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बेटी आरुषि और नौकर हेमराज के कत्ल के जुर्म में राजेश और नूपुर तलवार को उम्रकैद

गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने मंगलवार को आरुषि-हेमराज हत्‍याकांड में दोषी राजेश और नूपुर तलवार को उम्रकैद की सजा सुनाई है.

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नूपुर और राजेश तलवार नूपुर और राजेश तलवार

गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत के जज श्‍याम लाल ने मंगलवार को आरुषि-हेमराज हत्‍याकांड के दोषी राजेश और नूपुर तलवार को आईपीसी की धारा- 302 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई है. इसके अलावा धारा 201 एक तहत दोनों को पांच-पांच साल की सजा सुनाई गई है. वहीं, राजेश तलवार को धारा 203 के तहत अतिरिक्‍त एक साल की सजा भी दी गई है.

अदालत ने राजेश तलवार पर 17 हजार और नूपुर तलवार पर 15 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया. अदालत से सजा के बारे में जानकारी मिलने पर तलवार दंपति के चेहरे पर पछतावे का भाव देखा गया.राजेश तलवार को डासना जेल के वार्ड नंबर 11 और नूपुर तलवार को वार्ड नंबर 13 में रखा गया है. जेल के भीतर राजेश तलवार की पहचान अब कैदी नंबर 9342 के रूप में होगी. नूपुर तलवार होंगी कैदी नंबर 9343.

इससे पहले अदालत ने सोमवार को नूपुर और राजेश तलवार को बेटी आरुषि और हेमराज के कत्‍ल के लिए दोषी ठहराया था. पढ़ें: इस मर्डर मिस्‍ट्री में कब क्‍या हुआ...

सजा के ऐलान से पहले दोपहर 2:10 पर सजा पर बहस की गई. इस दौरान सीबीआई के वकील आरके सैनी ने कहा कि यह मामला रेयरस्‍ट ऑफ द रेयर की श्रेणी में आता है, क्योंकि मई 2008 में आरुषि और नौकर हेमराज तलवार दंपति के नोएडा स्थित घर में मृत पाए गए थे और उनके गले रेते हुए थे, इसलिए राजेश और नूपुर तलवार को सजा-ए-मौत मिलनी चाहिए.

वहीं, बचाव पक्ष के वकील ने यह कहते हुए तलवार दंपति के लिए रहम की अपील की कि उनके मुवक्किलों का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है. उन्‍होंने कहा कि केस की सुनवाई के दौरान जो भी बातें कहीं गईं हैं वो सिर्फ कहानी भी हो सकती है क्‍योंकि इस केस में कोई गवाह नहीं है. वारदात की रात जो कुछ भी वह क्षणिक आवेश का नतीजा था इसलिए इस केस को रेयरस्‍ट ऑफ द रेयर नहीं माना जा सकता.

नूपुर की तबीयत बिगड़ी
वहीं, डासना जेल में नूपुर तलवार की मंगलवार सुबह तबीयत खराब हो गई. उनका ब्‍लड प्रेशर अचानक बढ़ गया और उन्‍हें एसीडिटी हो गई. डॉक्‍टरों ने कोर्ट भेजने से पहले उनकी जांच की और उन्‍हें दवा दी.

दरअसल, सोमवार रात नूपुर ने जेल में खाना नहीं खाया था, जिसके बाद जेल सुप्रीटेंडेंट ने उन्‍हें खाना खाने के लिए कहा और कहा कि अगर उन्‍होंने बात नहीं मानी तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इसके बाद नूपुर ने खाना तो खाया, लेकिन वह रातभर सोई नहीं और बीच-बीच में उठती रहीं. डॉक्‍टर का कहना है कि यही वजह है कि उनका बीपी बढ़ने के साथ ही उन्‍हें एसीडिटी की परेशानी भी हो गई.

