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कैसे खत्म होंगे दिल्ली में कचरे के पहाड़, सीयोल से लेना होगा सबक

दिल्ली की तरह ही सीयोल को अपने कचरे की समस्या का हल नहीं मिल रहा था, लेकिन जब समस्या काबू से बाहर हुई, तो सीयोल ने जो सबक सीखा, वो दिल्ली के लिए भी मिसाल बन सकती है.

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दिल्ली में कचरे के पहाड़
दिल्ली में कचरे के पहाड़

दिल्ली में एक भयानक हादसा हुआ, कचरे का पहाड़ मौत बनकर दिल्ली की एक सड़क पर टूट पड़ा. दो लोगों की जिंदगी कचरे के ढेर में दफन हो गई, लेकिन कूड़े से पैदा हुआ ये खतरा सिर्फ पहाड़ टूटने तक सीमित नहीं है, इस कचरे का जहर दिल्ली की हवा में घुलकर ना जाने कितने लोगों को बीमार बना रहा है. दिल्ली की जो हालत आज है, आज से तीन दशक पहले दक्षिण कोरिया की राजधानी सीयोल की भी यही हालत थी, लेकिन सीयोल ने खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके अपने कचरे के पहाड़ से ना केवल निजात पाया, बल्कि कचरे के उत्पादन को ही कम कर दिया. अब सीयोल में कचरे के पहाड़ बनना ही बंद हो गए हैं.

दिल्ली की तरह ही सीयोल को अपने कचरे की समस्या का हल नहीं मिल रहा था, लेकिन जब समस्या काबू से बाहर हुई, तो सीयोल ने जो सबक सीखा, वो दिल्ली के लिए भी मिसाल बन सकती है. सीयोल ने जो सबसे जरूरी काम किया वो कचरे को रिसोर्स में तब्दील करके किया.

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1986 में सीयोल की सबसे बड़ी लैंडफिल साइट नंजीदो पर कूड़ा डालने की जगह नहीं बची, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली की लैंडफिल साइट पर नहीं बची है. इसके बाद सीयोल से सटे इन्चॉन इलाके में नई साइट तलाश की गई, लेकिन इसके साथ ही कूड़े को कम करने का काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया गया क्योंकि सीयोल प्रशासन के लोगों को एहसास हो चुका था कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो नई लैंडफिल साइट को भी कचरे का पहाड़ बनने में वक्त नहीं लगेगा.

कचरे के लिए कई तरह के बैग

सीयोल रिसोर्स रिकवरी अथॉरिटी के एक अफसर के मुताबिक इसके लिए सीयोल ने पे एंड थ्रो योजना शुरू की. इसमें खास तरह के बैग बनाए गए, जो बाजार से मामूली कीमत पर खरीदे जा सकते हैं. ये बैग अलग- अलग कचरे के लिए बनाए गए, जैसे गीले यानी बायोडीग्रेडेबल कचरे के लिए अलग बैग, इंडस्ट्री के लिए बैग, रॉ मटेरियल वाले कचरे के लिए अलग बैग और भारी कचर के लिए अलग बैग. साथ ही नियम ये बनाया गया कि इन बैग के बिना कोई भी अपने घर, दुकान या संस्थान का कचरा नहीं फेंक सकेगा.

सीयोल सीख ले दिल्ली

सीयोल ने जो तरीके अपनाया, उसी का नतीजा है कि आज सीयोल का नाम कचरे से बेहतरीन ढंग से निपटने वाले शहरों में शुमार है क्योंकि इन तरीकों से सीयोल ने ना सिर्फ लैंडफिल साइट पर पहुंचने वाले कचरे को अस्सी फीसदी तक कम किया है, बल्कि इसे काम की चीज बना दिया है. दिल्ली के लिए कचरे के पहाड़ों ने खतरे की घंटी पहले ही बजा दी है और इसीलिए दिल्ली को सीयोल जैसे शहरों से सीख लेने की जरूरत भी है.

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बड़े काम की चीज है कूड़ा-कचरा

दिल्ली कचरे का पहाड़ बन चुकी अपनी लैंडफिल साइट्स को खाली कराने के लिए जूझ रही है. तमाम प्रयोग हुए, लेकिन कामयाबी अभी तक नहीं मिली. ऐसे में क्या सीयोल का फार्मूला दिल्ली में काम आ सकता है क्योंकि सीयोल ने कचरे को बेकार की चीज नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक रॉ मटेरियल बना दिया है. अब सीयोल रीकवरी फेसिलिटी कचरे की तलाश में रहती है क्योंकि सीयोल में कचरा प्रोसेस करने वाले प्लांट को हर रोज कचरे की जरूरत पड़ती है. यहां प्रोसेसिंग यूनिट में घरों से निकले कूड़े को 900 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा तापमान पर जलाया जाता है और बिजली के साथ ही कंस्ट्रक्शन मटेरियल तैयार किया जाता है. यही नहीं जो कूड़ा दिल्ली में सड़कों और लैंडफिल साइट पर फेंका जाता है, वैसा ही कूड़ा सीयोल अपने प्लांट में पहुंचाता है, ताकि उसे प्रोसेस किया जा सके.

