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सेल्फी कैसे छीन रही इंडिया गेट के फोटोग्राफरों की रोजी-रोटी

दिल्ली के इंडिया गेट पर प्रोफेशनल फोटोग्राफर 4 साल पहले 3 हजार रुपए रोजाना कमाते थे. उनसे फोटो खिंचवाने के लिए लोगों की लाइन लगती थी लेकिन स्मार्टफोन आने के बाद मामला बिल्कुल उल्टा हो चुका है. अब 500 रुपए  रोज भी कमाना मुश्किल हो रहा है.

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इंड‍िया गेट पर फोटो ख‍िंचाते पर्यटक (Photo:aajtak)
इंड‍िया गेट पर फोटो ख‍िंचाते पर्यटक (Photo:aajtak)

इंडिया गेट पर फोटो खींचकर अपनी रोजी-रोटी कमाने वाले रघुवीर अपना और अपने परिवार का पेट भरने के तलाश में 12 साल साल पहले कर्नाटक से दिल्ली आए थे. परिवार में 6 लोग थे, और शिक्षा और कौशल इतना नहीं कि अपने लिए कोई  बेहतरीन कमाई देने वाली नौकरी ढूंढ़ लें. नौकरी की तलाश में दिल्ली घूमते-देखते, इंडिया गेट पर आए पर्यटकों को हंसते हुए तस्वीर खिंचवाते हुए देखा तो यही काम करने की सोची.  

रघुवीर ने बताया, "ये काम हमारे मन को लुभाया और जिसमें डिग्री की भी ज़रूरत नहीं थी. हमें कैमरा भी नहीं पकड़ना आता था पर अपने मालिक से फ़ोटो खींचने की तकनीक सीखी और आज हम एक लाख के कैमरे से बिना छुट्टी के 12 साल से लोगों की खुशी का हिस्सा बन रहे हैं."

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इंसान जब से टेक्नोलॉजी से सशक्त हुआ है तबसे बाकी दुनिया के बारे में भूल सा गया है. दिल्ली दर्शन करने वाले लोग सबसे पहले इंडिया गेट देखने निकलते हैं. जिस ज़माने में HD क्वालिटी फ़ोटो देने वाला स्मार्ट फ़ोन हर किसी की जेब में नही होता था, तब वहां खड़े फोटोग्राफर से फ़ोटो खिंचवाने के लिए लोगों की लंबी लाइन लगती थी. हर किसी की जेब में स्मार्ट फ़ोन से हर कोई अपने को फोटोग्राफर समझने लगा है. पर क्या कोई अंतर नहीं एक  डिजिटल फ़ोटो और पेपर पर उतरे उस चित्र में?

वाराणसी के मनीष, जो कि इंडिया गेट पर 6 साल से काम करते  हज़ारों तस्वीर ले चुके हैं, वे कहते हैं, "चार साल पहले, दिन ढलते 3000 रुपये तक अपनी जेब में लेकर घर जाते थे, वहीं अब 500 रुपये में मुश्किल से कमाते हैं. कम से कम 100 रुपए में बेचने वाली तस्वीरे अब तो 30 रुपए में मिलती है और एक मिनट में बन जाती है. फिर भी पर्यटक कहते है " भैया हमारे फ़ोन से इंडिया गेट की चोटी को छूने वाली फ़ोटो खींच दो." इस महंगाई के  दौर में इतने रुपये में परिवार का पेट पालना मुश्किल लगता है. 10-15 साल से इस काम में हैं, अब कोई और स्क‍िल सीखने में भी हमें कठिनाई होती है."

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