अदालत ने लगाई ये धाराएं
अदालत ने दोनों को आईपीसी की धारा 302 (हत्‍या ) के तहत दोषी ठहराया है. इसके अलावा राजेश तलवार को आईपीसी की धारा 203 (गलत एफआईआर दर्ज कराने के दोषी), 201 (सबूत मिटाना)और 34 (कॉमन इंटेंशन) के तहत दोषी माना है. वहीं, नूपुर को 302 के अलावा धारा 201 और 34 के तहत दोषी ठहराया है.

हमने आरुषि को नहीं मारा: तलवार दंपति
फैसले के बाद राजेश और नूपुर तलवार की ओर से मीडिया में एक बयान जारी किया गया है, जिसमें कहा गया है कि वे फैसले से नाखुश हैं. बयान के मुताबिक, 'हम फैसले से बहुत दुखी हैं. हमें एक ऐसे जुर्म के लिए जिम्‍मेदार ठहराया गया है, जो हमने किया ही नहीं. लेकिन हम हार नहीं मानेंगे और न्‍याय के लिए लड़ाई जारी रखेंगे.'

'सीबीआई की गरिमा बचाने की कोशिश'
तलवार दंपति की एक रिश्‍तेदार ने फैसले के बाद कहा, 'ट्रायल की जरूरत ही क्‍या थी. लोगों को पहले से पता था क्‍या होने वाला है. सीबीआई की गरिमा को बचाने के लिए सच को झूठ की परतों में दबा दिया गया.' उधर, बचाव पक्ष के वकील ने इस फैसले को गलत माना है. उन्‍होंने कहा कि ये गैरकानूनी है. तलवार दंपति की वकील रेबेका जॉन ने कहा है कि वे फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेंगे.

आरुषि हत्‍याकांड अब तक
16 मई 2008 को आरुषि की हत्‍या के बाद उसके पिता राजेश तलवार 23 मई 2008 को गिरफ्तार कर लिया गया था. इस हाईप्रोफाइल केस ने पुलिस को छका कर रख दिया. पुलिस बार-बार बयान बदलती रही और केस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा था, जिसके बाद 31 मई 2008 को केस सीबीआई के सुपुर्द कर दिया गया. जून में राजेश तलवार के कंपाउंडर कृष्णा को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया गया. 10 दिन बाद तलवार के दोस्त के नौकर राजकुमार और विजय मंडल को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया गया था.

सीबीआई जांच कर रही थी, लेकिन दिसबंर 2010 में आखिरकार सीबीआई थक गई और क्लोजर रिपोर्ट यह कहते हुए दाखिल की गई कि उसे राजेश तलवार पर ही शक है, लेकिन उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. उसके बाद तलवार दंपति इस क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ कोर्ट चले गए. कोर्ट ने भी रिपोर्ट को रिजेक्ट कर दिया और एक नाटकीय घटनाक्रम में तलवार दंपति को फिर से समन जारी कर दिया और सीबीआई को दोबारा मामला चलाने का आदेश दिया गया.

फरवरी 2011 में गाजियाबाद की स्पेशल कोर्ट ने राजेश तलवार और नूपुर तलवार पर ट्रायल शुरू करने के आदेश दिए सीबीआई कोर्ट ने अदालत में मौजूद ना रहने पर तलवार दंपति के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया. अप्रैल 2011 में नुपुर तलवार को गिरफ्तार कर लिया गया.

आखिरकार मई 2011 में कोर्ट ने राजेश तलवार और नूपुर तलवार पर हत्याकांड को अंजाम देने और सबूत मिटाने का आरोप तय कर दिया. सितबंर 2011 में नूपुर तलवार को जमानत मिल गई. अप्रैल 2013 में सीबीआई के अधिकारी ने कोर्ट में कहा कि आरुषि और हेमराज की हत्या तलवार दंपति ने ही की है. सीबीआई ने कोर्ट को ये भी बताया कि आरुषि और हेमराज आपत्तिजनक अवस्था में मिले थे.

