अपने जमाने के समय की पॉपुलर टीवी शो कहानी घर-घर की ने लगभग 14 साल बाद टीवी पर वापसी की है. इतने पुराने आइकॉनिक शो की वापसी पर चैनल द्वारा उठाए गए कदम से खुद इसके स्टारकास्ट भी हैरान हैं. शो में ओम के नाम से घर-घर पर फेमस हुए किरण कर्माकर भी खुद यह समझ नहीं पा रहे हैं, हालांकि उन्हें इस बात की खुशी है कि उनके इस शो को आज भी दर्शक उतना ही प्यार देते हैं. किरण ने आजतक डॉट इन से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान शो से जुड़ी कई दिलचस्प किस्सों को शेयर करते हैं.
किरण कर्माकर बताते हैं, मुझे तो कुछ दिन पहले ही पता चला, जब स्टार की टीम ने मुझसे इंटरव्यू के लिए कॉन्टैक्ट किया था. मैं हैरान था, फिर सोचा चलो अच्छी बात है कि पब्लिक के बीच हमारी डिमांड अभी भी बरकरार है. अब तो बहुत कुछ बदल गया है. ओम का किरदार ही मेरी पहचान बन गई थी. लोगों को शायद ही मेरा असल नाम पता हो.
बालाजी ऑफिस वाले एक रूम हॉल में होता था शूट
टेलीविजन के बदलते दौर पर किरण कहते हैं, कहानी बनाने का तरीका बदला है. अब स्पीड में कहानियां बताई जाती हैं. बहुत ज्यादा पैसा आ गया है. मुझे याद है जब हम शूटिंग किया करते थे, वो वक्त ही अलग था. हम तीन कैमरे के सामने शूट कर चुके हैं. सीन का रिहर्सल किया, तीन कैमरे का सेटअप है और चौथा वॉल ही नहीं होता था. यह एकदम थिएटर की तरह होता था. राइट, लेफ्ट और सामने कैमरा लगा होता था. कहानी घर-घर की पहले दो साल की शूटिंग तो बहुत ही बेसिक के बड़े कमरे में किया था. जिसकी ऊंचाई अमूमन घरों की सीलिंग तक होती थी. कह लें एक बड़ा हॉल होता था, मजेदार बात यह है कि यह बालाजी के ऑफिस के बिल्डिंग में ही था, तीसरी मंजिल पर. वहीं शूट करते थे, हॉल में तीन सेटअप कैमरा. शेट शुरू होते ही खत्म हो जाए. फिर हम भव्य सेट पर गए, तबतक तो लोगों को शो पंसद आ चुका था. अब तो महल की तरह सेट बनाए जाते हैं, उसके बावजूद चार महीने में शोज बंद हो जाते हैं. इसका बड़ा कारण है कि हम क्वांटीटी के चक्कर में क्वालिटी से समझौता करते जा रहे हैं. हम टीवी शोज में वीएफएक्स लेकर आ गए हैं, आप आम दर्शकों को थिएटर जैसा एक्शन परोसोगे, तो वो कितना ही रिलेट कर पाएंगे. लोग पैसा इतना डालते हैं और उन्हें रिजल्ट भी फॉरन चाहिए, शायद इन्हीं कारणों से अब टीवी शोज का जीवन तीन से चार महीने तक ही रह पाता है.
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ऑटो वाले से लेकर यश चोपड़ा तक पहचानने लगे थे
किरण कहानी के शो को अपने दिल के करीब मानते हैं, शो की यादों को ताजा करते हुए किरण बताते हैं, जब मेरे पास शो का ऑफर आया, तो मुझसे यही कहा गया था कि रामायण बना रहे हैं और तुम्हें राम बनना है. उस वक्त मैं एकता का ही शो घर एक मंदिर कर रहा था. मुझे शो का कॉन्सेप्ट कुछ यूं समझाया गया था कि घर में रामराज्य है और तुम मेन रोल राम का करोगे. इन दो लाइनर की स्टोरी सुनकर मैंने हामी भर दी थी. इस शो ने मुझे पहचान दी, कि मैं कौन हूं और कैसा काम करता हूं. इससे पहले मुझे अपनी तस्वीरें दिखाकर लोगों से काम मांगना पड़ता था. मैं जहां जाता था, लोग मुझे पहचान लेते थे. पहले तो सोशल मीडिया नहीं था, तो आपको पॉपुलैरिटी का अंदाजा नहीं होता था. मुझे याद है शो के तीन महीने बाद ही ऑटो वाला, फैंसी रेस्त्रां, पब्लिक प्लेस कहीं भी पहुंचता, तो लोग आकर कहते, ओम कैसे हो. फिर मेरा नाम ओम ही पड़ गया. मुझे याद है एक पुलिस फंक्शन था, वहां यश चोपड़ा जी आए हुए थे, तो उन्होंने मुझे देखते हुए कहा कि तुम्हारा काम देखा है, तुम्हें जानता हूं. बस वहीं लगा कि एक्टर बनना सफल हो गया.
