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दिल्ली पुलिस के पास भी है एक 'क्रिस'

उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में नवंबर की वह एक सर्द रात थी. करीब 3 बजे तड़के स्ट्रीट लाइट की दुधि‍या रोशनी में वह हर रोज की तरह 96 नंबर की बस से उतरकर अपने कमरे की ओर आगे बढ़ रहा था. तभी पीछे से पुलिस वाले की आवाज आई- अरे, वहीं रुको.

2006 में क्रिस के बारे में बताते केके पॉल 2006 में क्रिस के बारे में बताते केके पॉल

उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में नवंबर की वह एक सर्द रात थी. करीब 3 बजे तड़के स्ट्रीट लाइट की दुधि‍या रोशनी में वह हर रोज की तरह 96 नंबर की बस से उतरकर अपने कमरे की ओर आगे बढ़ रहा था. कान में लगे ईयरफोन पर हल्की आवाज में संगीत बज रहा था. तभी पीछे से एक फटफटिया बुलेट की आवाज आती है. पुलिस वाले अक्सर पेट्रोलिंग करते हैं इसलिए वह अपनी चाल में चलता रहा. लेकिन तभी पीछे से एक आवाज आई- अरे, वहीं रुको.

यह पुलिस वाले की आवाज थी इसलिए रुकना लाजिमी था. बुलेट करीब आई तो पुलिस वाले ने अपने चिरपरिचत अंदाज में सवालों की झड़ी लगा दी, 'कहां जा रहे हो? कहां से आ रहे हो? इतनी रात को क्या कर रहे हो..?' उसने बताया कि वह ऑफिस से आ रहा है और रोज इसी समय लौटता है... उसे बीच में ही काटते हुए पुलिस वाले ने कहा, चलो गाड़ी पर बैठो. लड़के ने पूछा- क्यों? पुलिस वाले ने कहा- थाने ले जाना है.

'मैं क्यों जाऊं थाने'
पुलिस थाने का नाम सुनकर उसे थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन फिर उसने पुलिस वाले से कहा, 'भाई, मैं रोज इसी वक्त लौटता हूं. ये मेरे ऑफिस का आई-कार्ड है. ये मेरा ड्राइविंग लाइसेंस है.' लड़के ने अपना पता भी बतलाया. लेकिन इस पर पुलिस वाले का जवाब चौंकाने वाला था. उसने कहा, 'ये कागज-वागज काम नहीं आएंगे. ऐसे सैंकड़ों कागज यूं ही बन जाते हैं.' इस पर लड़के ने अपना वोटर आईडी कार्ड निकालकर दिखाया. पुलिस वाले ने कहा- एक बार बोला न गाड़ी पर बैठो. कोई कागज काम नहीं आएगा. थाने चलो क्रिस करना है.

PM मोदी का सपना और क्रिस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही जब गुवाहाटी गए तो उन्होंने पुलिसवालों को स्मार्ट बनने का मंत्र दिया. स्मार्ट पुलिस यानी तकनीक से लैस. लेकिन आठ साल पहले 2006 में ही देश की सबसे स्मार्ट पुलिस मानी जाने वाली दिल्ली पुलिस ने स्मार्टनेस की कवायद शुरू कर दी थी. एक सॉफ्टवेयर तकनीक को डेवलप किया गया और नाम दिया गया CRIS. क्रिस यानी डिजिटल तकनीक से अंगूठे को स्कैन कर डेटाबेस से मिनटों में यह खंगालना कि सामने वाला अपराधी है या नहीं.

इस तकनीक को लॉन्च करते वक्त तत्कालीन पुलिस कमिश्नर केके पॉल ने बताया था कि इस कंप्यूटराइज्ड रिमोट आइडेंटिफिकेशन ऑफ सस्पेक्ट्स (क्रिस) के सिस्टम में 1 लाख 60 हजार से अध‍िक अपराधि‍यों के फिंगर प्रिंट का डेटाबेस है.

