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सूरत में फूड स्कैम! लॉकडाउन में खाना खिलाने वाली संस्थाओं को करोड़ों का भुगतान

आरटीआई के जवाब में सूरत महानगर पालिका ने कहा कि शहर की कई समाजसेवी संस्थाओं ने लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों और जरूरतमंदों को भोजन वितरण किया था, जिसका बिल चुकाया गया है, अभी और चुकाना बाकी है. 

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लॉकडाउन के दौरान जरूतमंदों को भोजन वितरण किया जा रहा था (फाइल फोटो-पीटीआई)
लॉकडाउन के दौरान जरूतमंदों को भोजन वितरण किया जा रहा था (फाइल फोटो-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सूरत महानगर पालिका से वसूले गए हैं पैसे
  • एक आरटीआई के जवाब में हुआ खुलासा
  • कुछ गड़बड़ हुई होगी तो जांच करेंगेः मेयर

लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों और जरूरतमंदों को खाना खिलाकर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटने वाले कई समाजसेवी सूरत महानगर पालिका से करोड़ों वसूल चुके हैं और अभी और वसूलना बाकी है. इसका खुलासा खुद सूरत महानगर पालिका ने एक आरटीआई का जवाब देकर किया है. फिलहाल इस मामले में कांग्रेस ने जांच की मांग की है.

आरटीआई के जवाब में सूरत महानगर पालिका ने कहा कि शहर की कई समाजसेवी संस्थाओं ने लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों और जरूरतमंदों को भोजन वितरण किया था, जिसका बिल चुकाया गया है, अभी और चुकाना बाकी है. वहीं, आरटीआई दाखिल करने वाले कांग्रेसी नेता कल्पेश बारोट और उनके सहयोगी धर्मेश भाई का कहना है कि जब लॉकडाउन के दौरान शहर में सैकड़ों की संख्या में समाजसेवी संस्थाएं निस्वार्थ भोजन वितरण कर रही थीं तो ये बिल कैसे और क्यों पास किया जा रहा है? 

अब तक सूरत महानगर पालिका ने शहर की अलग-अलग समाजसेवी संस्थाओं को करीब 15 करोड़ रुपये चुका भी दिए है. वहीं, उधना जोन में समाजसेवी संस्थाओं ने 22 करोड़ रुपये मांगे हैं. इसी तरह शहर के बाकि जोन से भी क्लेम किया गया है. आरटीआई दाखिल करने वालों का कहना है कि खाने का बिल एक बीजेपी कार्यकर्ता को भी चुकाया गया है. भोजन वितरण के नाम पर भ्रष्टाचार की बू आ रही है. 

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इन्हें दिए गए हैं पैसे 

1- जयश्रीबेन त्रिवेदी- 31.84 लाख 
2- अक्षयपात्र फाउंडेशन- 29 लाख 
3- विशाल केटर्स- 5.07 लाख 
4- जनककुमार पटेल- 1.44 करोड़ 
5- वारी इंटरप्राइज- 33.81 लाख 
6- हरिओम फास्टफूड- 7.20 लाख 
7- आरजेड एंड केके- 77.69 लाख 
8) गणेश केटरींग - 23.65 लाख 

इस पूरे मामले को लेकर जब सूरत महानगर पालिका के मेयर डॉक्टर जगदीश पटेल से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उस वक्त लाखों लोगों को भोजन कराना जरूरी था, इसलिए समाजसेवी संस्थाओं की मदद ली गई थी. अगर इस मामले में कुछ गड़बड़ हुई होगी तो जांच करेंगे.  


 

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