बचाव पक्ष के वकील ने 3 मई को स्पेशल कोर्ट के सामने अपील की कि व‍ह 14 हवाहों को कोर्ट में बुलाए. सीबीआई ने इस अपील का विरोध किया. 6 मई 2013 को तलवार की इस अर्जी को ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया. साथ में राजेश और नूपुर के बयानों को रिकॉर्ड करने के भी आदेश दिए. 13 मई को सुप्रीम कोर्ट ने तलवार दंपत्ति को कड़ी फटकार लगाते हुए उनकी अर्जी को खारिज कर दिया. कुल मिलाकर तारीख बढ़ती गई और आखिरकार लंबे इंतजार के बाद आरुषि और हेमराज को न्‍याया मिल ही गया.

एक नजर इस मर्डर मिस्‍ट्री पर कि कब क्‍या हुआ-
16 मई, 2008: आरुषि तलवार को नोएडा स्थित अपने घर में मृत पाया गया, उसके गले की नस कटी हुई थी. नेपाली घरेलू नौकर हेमराज पर हत्या का शक.
17 मई 2008: हत्‍या के अगले ही दिन नौकर हेमराज का शव तलवार के घर की छत पर मिला.
18 मई 2008: पुलिस ने कहा कि हत्या का तरीका किसी दक्ष सर्जरी करने वाले द्वारा किया गया जान पड़ता है.
23 मई 2008: आरुषि के पिता दंत चिकित्‍सक राजेश तलवार दोहरी हत्या के लिए गिरफ्तार किए गए.
31 मई 2008: तत्‍कालीन मायावती सरकार ने मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपा.
13 जून 2008: पुलिस ने राजेश तलवार के कंपाउंडर कृष्णा को गिरफ्तार किया. 10 दिनों बाद तलवार दंपत्ति के चिकित्सक मित्र का नौकर और तलवार के पड़ोसी का नौकर विजय मंडल भी गिरफ्तार किया गया.
12 जुलाई 2008: सीबीआई द्वारा सबूत जुटा पाने में असफल रहने पर डॉ. राजेश को जमानत दी गई.
5 जून 2010: सीबीआई ने तलवार दंपत्ति पर नार्को जांच के लिए अदालत में याचिका दाखिल की.
29 दिसंबर 2010: सीबीआई ने मामला बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की और कहा कि मुख्य संदिग्ध आरुषि के पिता राजेश तलवार हैं, लेकिन उनके खिलाफ सबूत नहीं हैं.
25 जनवरी 2011: राजेश तलवार पर गाजियाबाद अदालत परिसर में एक युवक द्वारा हमला किया गया.
9 फरवरी 2011: गाजियाबाद की विशेष अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर दी और कहा कि आरुषि-हेमराज हत्या मामले में राजेश और नुपुर तलवार पर मामला चलाया जाए. दंपत्ति पर हत्‍या के बाद सबूत मिटाने का भी आरोप है. गाजियाबाद की एक सीबीआई अदालत ने दंपत्ति के खिलाफ अदालत में उपस्थित नहीं होने के लिए जमानती वारंट जारी किया.
14 मार्च 2012: सीबीआई ने अदालत में राजेश तलवार की जमानत याचिका खारिज करने की अपील की.
30 अप्रैल 2012: आरुषि की मां नूपुर तलवार को गिरफ्तार किया गया.
3 मई 2012: सत्र अदालत ने नूपुर तलवार की जमानत याचिका खारिज की.
25 मई 2012: तलवार दंपत्ति पर गाजियाबाद अदालत ने हत्या, सबूत मिटाने और षडयंत्र रचने का आरोप लगाया.
25 सितंबर 2012: नूपुर तलवार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जमानत दी गई.
अप्रैल 2013: सीबीआई अधिकारी ने अदालत से कहा कि आरुषि और हेमराज की हत्या राजेश तलवार ने की. सीबीआई ने कहा कि हत्‍या के वक्‍त आरुषि और हेमराज को आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया था.
3 मई 2013: बचाव पक्ष के वकील ने एक विशेष अदालत में पूर्व सीबीआई संयुक्त निदेशक अरुण कुमार (गवाह के रूप में) सहित 14 लोगों को समन भेजने के लिए याचिका दाखिल की. सीबीआई ने याचिका का विरोध किया.
6 मई 2013: निचली अदालत ने 14 लोगों को समन भेजने की तलवार की याचिका खारिज की. उसने राजेश और नूपुर तलवार के रिकॉर्डेड बयान लेने के आदेश दिए.
18 अक्टूबर 2013: सीबीआई ने जिरह बंद की और कहा कि तलवार दंपत्ति ने जांच को गुमराह किया है.
12 नवंबर 2013: अदालत ने अपना फैसला 25 नवंबर तक के लिए सुरक्षित रख लिया.
25 नवंबर 2013: सीबीआई की अदालत ने राजेश और नूपुर तलवार को हत्‍या का दोषी करार दिया.