क्या है क्रिस की मौजूदा सच्चाई
दरअसल, तकनीक अच्छी थी लिहाजा इसे हाथों-हाथ लिया गया. कई राज्यों ने इस पहल की सराहना भी की. क्रिस की मदद से कई केस सुलझ गए तो कई बड़ी घटनाएं वारदात बनने से पहले रोक दी गईं. यानी क्रिस सफलता की ओर चल पड़ा. लेकिन गौर कीजिए तो ये वो देश हैं, जहां आंकड़ों की कीमत जान से ज्यादा लगाई जाती है. बात चाहे बिलासपुर के नसबंदी कैंप की हो या गुरुदासपुर में आंखों के ऑपरेशन शि‍विर की. आंकड़ों के खेल में योजनाएं मात खा जाती हैं और लाखों-करोड़ों रुपये लापरवाही की भेंट चढ़ जाते हैं.

आंकड़ों के चंगुल में तकनीक
आंकड़ों की चर्चा इसलिए कि जिस क्रिस तकनीक का इस्तेमाल अपराधियों की पहचान के लिए होना था, असल में मौजूदा दौर में वह भी आंकड़ों की भेंट चढ़ चुका है. मुखर्जी नगर इलाके में सुबह के तीन बजे एक आम इंसान को जबरदस्ती थाने ले जाने की यह वास्तविक घटना इसी की बानगी है. यानी रात में सड़क पर निकलना है और अगर आपके पास कोई साधन नहीं है, पैदल चल रहे हैं तो 10 मिनट पुलिस थाने में गुजारने होंगे यह तय मानिए. फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके पास पासपोर्ट है या आधार कार्ड.

नाम नहीं बताने की शर्त पर एक पुलिस अधि‍कारी ने बताया, 'हम क्या करें. टारगेट पूरा करना होता है. कई बार अपराधी भी पकड़ में आते हैं. लेकिन हां आम लोगों को भी परेशान करना पड़ता है. मजबूरी है.'

हर तीसरे दिन एटीएम गार्ड का क्रिस
आंकड़ों के इस खेल की सच्चाई का पता लगाने के लिए देर रात सड़कों की खाक छानने के बाद पता चलता है कि इससे सबसे अधि‍क परेशान एटीएम और दूसरे अन्य गार्ड हैं. ऐसे ही एक गार्ड रामशंकर ने बताया, 'हम महीनों से यहां रोज रात में बैठते हैं. पुलिस वाले अब पहचानने भी लगे हैं. लेकिन हर तीसरे दिन गाड़ी पर बिठाकर थाने ले जाते हैं. क्रिस जांच के लिए.'

दिलचस्प यह है कि टारगेट पूरा करने का यह खेल सिर्फ मुखर्जी नगर इलाके में नहीं, बल्कि‍ राजधानी के अन्य दूसरे इलाकों में भी चल रहा है. हालांकि इस ओर कुछ रिमोट डिवाइस भी हैं, लेकिन कम संख्या में होने के कारण अक्सर लोगों को थाने ले जाकर क्रिस जांच करवाया जाता है. पुलिसकर्मी अपनी व्यथा सुनाते हुए कहते हैं, 'हम कई बार लोगों से रिक्वेस्ट करते हैं कि सर्पोट कीजिए. थाने ले जाकर पांच मिनट का काम होता है.'

क्या कहते हैं अधि‍कारी
आंकड़ों की इस बाजीगीरी पर कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है. थाने में फोन लगाने पर छोटे अधि‍कारी बोलने से इनकार करते हैं, जबकि बड़े अधि‍कारी फोन नहीं उठाते. हालांकि कुछ पुलिसकर्मी स्वीकार करते हैं कि ऐसा हो रहा है. यानी आंकड़ों के इस खेल में एक अच्छी-भली तकनीक मजाक बनकर रह गई है. 100 करोड़ से अधि‍क की आबादी वाले इस देश में CRIS एक शुरुआत है, स्मार्ट पुलिस की. उम्मीद है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट पुलिस आंकड़ों के इस खेल में नहीं उलझेगी क्योंकि जब देश की राजधानी में ऐसा हश्र है तो ग्रामीण इलाकों या छोटे शहरों में तकनीक के दुरुपयोग को रोक पाना मुश्कि‍ल होगा.

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