ये पढ़ने-सुनने में कुछ अजीब लग सकता है, लेकिन ये सच्चाई है. 3 दिन से लेकर एक महीने के शिशु के खून की जांच करवाई जाए तो कई ऐसी मेटाबॉलिक बीमारियों का पता चल सकता है, जिनका इलाज शुरू में ही संभव है और नवजात बच्चा पूरी तरह से ठीक हो सकता है. इन्हीं में से एक बीमारी है पीकेयू. इसमें नवजात के शरीर में एक एंजाइम की कमी से एमिनो-एसिड दूसरे प्रोटीन में बदल नहीं पाता और नवजात के शरीर में वो इकट्ठा होता रहता है, जिससे बच्चे को कई समस्याएं पैदा हो जाती है.
एम्स में इसी विषय पर आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन में देश-विदेश से आए डॉक्टरों ने उन तमाम बाल शिशु स्क्रीनिंग टेस्ट की जानकारी दी जिनके बारे में लोग तो क्या बहुत से डॉक्टरों को तक जानकारी नहीं होती. एम्स में जैनेटिक विशेषज्ञ डॉ. मधुलिका कोबरा के अनुसार इन टेस्ट के जरिए बच्चे के पैदा होने के तुरंत बाद ना केवल मैटाबोलिज्म डिसऑर्डर बल्कि कई जैनेटिक बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है. इन बीमारियों का इलाज संभव नहीं है, लेकिन यदि पैरेंट्स को इनके बारे में शुरू में ही पता चल जाए तो बच्चे की परवरिश, उसके खाने-पीने से लेकर उसके इलाज के लिए पूरी प्लानिंग तैयार की जा सकती है. साथ ही पैरेंटस भी बच्चे की बीमारी को बहुत शुऱू में जान लेते हैं.
एम्स में उनमें से कई टेस्ट की प्रदर्शनी भी की गई, जो देश में बिल्कुल नए हैं और इनके जरिए बच्चों में होने वाले बहुत से डिसऑर्डर का पता किया जा सकता है. जैसे कि अब एक खास तरह के पेपर से बनी किट में नवजात के खून को जांच के लिए लिया जा सकता है और इस नमूने से 40 तरह के डिसऑर्डर का पता किया जा सकता है.
आंकडें भी बताते हैं कि दिल्ली जैसे महानगर में रोजाना एक या दो ऐसे बच्चे पैदा होते हैं जो किसी ना किसी मेटाबालिक डिसऑर्डर से जूझ रहे होते हैं. चिंता की बात यही है कि अभी तक पैरेंट्स शिशु स्क्रीनिंग टेस्ट के बारे में जागरुक नहीं हैं. वो लंबे समय तक जान ही नहीं पाते कि उनका बच्चा किस डिसऑर्डर से जूझ रहा है और उसका इलाज क्या है.
डॉक्टरों की यही सलाह है कि जन्म के तुरंत बाद शिशु का ब्लड स्क्रीनिंग टेस्ट जरूर करवाएं. खासतौर पर वो शिशु जिनके परिवारों में जैनिटिक बीमारी की हिस्ट्री है. साथ ही थैलिसीमिया, डायबीटीज, हाइपोथायरोडिस्म बीमारी भी यदि परिवार में किसी को है तो ब्लड स्क्रींनिग जरूर करवाएं.