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इस गांव में अजीबोगरीब खौफ के चलते 200 वर्षों से नहीं खेली गई होली

इस गांव के लोग होली पर घर से बाहर नहीं निकलते क्योंकि उनका मानना है कि अगर किसी बाहरी शख्स ने उन्हें रंग या गुलाल लगा दिया तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. इसी आशंका के चलते इन दोनों गांवों में होली के मौके पर वीरानी छाई रहती है.

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होली के मौके पर गांव में छाई रहती है वीरानी
होली के मौके पर गांव में छाई रहती है वीरानी

इसे अंधविश्वास ही कहा जाएगा कि होली जलाने और रंग गुलाल खेलने से गांव में देवीय प्रकोप झेलने के लिए ग्रामीणों को तैयार रहना होगा. इस खौफ के चलते बीते 200 सालों से छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के खरहरी और धमनागुड़ी गांव में होली के मौके पर ग्रामीण अपने घरों में दुबक जाते हैं.

इस गांव के लोग होली पर घर से बाहर नहीं निकलते क्योंकि उनका मानना है कि अगर किसी बाहरी शख्स ने उन्हें रंग या गुलाल लगा दिया तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. इसी आशंका के चलते इन दोनों गांवों में होली के मौके पर वीरानी छाई रहती है. गांव के बुजुर्ग इस बात की तस्दीक करते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी वो ये देखते आए हैं कि गांव में ना तो होलिका दहन होता है और ना ही कोई ग्रामीण रंग गुलाल खेलने की हिम्मत करता है.

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खरहरी गांव के 55 वर्षीय गणेश राम बताते हैं कि लगभग 30 साल पहले बिहार से आये एक व्यापारी ने इसे अंधविश्वास करार देकर होलिका दहन की कोशिश और कुछ देर बाद ही उस व्यापारी के शरीर में फोड़े फुंसियां हो गए. यही नहीं, जिस घर के सामने होलिका जलाई जा रही थी उस घर में अचानक आग लग गई. जैसे ही इस व्यापारी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने ग्राम देवता से क्षमा याचना की उसके शरीर से फोड़े फुंसियां गायब हो गए, यही नहीं घर में लगी आग भी बुझ गई.

इसी गांव में रहने वाली 70 वर्षीय लक्ष्मी कंवर बताती हैं कि गांव की पहाड़ी पर मड़वारानी मां का मंदिर है. 200 वर्ष पूर्व इस मंदिर के पुजारी को देवी ने सपने में दर्शन दिए और आगाह किया कि होलिका दहन करने से पूरे गांव में तबाही मच जाएगी, जिसके बाद गांव के बड़े बुजुर्गों ने होली पर पाबंदी लगा दी. तब से बरसो बीत गए इस गांव में होली ना खेलने की परंपरा शुरू हो गई है.

खरहरी और धमनागुड़ी दोनों ही गांव की आबादी तीन हजार के लगभग है. ऐसा नहीं है कि इस गांव में लोग पढ़े लिखे नहीं है गांव की बड़ी आबादी हाई स्कूल पास है. नौजवान लड़के- लड़कियां कॉलेज भी पढ़ने जाते हैं लेकिन वो घर के बड़े बुजुर्गों के निर्देशों की अवहेलना नहीं करते. धमनागुड़ी गांव के रहने वाले किशोर साहू बिलासपुर के एक कॉलेज में एम.ए. फाइनल की पढ़ाई कर रहे हैं, वो बताते हैं कि एक- दो बार उन्होंने होली खेलने की कोशिश की लेकिन उन्हें और उनके परिवार को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा. इसके लिए उन्हें घर में फटकार भी लगाई गई.

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हालांकि छत्तीसगढ़ अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉक्टर दिनेश मिश्रा इसे बकवास करार देते हैं. उनके मुताबिक 200 साल पहले की कोई घटना मान्यता बन गई होगी लेकिन यह सुनी सुनाई घटना होगी इसका कोई परिक्षण और प्रमाण स्पष्ट नहीं है. उनके मुताबिक यह अंधविश्वास के अलावा कुछ और नहीं है.

आजतक की टीम इस गांव का दौरा करने गई तब यह बात साफ हुई कि गांव की बड़ी आबादी अंधविश्वास की चपेट में है. वहां होली पर ना तो कोई फाग गीत या धमाचौकड़ी होती है और ना ही रंग गुलाल की दुकानें सजती हैं. अंधविश्वास को धत्ता बता कर होली खेलने का अनुरोध करने पर ग्रामीणों के चेहरे लाल पीले होने लगते हैं. वे ऐसे अनुरोध को खारिज कर देते हैं. साथ ही किसी अनिष्ट की शंका कुशंका जाहिर कर होली खेलने और तिलक तक लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते.

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