रिश्‍तों के कत्‍ल की कहानी
संभव नहीं है कि आरुषि का दिल मां की धड़कन के साथ ना धड़कता हो. अंसभव है कि नूपुर तलवार की धड़कन बेटी के साथ ना जुड़ी हो. 14 बरस जिन हाथों ने गीली मिट्टी की तरह अपनी बच्ची को गूथा हो, उसे जिंदगी जीने की एक शक्ल दी, उसी की हत्या. अदालत का फैसला तो ऐलान होने के साथ ही संबंधों के दायरे में रुक सा गया.

मम्मी-पापा ने हत्या की. आरुषि की हत्या के बाद मम्मी-पापा को लेकर साढे पांच बरस लगातार जिस जख्म को समूचा समाज कुरेदता रहा साढे पांच बरस बाद अदालत ने उसी जख्म को बीमारी करार दिया. तो मम्मी-पापा के लिए सजा शुरू हुई या फिर सजा खत्म हुई. सजा का ऐलान मंगलवार को होगा, लेकिन इससे बड़ी सजा हो क्या सकती है, जो फैसला अदालत ने दिया. इसलिए अब बदलते समाज के आईने में रिश्‍तों को नए सिरे से खोजना जरूरी है.

जिस समाज, जिस परिवेश और जिस जीवन को आरुषि के मम्मी-पापा जी रही थे वह मध्यम वर्ग की चकाचौंध की चाहत और खुले जीवन की आकांक्षा समेटे हुए है. महानगरों के लिए खुलापन जिंदगी जीने का आक्सीजन बन चुका है और यहीं से शुरू होता है कच्ची-मीठी सरीखा आरुषि का जीवन और उसे उसी समाज, उसी परिवेश के अनुकुल बनाने में लगे मम्मी-पापा.

तो क्या मम्मी-पापा परंपरा और आधुनिकता के बीच जा फंसे जहां खुलापन और चकाचौंध अपनी हद में सुकून देता है, लेकिन बेटी को कटघरे में खड़ा जानता है और खुद किसी भी हद तक जाने को तैयार. असल मुश्किल यही है और शायद बीते साढे पांच बरस तक पुलिस, सीबीआई से लेकर समाज के सामने जिरह करते मम्मी-पापा का दर्द भी यही है और सुकुन भी यही कि बेटी के हत्यारे मम्मी-पापा हैं.

यह ऐसा फैसला है, जिसने देश की सबसे बडी मर्डर मिस्ट्री को बदलते भारत की उस नई शक्ल जो जोड़ दिया है, जो अभी तक रिश्‍तों की डोर थाम कर जिंदगी जीने का मुखौटा पहने रहता था. कभी ऑनर किलिंग कहकर सीना तानने से नहीं कतराता तो कभी आवारा पूंजी को ही जिंदगी का सच मान चकाचौंध की उड़ान भरने से नही घबराता. तो इस नए भारत में आपका स्वागत है.

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