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ओम की इमेज की वजह से पब्लिक में ड्रिंक करने से करता था परहेज
मर्यादा पुरूष वाली इमेज लिए ओम किरदार की वजह से किरण को पब्लिक प्लेस में भी कई तरह की सजगता बरतनी पड़ती थी. जिस पर किरण कहते हैं, इस ओम की इमेज की वजह से मुझे असल जिंदगी में कई बार सजग रहना पड़ता था. फैंस आपको कोई गलती करता देख बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. एक किस्सा याद है, मैं किसी काम के सिलसिले से महाबलेश्वर जा रहा था. देर रात हो चुकी थी, हमें डिनर करने के लिए एक होटल के पास रूके, मैं भूखा था लेकिन दोस्तों संग जाकर खाना नहीं खा सकता था. इसके दो कारण थे, एक तो मैं थका हुआ था, पसीने से मैला हुआ था, तो ऐसी छवि लेकर उनके बीच जा नहीं सकता. इसके अलावा मैंने थोड़ा ड्रिंक भी किया था, तो मैं नहीं चाहता कि होटल में कोई महिला, बच्चा या बुजुर्ग जब मेरे पास आएं, तो मैं उनसे बात करने से इंकार कर दूं. इसलिए मैं कार में ही बैठा रहा और दोस्तों को खाना पार्सल लाने को कह दिया था. मुझे पता है एक्टर इस प्यार और पहचान के लिए मरते हैं, मैं ड्रिंक कर उनके बीच नहीं जा सकता था. लोग आपको रिस्पेक्ट की तरह देखते हैं और आप वो इज्जत खोना नहीं चाहते हैं.
एक घंटे की नींद पर तीन दिन तक शूट करता रहा
मैंने उन दिनों कहानी के साथ-साथ एक मराठी फिल्म भी साइन कर ली थी, जिसका सेट मालाड में था, मैं रहने वाला हूं ठाणे का और कहानी का सेट था बालाजी के ऑफिस पर, मॉर्निंग में कहानी की शूट और रात में फिल्म की शूटिंग लगातार करता रहा. मैं अंधेरी में एक दोस्त के घर रेस्ट के लिए एक घंटे जाता. आप यकीन करें, तीन दिन और तीन रात लगातार मैंने एक घंटे की नींद पर इन दोनों प्रोजेक्ट की शूटिंग की है. मैं आज भी घबरा जाता हूं कि मैंने कैसे कर लिया था. तीसरी रात का किस्सा बताता हूं, सेट के अंदर जहां कॉस्ट्यूम की ट्रंक लगी थी, उस पर मैं सो रहा था. सुबह के चार बज रहा था, सब देखकर मुझे हंस रहे थे. उस दिन डायरेक्टर को हाथ जोड़ते हुए रोते कहा कि प्लीज मुझे पैकअप कर घर जाने दें. कहानी के वापस एंट्री सीक्वल के दौरान तो मैंने 24 घंटे लगातार शूट किया है. उन दिनों क्लिक निक्सन स्टूडियो में कहानी का सेट लग चुका था. मैं मॉर्निंग में गया, तो सेट के बाहर सुशांत सिंह राजपूत, राम कपूर दोनों खड़े होकर बात कर रहे थे. उनको हाय हेलो बोलकर सेट पर गया और दूसरे दिन मॉर्निंग में पैकअप कर लौट रहा था, तो वापस वही लोग वहां खड़े थे, उन्होंने फिर कहा कि वापस आ गए इतनी जल्दी, मैंने उन्हें कहा कि गया ही नहीं था.. ये पागलपन वाली शूटिंग हुआ करती थी.