दिल्ली मे केंद्र और राज्य सरकार के पास किसके क्या अधिकार हैं, इसे लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई बार भिड़ चुकी है. लेकिन अब नौबत ये आ गई है कि लगभग सभी बड़े मामलों में पुलिस का पक्ष रखने के लिए दिल्ली सरकार और LG अलग-अलग वकील रखते हैं और दोनों वकीलों की अलग-अलग राय के चलते महत्वपूर्ण मामलों की या तो सुनवाई टल रही है या फिर सुनवाई पर ही स्टे लग जाता है. नतीजा दिल्ली की इस लड़ाई में आम जनता का नुकसान हो रहा है.
एक मामले के पैरवी के लिए अदालत में दो वकील
दरअसल सोमनाथ भारती की पत्नी लिपिका मित्रा ने करीब 5 महीने पहले याचिका लगाई थी कि उनके पति की जमानत को खारिज किया जाए. लेकिन अभी हाई कोर्ट सोमनाथ की जमानत पर कुछ तय करे उससे पहले दोनों के वकीलों में इस बात को लेकर लड़ाई चल रही है कि दिल्ली पुलिस का पक्ष इस मामले में कौन रखे. नाराज कोर्ट ने कहा कि एक हफ्ते में वो खुद तय करेंगे कि इस मामले में अभियोजन पक्ष से वकील कौन होगा? इसके अलावा दर्जनों मामले सिर्फ हाई कोर्ट में ही पेंडिंग हैं जिनपर कोई फैसला नहीं हो पाया है क्योंकि वकीलों का टकराव कोर्ट में लगातार बढ़ता जा रहा है.
दोनों की लड़ाई में कई मामले लंबित
इसकी शुरुआत हुई थी 21 मई 2015 के गृह मंत्रालय के उस नोटिफिकेशन से जिसमें दिल्ली सरकार के अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार एलजी को दिया गया था. जिसे लेकर फाइनल आर्डर अभी भी हाई कोर्ट में लंबित है. इसके बाद तो अधिकारों को लेकर जैसे केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच हर मामले को कोर्ट में लाने की होड़ लग गई. जिन्तेंद्र तोमर का फर्जी डिग्री का मामला हो या फिर ACB के दिल्ली सरकार के अधीन करने की लड़ाई, जरनेल सिंह के अवैध निर्माण को तोड़ने से रोकने को लेकर वकीलों की लड़ाई कोर्ट में साफ दिखी. दिल्ली सरकार के सर्किल रेट को तय करने को लेकर भी मामले हाई कोर्ट में अटका हुआ है. CNG फिटनेस स्कैम में तो कोर्ट ने इस लड़ाई को देखकर फिलहाल सुनवाई पर ही रोक लगा रखी है. JNU मामले में कन्हैया को जमानत मिले या नहीं इसको लेकर LG के नियुक्त वकील जहां जमानत का विरोध कर रहे थे, वहीं दिल्ली सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल उसे जमानत दिए जाने पर अपनी सहमति जता रहे थे.
सुप्रीम कोर्ट ने जल्द मामले सुलझाने के दिए आदेश
कानून के मुताबिक लैंड, लॉ एंड ऑर्डर और पुलिस केंद्र के अधीन हैं. दिल्ली को अभी पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है. जबकि दिल्ली सरकार कहती है कि गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह नहीं है और गृह मंत्रालय को दिल्ली सरकार के आदेश को रद्द करने का अधिकार नहीं है. केवल कोर्ट को ऐसा अधिकार प्राप्त है और कोर्ट दोनों के झगड़े और वकीलों की अदला-बदली में समय पर कोई फैसला नहीं कर पा रहा है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जरूर दिए हैं कि इस मामले से जुड़े लंबित मामलों की सुनवाई 31 जुलाई तक हाई कोर्ट पूरी कर ले.