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किसानों को नहीं मिल रहा गेहूं का उचित मूल्य, विरोध प्रदर्शन की तैयारी

सब्जी उत्पादक किसानों की तरह अब गेहूं उत्पादक किसानों की हालत भी पतली हो गई है. अगर सरकार ने गेहूं आयात पर समय रहते कोई ठोस फैसला नहीं लिया, तो गेहूं को भी सड़कों में फेककर प्रदर्शन करने के अलावा किसानों के पास कोई दुसरा रास्ता नहीं होगा.

किसानों को नहीं मिल रहा गेहूं का उचित मूल्य किसानों को नहीं मिल रहा गेहूं का उचित मूल्य

उत्पादन का सही मूल्य नहीं मिलने की वजह से किसान एक बार फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू करने की तैयारी में हैं. इससे कुछ दिन पहले भी किसानों ने उचित मूल्य नहीं मिलने पर विरोध करते हुए टमाटर और प्याज को सड़कों पर फेक दिया था. सब्जी उत्पादक किसानों की तर्ज पर इस बार गेहूं उत्पादक किसान ऐसा ही विरोध प्रदर्शन करने की योजना में हैं.

पिछली बार ग्राहक और सरकारी एजेंसियां टमाटर और प्याज को उचित मूल्य में खरीदने को राजी नहीं हुए थे, तो किसानों ने इनको सड़क पर फेंककर विरोध जताया था. किसानों की उत्पादन लागत भी नहीं निकल पा रही थी. लिहाजा किसानों ने सरकार की आंख खोलने के लिए फसलों को नष्ट करने का फैसला किया था.

सब्जी उत्पादक किसानों की तरह अब गेहूं उत्पादक किसानों की हालत भी पतली हो गई है. अगर सरकार ने गेहूं आयात पर समय रहते कोई ठोस फैसला नहीं लिया, तो गेहूं को भी सड़कों में फेककर प्रदर्शन करने के अलावा किसानों के पास कोई दुसरा रास्ता नहीं होगा. न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदने के लिए न तो कोई खुले बाजार में तैयार है और न ही अभी तक सरकार कोई कारगर व्यवस्था कर पाई है. ऐसे में घरेलू बाजार में गेहूं की कीमत में जबरदस्त गिरावट आ गई है.

गेहूं से ठसाठस भरे हैं गोदाम

पिछले रबी सीजन में गेहूं की पैदावार सर्वाधिक 9.6 करोड़ टन रही. उसी अनुपात में सरकारी एजेंसियों ने गेहूं की जमकर खरीददारी की. भारतीय खाद्य निगम के गोदाम गेहूं से ठसाठस भरे हुए हैं. गेहूं उत्पादक राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में सरकार के सभी गोदाम गेहूं से पटे पड़े हैं. इसके बावजूद देश के विभिन्न बंदरगाहों में 15 लाख टन आयातित गेहूं पहुंच चुका है, जबकि इससे कहीं अधिक गेहूं का विदेशों में सौदा हो चुका है.

सरकार ने 1725 रुपये प्रति क्विंटल रखा है गेहूं का समर्थन मूल्य

गेहूं की यह खेप भी जल्द ही बंदरगाहों में उतरने वाली है यानी देश में अब गेहूं ही गेहूं नजर आने वाला है. ऐसे में इसका और सस्ता होना लाजमी है. केंद्र सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य 1725 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन मंडियों में इस दाम में कोई भी गेहूं को खरीदने को तैयार नहीं है. चाहे गेहूं किसी भी किस्म का हो, लेकिन किसानों को हजार रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा की रकम देने को कोई तैयार नहीं है. खरीददार बंदरगाहों में पड़े गेहूं का खुले बाजार में आने का इंतजार कर रहे है.  

गेहूं के आयात पर रोक नहीं लगी, तो होगा बुरा हाल

छत्तीसगढ़ संयुक्त किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंदर पांडे ने कहा कि सरकार को गेहूं के आयात पर तत्काल रोक लगानी होगी, वरना गेहूं उत्पादक किसानों का बुरा हाल होगा. किसानों को गेहूं का न तो समर्थन मूल्य मिलेगा और न ही खेत खलियानों में रखा गेहूं उठेगा. उन्होंने अंदेशा जाहिर किया कि नुक्सान की वजह से किसानों की आत्महत्याओं के मामले बढ़ेंगे. क्योकि आयातित गेहूं सस्ता होगा और ऐसे में ग्राहक आखिर क्यों देशी गेहूं खरीदेगा?

इस बार 20 फीसदी ज्यादा रही पैदावार

पिछली बार हुए गेहूं के उत्पादन की तुलना में इस बार बीस फीसदी ज्यादा पैदावार हुई है. ज्यादातर किसान अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से मंडियों में ही गेहूं की फसल बेचते हैं. क्योकि यहां उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने की गारंटी होती है, जोकि खुले बाजार में नहीं होती. इस बार मंडियों में गेहूं पहुंच रहा है, लेकिन खरीददारों का टोटा है.

सरकारी एजेंसियों ने तय नहीं किया मापदंड

सरकारी एजेंसियों ने भी अभी तक गेहूं खरीदने का कोई मापदंड नहीं बनाया है. लिहाजा यह नहीं कहा जा सकता है कि FCI किसानों का पूरा गेहूं खरीदने को तैयार होगी. किसानों को चिंता इसी बात की है कि सरकारी और गैर सरकारी गोदाम गेहूं से भरे पड़े हैं, तो FCI कहीं गेहूं की खरीददारी को लेकर कंजूसी न कर जाए. राज्य सरकारों को जो सर्क्युलर भेजा गया है, उसमें किसानों की शत प्रतिशत फसल लेने का कोई उल्लेख भी नहीं है.

कृषि मंत्री ने किसानों को दिया भरोसा

उधर राज्य के कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि FCI से चर्चा कर उनकी अधिकतम फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ली जाएगी. गेहूं आयात पर यदि सरकार ने जल्द कोई फैसला नहीं लिया, तो घरेलु बजार मे इसकी जबरदस्त आवक से मांग घट जाएगी. ऐसे में किसानों का नुक्सान होना तय है. जिन राज्यों में गेहूं की पैदावार नहीं होती, वहां के व्यापारी आयातित गेहूं की खरीददारी के लिए कमर कस चुके हैं. वे मंडियों की बजाय खुले बाजार का रुख कर रहे हैं.

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