमंत्री दाल-भात योजना’ अब खटाई में है. ऐसे में इन केंद्रों में भोजन पा रहे गरीब अब शायद ज्यादा दिनों तक पांच रुपये में पेट भर भोजन नहीं पा सकेंगे. दरअसल मुंडा सरकार के हटते ही इस योजना में सब्सिडी में दिए जा रहे अनाजों से विभागीय अधिकारियों ने अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए हैं. अब हाल ये है कि खाने की थाली से सोयाबीन और चने तो गायब हैं और शायद आने वाले दिनों में एक रुपये किलो की दर से मिलने वाले चावल का भी टोटा पड़ जाए.

राज्य के 24 जिलों में करीबन 100 ऐसे केंद्र हैं जहां BPL परिवारों को पांच रुपये में 200 ग्राम चावल तथा दाल, सब्जी मुहैया कराया जाता है. लेकिन इनके संचालक इन दिनों काफी परेशानी में हैं. इसकी वजह है इन केंद्रों को सस्ती दर पर दिए जाने वाले अनाजों का मुहैया न होना. हाल ये है कि कई जगहों पर केंद्र बंद हो चुके हैं और कई बंद होने के कगार पर हैं. वैसे झारखंड के नए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मुताबिक दाल-भात योजना में क्या कमी रह गयी है उस पर विचार किया जा रहा है.

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बहरहाल, देशभर में कम पैसे पर भर पेट भोजन करने-कराने के तमाम तरह के दावे किये जा रहे हैं. देखना है कि गरीब राज्य झारखंड में बीजेपी सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना पर JMM-कांग्रेस की इस नयी सरकार का क्या रुख होता है. कहीं गरीबों का यह निवाला बीजेपी-कांग्रेस की सियासी तकरार की भेट न चढ़ जाए.

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