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DDC इलेक्शन: जम्मू-कश्मीर के इस छोटे चुनाव के क्या हैं 5 बड़े संदेश

आठ चरणों में हुए इस चुनाव में लड़ाई सिर्फ सियासत की नहीं थी. लड़ाई जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े मुद्दे की थी. बम, बारूद और गोली से दूर फ्री एंड फेयर इलेक्शन की थी. ये चुनावी लड़ाई बीजेपी और जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की पार्टियों के बीच सीधी टक्कर की थी. चुनाव नतीजों के आने के साथ ही इन सवालों का स्पष्ट जवाब जम्मू-कश्मीर की जनता ने दे दिया है.

जम्मू में जीत के बाद जश्न मनाते बीजेपी उम्मीदवार सुरेश कुमार (फोटो- पीटीआई) जम्मू में जीत के बाद जश्न मनाते बीजेपी उम्मीदवार सुरेश कुमार (फोटो- पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • राजनीतिक रूप से काफी अहम हैं डीडीसी चुनाव नतीजे
  • धारा 370 हटने के बाद राज्य में पहली बार हुए थे चुनाव

जम्मू-कश्मीर जिला विकास परिषद इलेक्शन के रिजल्ट के राजनैतिक मायने क्या हैं. चुनाव के नतीजों से जम्मू-कश्मीर का जो राजनीतिक परिदृश्य उभरता है उसे समझना जरूरी है. 

इस सिलसिले में सबसे पहले तीन सवालों को समझना जरूरी है. ये सवाल है कि क्या इस चुनाव के नतीजे अनुच्छेद 370 हटाने के केंद्र सरकार के फैसले पर रेफरेंडम है? क्या नतीजे ये बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर को 'गुपकार' कुबूल है? क्या BJP जम्मू-कश्मीर में वैकल्पिक ताकत के रूप में उभर रही है?

बता दें कि आठ चरणों में हुए इस चुनाव में लड़ाई सिर्फ सियासत की नहीं थी. लड़ाई जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े मुद्दे की थी. बम, बारूद और गोली से दूर फ्री एंड फेयर इलेक्शन की थी. ये चुनावी लड़ाई बीजेपी और जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की पार्टियों के बीच सीधी टक्कर की थी. चुनाव नतीजों के आने के साथ ही इन सवालों का स्पष्ट जवाब जम्मू-कश्मीर की जनता दे दिया है. 

जनतंत्र जिंदाबाद

अनुच्छेद 370 और 35 ए खत्म होने के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर में हुए इस चुनाव के परिणामों से जो सियासी तस्वीर उभरी है. उसका पहला संदेश ये है कि जम्मू-कश्मीर में जम्हूरियत की जीत हुई है. लोगों ने भारत के संविधान पर भरोसा जताया है. जो पार्टियां 370 की बहाली तक किसी चुनाव में शिरकत न करने का दंभ भर रही थीं जब डीडीसी चुनाव की घोषणा हुई तो उनके सामने वजूद बचाने का प्रश्न पैदा हो गयाा. जनता के सामने अपनी प्रसांगिकता साबित करने के लिए उन्हें भारतीय संविधान के दायरे में चुनाव में उतरना पड़ा.

कश्मीर में पहली बार कमल खिला

इसके अलावा इस चुनाव में पहली बार मुस्लिम बहुल इलाके में बीजेपी को तीन सीटों पर जीत हासिल हुई है. बीजेपी श्रीनगर, पुलवामा और बांदीपोरा में तीन सीटें जीती हैं. ये एक बड़े बदलाव का संकेत है. जम्मू क्षेत्र में बीजेपी 10 में से 6 जिलों में बहुमत हासिल कर चुकी है. यही नहीं बीजेपी का दावा है कि अगर सिंगल पार्टी के तौर पर देखा जाए तो वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.

गुपकार नंबर वन

इस चुनाव में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी थी तो दूसरी तरफ सात पार्टियों का गुपकार गठबंधन था, इस गठबंधन में नेशनल कॉन्फ़्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रैटिक पार्टी, पीपल्स कॉन्फ़्रेंस, CPI-CPIM, अवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस और जम्मू और कश्मीर पीपल्स मूवमेंट शामिल थीं. इसके अलावा कांग्रेस भी शुरुआत में इस गठबंधन के साथ शामिल थी, लेकिन बाद में अलग हो गई. डीडीसी चुनाव में गुपकार गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं. इसका बड़ा संदेश यह भी है कि उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती अभी भी यहां की सियासत में अपनी अहमियत बरकरार रखे हुए हैं.

उमर अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया कि अब अनुच्छेद 370 की बहाली को संघर्ष करने के लिए उनके पास जनादेश है.

निर्दलीय उम्मीदवारों का बोलबाला

इस चुनाव में इस बार बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है. बीजेपी का दावा है कि ये उम्मीदवार उसके साथ हैं. हालांकि पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि बीजेपी ऐसा कहकर निर्दलीय उम्मीदवारों को खरीदना चाह रही है.

पाकिस्तान को संदेश

डीडीसी चुनाव का एक संदेश हमारे पड़ोसी पाकिस्तान को भी है. पाकिस्तान ने इन चुनावों को डाउन प्ले करने, हिंसा भड़काने, आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने समेत कई हरकतें कीं. लेकिन जम्मू कश्मीर की जनता ने पाकिस्तान को दो टूक संदेश दे दिया कि कश्मीर को अलगाव और आतंक का एजेंडा नहीं विकास का एजेंडा चाहिए.

 

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