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बिहारः रंगकर्मी साजिना राहत का निधन... 7 दिन तक फ्लैट में पड़ी रही बॉडी, ऐसे हुआ खुलासा

पटना की रंगकर्मी साजिना राहत की मौत का मामला सामने आया है. बताया जा रहा है कि उनकी बॉडी 7 दिन तक फ्लैट में पड़ी रही, जब पड़ोसियों को दुर्गंध आई तो उन्होंने पुलिस को इसकी सूचना दी. साजिना अपने पति से अलग रह रही थीं. साजिना सामाजिक मुद्दों को लेकर काफी एक्टिव रहती थीं. साजिना की सहयोगी निवेदिता झा ने कहा कि उन्होंने पत्रकारिता भी की थी, लेकिन साजिना मन से रंगकर्मी थीं.

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रंगकर्मी साजिया राहत (फाइल फोटो)
रंगकर्मी साजिया राहत (फाइल फोटो)

पटना में एक रंगकर्मी की मौत का मामला सामने आया है. सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाली रंगकर्मी साजिना राहत की मौत हो गई है. साजिना के निधन से हर कोई दंग है. जानकारी के मुताबिक साजिया राहत की बॉडी 7 दिन तक फ़्लैट में पड़ी रही. जब आसपास के लोगों को दुर्गंध आई, तब उन्होंने पुलिस को सूचित किया. जानकारी पाकर पुलिस मौके पर पहुंची और साजिया की बॉडी को रिकवर किया.

साजिना अपने पति सफदर इमाम कादरी से अलग रह रही थीं. उनका एक बेटा और एक बेटी भी है. दोनों बच्चे दिल्ली में रहते हैं. बेटा रणजी मैच खेलता है. साजिना की मौत के बाद उनके सहकर्मी गहरे शोक में डूब गए हैं. बताया जा रहा है कि साजिना राहत की मौत हार्ट अटैक से हुई है. साजिना को जानने वाले लोगों का कहना है कि साजिना की मौत इस हाल में होगी, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.

साजिना को जानने वाले कहते हैं कि सामाजिक मूल्यों को लेकर जब भी पटना में कोई धरना या प्रदर्शन होता था तो साजिना उसमें जरूर शामिल होती थीं, साजिना राहत सोशल स्तर पर काफी एक्टिव थीं. वह हर सामाजिक गतिविधि में शामिल होती थीं.

जानकारी के मुताबिक साजिना कविताएं भी लिखती थीं. पति से अलग होने के बाद उन्हें आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा. तब दोस्तों ने उन्हें काफी मदद की थी. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें पति से हक़ मिला तो उनकी आर्थिक परेशानी तो दूर हो गई लेकिन जिंदगी में अकेलापन था. बाद के दिनों में उनका अपने दोस्तों से भी संपर्क टूट गया था.

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साजिना की सहयोगी निवेदिता झा ने कहा कि उन्होंने पत्रकारिता भी की थी, लेकिन साजिना मन से रंगकर्मी थीं. उन्होंने यूनिसेफ के लिए भी काम किया था. अकेलेपन की त्रासदी ने उनकी जान ले ली. उन्होंने कहा कि साजिना हमेशा से ऐसी नहीं थी, वो हर गतिविधियों से जुड़ी रही थीं. अकेलेपन में कविताएं ही उनका सहारा थीं. 

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