कोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा है कि जनहित याचिका दायर किए हुए एक साल से ज्यादा वक्त बीत गया है. इस जनहित याचिका पर 6 से ज्यादा बार सुनवाई हो चुकी है. लेकिन अभी तक इस तरह की अवैध पैथोलॉजी पर रोक नहीं लगाई जा सकी है. ऐसे में मुख्य सचिव बताएं कि पैथोलॉजी बंद करवाने के लिए दिल्ली सरकार की तरफ से क्या कदम उठाए गए हैं.
मुख्य सचिव को अपने हलफनामे में कोर्ट को यह भी बताना होगा कि दिल्ली सरकार अब तक दिल्ली हेल्थ एक्ट को लागू करने में क्यों नाकामयाब रही है. दरअसल पिछली सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताया था कि वह केंद्र सरकार के क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 210 को दिल्ली में लागू नहीं कर रही है बल्कि वह खुद अपना दिल्ली हेल्थ एक्ट बनाने जा रही है.
लेकिन अभी तक सरकार न तो केंद्र सरकार के एक्ट को लागू किया है और ने ही अवैध पैथोलॉजी लैब पर कोई कार्रवाई हुई है. यह याचिका पिछले साल सोशल एक्टिविस्ट बिज़ोन मिश्रा की तरफ से दाखिल की गई थी.
याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सरकार के पास इस बात तक का कोई आंकड़ा नहीं है कि दिल्ली में अवैध रूप से चल रही पैथोलॉजी लैब की संख्या कितनी है. इतना ही नहीं अवैध रूप से चल रही इन पैथोलॉजी लैब में काम करने वाले टेक्नीशियन और स्टाफ भी अप्रशिक्षित हैं.
जिसके चलते कई लोगों की न सिर्फ रिपोर्ट गलत आई, बल्कि उनकी जान पर भी बन आई. हजारों हजार मरीज हर रोज अवैध रूप से चल रही ऐसी पैथोलॉजिकल लैब से अपने टेस्ट कराने को मजबूर हैं और सरकार का इन पर कोई अंकुश नहीं है.
इस याचिका में बहस करने के लिए पेश हो रहे वकील शशांक देव सुधीर का कहना है कि एक साल के दौरान इस जनहित याचिका पर 5 बार से अधिक कोर्ट सुनवाई कर चुका है. लेकिन हर बार सरकार कोर्ट में कोई पुख्ता जवाब देने में नाकामयाब रही है.
यही वजह है कि कोर्ट ने इस बार चीफ सेक्रेटरी से ही इस मामले में हलफनामा दाखिल करने को कहा है. पिछली सुनवाई के दौरान भी कोर्ट साफ कर चुका है कि दिल्ली में चल रहे अवैध पैथोलॉजी लैब आम लोगों के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं है.