घट गई कचरे की मात्रा

सीयोल में कचरे को प्रोसेस करने के लिए पांच यूनिट बनाई गईं और इन्हें रिसोर्स रिकवरी फेसिलिटी नाम दिया गया, नाम से ही साफ था कि सीयोल का मकसद कचरे से रीसोर्स यानी कचरे से काम की चीजों को रिकवर करना था. सीयोल में पांच रिसोर्स रिकवरी फेसिलिटी में 20 डिस्ट्रिक्ट के गार्बेज को प्रोसेस किया जाता है. यहां रीसाइकलिंग से हानिकारक जहरीली गैसें हवा में नहीं मिलतीं, पानी और जमीन प्रदूषित नहीं होते और सबसे बड़ी बात ये है कि लैंडफिल साइट पर डाले जाने लायक कचरे की मात्रा अस्सी फीसदी तक कम हो गई है, जिससे अब सीयोल की नई लैंडफिल साइट की उम्र पचास साल तक बढ़ गई है.

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बेहतर कचरा प्रबंधन, मतलब चकाचक सड़कें और चौराहे

चमचमाती सड़कें, साफ गलियां और सुंदर चौराहे, किसी शहर की खूबसूरती में ये सारी चीजें चार चांद लगा देती हैं, लेकिन ऐसा अपने आप नहीं होता. इसके लिए जरूरत होती है इच्छा शक्ति की, सरकार के प्रयासों की और वहां रहने वाले निवासियों के सहयोग की. इन सारी चीजों के तालमेल की मिसाल देखनी हो, तो सीयोल में देखिए. साउथ कोरिया ने अपने शहर को खूबसूरत बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है, सीयोल दिल्ली की तरह घनी आबादी वाला शहर है, लेकिन सफाई के मामले में इतना तत्पर की सड़क पर कूड़े का नामो निशान नहीं दिखता.

लोगों की दी जाती है जानकारी

शहर को साफ रखने में सीयोल के गार्बेज मैनेजमेंट की भूमिका सबसे अहम है और इसमें ये बात भी शामिल है कि सीयोल ने अपने लोगों को कचरे की अहमियत बताई है कि कैसे कचरा सड़क पर गंदगी बन जाता है और वही कचरा अगर सही जगह पहुंचाया जाए, तो वो कितने काम की चीज बन जाता है. ये बताने और जताने के लिए सीयोल का प्रशासन अपने नागरिकों को कचरा घर बुलाता है. जहां गेम्स और दिलचस्प गतिविधियों के जरिए लोगों को बताया जाता है कि कैसे कूड़े को काम की चीज बनाया जा सकता है.

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हाईटेक सुविधाओं से लैस कचरा घर

सीयोल में कचरा घर भी हाईटेक सुविधाओं से लैस है. यहां बच्चों को कचरे की रीसाइकलिंग के फायदे बताने वाले गेम्स हैं, तो बड़ों के लिए स्वीमिंग पूल और ऐरोबिक्स जैसी फेसिलिटी है. मकसद लोगों को कचरा घर बुलाकर दिखाना है कि कचरे से क्या-क्या बनाया जा सकता है और अगर कचरे को सही जगह नहीं फेंका गया, तो वो कितने वर्षों तक शहर के लिए मुसीबत बन सकता है. यही वजह है कि अब सीयोल के लोग भी कचरे को सड़क पर फेंकने की बजाए उसे सही जगह पहुंचाते हैं और सीयोल की रीसोर्स रिकवरी फेसिलिटी उस कचरे को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल कर बिजली से लेकर तमाम चीजें बनाने में इस्तेमाल करती है.

दिल्ली में कचरे से निपटने के उपाय

ऐसा नहीं है कि दिल्ली में कूड़ा प्रबंधन के लिए कुछ नहीं किया गया. कई योजनाएं बनीं, बहुत सी योजनाएं अमल में लाई गईं. कुछ योजनाएं मौजूदा वक्त में भी चल रही हैं, कूड़े से खाद भी बन रहा है और कूड़ा बिजली बनाने के काम भी आ रहा है.

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