खचाखच भरी बस में अगर कोई महिला लेडीज सीट खाली करने को कहती है तो इस बात की 70 फीसदी गुंजाइश होती है कि बहस शुरू होने वाली है. हां कुछ ऐसे प्राणी भी हैं जो महिलाओं से नजर मिले, इससे पहले ही सीट छोड़ देते हैं. अफसोस, ऐसे पुरुषों की संख्या बेहद कम है. लेकिन कुछ पुरुष यात्री ऐसे भी हैं जो ढीठ बनकर महिलाओं की सीट पर विराजमान रहते हैं. बसों में सीट ना छोड़नी पड़े इसके लिए इसके लिए निम्नलिखित किन्ही फॉर्मूले को अप्लाई करते हैं-
फॉर्मूला-1 लोहा लोहे को काटता है, महिला-महिला को
कुछ पुरुष ऐसे होते हैं जो अपनी बीवियों का सहारा लेते हैं. खुद खिड़की की साइड बैठ जाते हैं और पत्नी को मामला हैंडिल करने का आदेश पारित कर देते हैं. फिर दो
महिलाओं की तू-तू मैं-मैं शुरू हो जाए, तो कौन बीच बचाव करे.
फॉर्मूला-2 ...इसी बहाने लड़की छू तो लेगी
कुछ पुरुष यात्री सीट खाली करने के नाम पर बरसों से सीने में दफ्न अपने एक्टिंग टैलेंट का परिचय देने लगते हैं. वो बीमार पड़ जाएंगे, गहरे नींद में सोने की एक्टिंग
करेंगे. बेचारी लड़की को अगर तरस आ गया या छोरे से भिड़ने की ऊर्चा नहीं बची हो तो वो चुप हो जाती हैं. लेकिन अगर कोई महिला सीट लेने पर उतारू हो जाए और
लड़के को पकड़ के हिला दे तो भी लड़के इसे विन विन सिचुएशन समझते हैं. ‘भाईसाहब लड़की ने इसी बहाने टच तो किया ना...’
फॉर्मूला-3 तुम मुझसे सीट मांगो मैं तुम्हे धमकी दूंगा
महिला सीट पर बैठे कुछ पुरुष ऐसे होते हैं जो महिलाओं को घूर कर, गंदे इशारे कर अपनी सीट बचाने की कोशिश करते हैं. ये भी नहीं चला तो धमकी देते हैं. झगड़ा
करने पर उतारू हो जाते हैं. घर का दफ्तर का सारा गुस्सा उस बेचारी महिला पर उतारते हैं. कुछ डर के मारे चुप हो जाती हैं. लेकिन रोहतक की बहनों ने अंजाने में ही
सही बाकी महिलाओं का पथ प्रदर्शित किया है. तो इस बात की भी गुंजाइश है कि अगर लड़का या सुपर एक्टिव हॉर्मोन से ओवरलोडेड मर्द ने ज्यादा चूं चपड़ की तो बेल्ट
या जूतियों की छाप शक्ल पर नजर आएगी.
ये लड़कियां वैसे तो बहुत पुरुषों की बराबरी करती फिरती हैं...
अक्सर पुरुष यात्री इस बात की शिकायत करते हैं कि वैसे तो मिलाएं पुरुषों की बराबरी का दंभ भरती हैं, तो भी बसों में इन्हें आरक्षित सीट क्यों चाहिए? वेल, इनमें से
ज्यादा वो लोग होते हैं जो माइनॉरिटी, ओबीसी, या एससी एसटी को मिलने वाले आरक्षण का भोग विलास करते हैं. लेकिन महिलाओं की बारी आई, तो सब भूल जाते हैं.
महिलाएं दिमागी तौर पर पुरुषों के बराबर हैं, शारीरिक तौर पर नहीं
डीटीसी बसों में 25 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होती हैं. 35 सीट वाली लो फ्लोर बसों में छह सीटें और 42 सीटों वाली स्टैंडर्ड फ्लोर क्लस्टर बसों में
आठ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं. निर्भया गैंगरेप के बाद सीटों की संख्या बढ़ा दी गई हैं. महिलाओं के लिए इन सीटों को इसलिए रिजर्व रखा गया है क्योंकि
भीड़ भाड़ में लड़कियों के साथ बदसलूकी होती है.