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दिल्ली का तामपान दिन में कम होने की वजह बना बढ़ता प्रदूषण

वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को 'अर्बन कूलिंग इफ़ेक्ट' का नाम दिया है जिसको साल में दो बार महसूस किया जा सकता है. पहली बार गर्मियों में मई और जून के महीने में और दूसरी बार सर्दियों में अक्टूबर से दिसंबर के महीनों में. दिल्ली के मुकाबले दूसरे शहरों में इन महीनों में ठीक इसके उलट होता है.

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दिन में कम रहता है दिल्ली का तापमान
दिन में कम रहता है दिल्ली का तापमान

दिल्ली-एनसीआर में हर दिन बढ़ता प्रदूषण यहां के बाशिंदों से लेकर दिल्ली घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए भी मुश्किलों का कारण बनता जा रहा है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यही प्रदूषण भयानक गर्मी में भी दिल्ली के बढ़ते तापमाम को 2 से 3 डिग्री कम रखने में मदद कर रहा है. हालिया रिसर्च में इस बात का खुलासा हुआ है कि दूसरे पड़ोसी शहरों के मुकाबले दिल्ली में तापमान कम है जिसका कारण कुछ और नहीं बल्कि दिल्ली का बढ़ता प्रदूषण है.

वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को 'अर्बन कूलिंग इफ़ेक्ट' का नाम दिया है जिसको साल में दो बार महसूस किया जा सकता है. पहली बार गर्मियों में मई और जून के महीने में और दूसरी बार सर्दियों में अक्टूबर से दिसंबर के महीनों में. दिल्ली के मुकाबले दूसरे शहरों में इन महीनों में ठीक इसके उलट होता है जिसे वैज्ञानिकों ने 'अर्बन हीट आइलैंड' का नाम दिया है जिसमें गर्मी के वातावरण में ट्रैप हो जाने के कारण तापमान ज्यादा हो जाता है.

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दिल्ली के प्रदूषण में एरोसोल नाम के प्रदूषक की मात्रा भयानक गर्मी और सर्दी के मौसम में बढ़ जाती है. वैज्ञानिकों की मानें तो इसी प्रदूषक के चलते दिल्ली का तापमान कम हो जाता है. दरअसल एरोसोल प्रदूषक की कुछ श्रेणी सूरज की तेज किरणों को सोख लेती है जबकि कुछ किस्म की किरणों को रिफ्लेक्ट कर देती हैं. इससे तेज़ किरणें दिल्ली तक नहीं पहुंच पाती. रिसर्च के मुताबिक एरोसोल की मात्रा दिन के समय में वातावरण में ज्यादा होती है इसलिए दिल्ली दिन के समय दूसरे राज्यों से ठंडी है जबकि रातों को दिल्ली का तापमान दूसरे शहरों से ज्यादा होता है.

पर्यावरणविद् विमलेंदु का कहना है, 'एरोसोल बेहद सूक्ष्य कण होते हैं और धूल, समुद्री नमक, रेत, सल्फेट, नाइट्रेट, मिनरल डस्ट और वातावरण की नमी में भी मौजूद होते है. गर्मियों में जैसे ही ज़मीन सूखी होती है प्रदूषण बढ़ जाता है जो एरोसोल को जन्म देता है.' हालांकि पर्यावरण विद की मानें तो ये हमारे लिए खुशी की नहीं बल्कि चिंताजनक बात है.

आपको बता दें कि ये रिसर्च आईआईटी मुंबई ने भी की थी. इसके अलावा जेएनयू, नेशनल फिजिकल, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब, तेजपुर यूनिवर्सिटी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग ने संयुक्त रूप से की है. इसमें मार्च 2000 से नवंबर 2011 तक के आंकड़ों को शामिल किया गया है. अब इससे इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 2011 से अब तक दिल्ली का प्रदूषण स्तर कितना बढ़ गया होगा.

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