छत्तीसगढ़ में वन अधिकार कानून और इसके तहत जंगल में रहने वाली आबादी को उनके घरों के पट्टे देने पर विवाद छिड़ गया है. वन विभाग की एक रिपोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार के वन अधिकार कानून पर सवालिया निशान लगाया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जंगल के भीतर बसे आदिवासियों को उनके घरों के पट्टे देने से इंसानों और हाथियों के बीच चल रहा संघर्ष अधिक गंभीर हो जाएगा.
छत्तीसगढ़ में हर साल हाथियों के हमले से लगभग सौ से ज्यादा लोग मारे जाते है. दूसरी ओर राज्य की बीजेपी सरकार ने विधान सभा चुनाव में चौथी बार जीत दर्ज करने के लिए जंगल के भीतर बसी एक बड़ी आबादी को वन अधिकार पट्टा देने की झड़ी लगा दी है. मात्र चार वर्ष में बीस लाख एकड़ जमीन का टाइटल आदिवासियों को दे दिया गया है.
सरकार की कोशिश है कि आने वाले तीन माह के भीतर सात लाख आदिवासियों को लगभग 30 लाख एकड़ जमीन के पट्टे दिए जाएं. ताकि जंगल के भीतर बसे ये वनवासी अब वहां स्थाई मकान बना सकें. दूसरी ओर वनों के भीतर इंसानी आबादी बसाने को लेकर राज्य का वन विभाग सरकार को ही आड़े हाथों ले रहा है.
छत्तीसगढ़ में इससे 2 लाख 20 हजार 613 वनवासी लाभान्वित हुए है. अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में उन्होंने 3 लाख 73 हजार 718 आदिवासी परिवारों को वन अधिकार पट्टा दे दिया है. इतने ही और परिवार वालों को वन अधिकार पट्टा देने की तैयारी में सरकार जुटी है. इन पट्टों के वितरण के बाद वन विभाग पट्टाधारी आदिवासियों को जंगल से नहीं खदेड़ पाएगा. अब ये आदिवासी जंगल के भीतर ही स्थाई रूप से अपने पक्के मकान बना सकेंगे.
दरअसल, जंगल और जंगली जानवरों को बचाने के लिए अभी तक वन विभाग घने जंगलों के भीतर बसी आबादी को वहां से खदेड़ कर दूसरे सुरक्षित ठिकानों की ओर शिफ्ट करने पर जुटा था, लेकिन वन अधिकार कानून के डंडे ने वन विभाग को पंगु बना दिया. अब जंगल के भीतर बसे लोगों को सरकार खदेड़ेगी नहीं बल्कि उन्हें वहां स्थाई रूप से बसाने के लिए सहायता करेगी.
वन विभाग की इस रिपोर्ट से आदिवासी इलाकों में काम कर रहे सामाजिक और स्वयं सेवी संगठन भड़के हुए है. उनका आरोप है कि खनन माफियाओं से सांठ-गांठ कर यह रिपोर्ट तैयार की गई है. उनके मुताबिक जंगलों के भीतर सरकार ने अवैध रूप से कोल ब्लॉक आवंटित किए है. इसके चलते वन भूमि में अतिक्रमण हुआ और हाथियों समेत कई जंगली जानवर इंसानी बस्ती का रुख करने लगे.
वन विभाग की यह वह रिपोर्ट है जिसने सिर्फ वनवासियों ही नहीं बल्कि पर्यावरणविदों को भी आमने-सामने खड़ा कर दिया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक घने जंगलों के भीतर रहने वाले ग्रामीण अतिक्रमण करके खेती किसानी करते हैं. इसमें वो कटहल, आम, केला, महुआ जैसी फसले उगाते हैं.
इन्ही फसलों को खाने के लिए हाथी जंगल से निकलकर अतिक्रमण वाले आबादी हिस्से में आ जाते हैं. जिसके कारण मानव-हाथी के बीच आमना-सामना हो जाता है. इस रिपोर्ट में साफतौर पर लिखा है कि हाथी के हमले से अगर ग्रामीणों की मौत हो रही है, तो इसके लिए वन अधिकार अधिनियम के तहत दिया जाने वाला पट्टा ही जिम्मेदार है.
छत्तीसगढ़ में हर साल हाथियों के हमले से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. वर्ष 2012 में हाथियों के हमले से 63 ग्रामीण मारे गए या फिर स्थाई रूप से अपंग हो गए. 2014 में 96, 2015 में 116, 2016 में 138 और 31 मई 2017 तक यह आंकड़ा बढ़कर 188 के करीब पहुंच गया है.
साफ़ है कि इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि इस संघर्ष में सिर्फ इंसान ही मारे जा रहे है. इंसानी हमलों में बीते पांच वर्षों में 26 हाथियों की मौत भी हो चुकी है. कभी इंसानों ने करंट लगाकर हाथियों को मौत के घाट उतारा तो कभी जहर देकर.
छत्तीसगढ़ में उड़ीसा और झारखंड की सरहद से हाथियों की नियमित आवाजाही होती है. राज्य के एक दर्जन से ज्यादा जिलों में लोग हाथियों के हमले से परेशान है. झारखंड की सरहद पर स्थित जशपुर, अम्बिकापुर, बलरामपुर, सूरजपुर जबकि उड़ीसा की सरहद पर स्थित रायगढ़, कोरबा, बैकुंठपुर, महासमुंद, और सारंगढ़ में इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष के हालात है. हाथियों के हमलों में कभी इंसानों की तो कभी हाथियों की मौत हो रही है.