दिल्ली स्थित एम्स के नाइट शेल्टर में 22 लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने से जुड़े मामले में एम्स और दिल्ली सरकार बुधवार को कोर्ट में आपस में भिड़ गए. दरअसल हाई कोर्ट ने सवाल उठाया था कि नाइट शेल्टर में कोरोना पॉजिटिव पाए गए लोगों को दिल्ली सरकार के अस्पतालों में इलाज के लिए दूर क्यों भेजा गया, जबकि उनको एम्स की ही फैसिलिटी में भर्ती करके इलाज कराया जा सकता था.
दिल्ली सरकार ने कहा कि उन्होनें एम्स से संपर्क किया था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद कोविड के मरीजों को दिल्ली सरकार ने अपने अस्पतालों में भर्ती करा दिया. वहीं एम्स ने कहा कि किसी ने उनसे संपर्क नहीं किया. दिल्ली सरकार की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि एम्स में खास लोगों को ही इलाज मिलता है. एम्स की तरफ से कोर्ट में इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा गया कि एम्स बिना किसी भेदभाव के हर मरीज का इलाज करता है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने अब एम्स को नाइट शेल्टर को टेकओवर करने का निर्देश दिया है. ये नाइट शेल्टर दिल्ली सरकार के दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड (डीयूएसआईवी) के अधीन था. कोर्ट ने कहा कि हालांकि इसका खर्चा डीयूएसआईवी ही उठाएगा. ये नाइट शेल्टर बोर्ड के ही अधीन था, लेकिन सुविधाओं की कमी के कारण यहां रहने वाले मरीजों को कई परेशानियां थीं. एम्स पहले से ही विश्राम सदन के नाम से तीन नाइट शेल्टर्स चला रहा है, जहां पर उन मरीजों को रखा जाता है. यहां वे मरीज रहते हैं जिनको उपचार की जरूरत है, लेकिन फिलहाल उनको एम्स में एडमिट नहीं किया गया है.
इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लगाई गई थी. इसमें कहा गया था कि एम्स के नजदीक नाइट शेल्टर में सुविधाओं के अभाव में यहां रह रहे मरीजों की दिक्कतें बढ़ रही हैं और कुछ में कोविड-19 के लक्षण भी दिखे हैं. याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वकील अर्जुन सयाल ने कोर्ट को बताया कि पीने के पानी और टॉयलेट जैसी सुविधाएं भी सही हालत में नहीं हैं. नाइट शेल्टर में रुकने और जाने वाले लोगों से जुड़ी जानकारी भी रजिस्टर में नहीं रखी जा रही हैं.
दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में निर्देश दिए हैं कि दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड एक रिड्रेसल सेल बनाएगा जिसमें दिल्ली के सभी नाइट शेल्टर्स से जुड़े सुझाव पर अमल और समस्याओं के निदान के लिए ऑफिसर की नियुक्ति की जाएगी. साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगर एम्स के आसपास मौजूद नाइट शेल्टर्स में कोई कोरोना का पॉजिटिव मरीज मिलता है, तो उसे एम्स में ही भर्ती किया जाएगा. उसे दिल्ली के अस्पतालों तक नहीं लेकर जाया जाएगा. दिल्ली हाई कोर्ट का कहना था कि मरीजों को नजदीक के ही अस्पताल में इलाज मिलना जरूरी है.