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वेब सीरीज में फिल्मी फॉर्मूले को अपनाना पड़ सकता है बॉलीवुड को महंगा

दि स्पाई और शेरनोबेल जैसे बेहतरीन शोज के दौर में अगर स्क्रिप्ट्स और कंटेंट को लेकर भारत ढुलमुल रवैया अपनाता है तो भारतीय इंडस्ट्री के लिए आगे आने वाला समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

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इमरान हाशमी
इमरान हाशमी

इमरान हाशमी स्टारर वेब सीरीज़ 'द बार्ड ऑफ ब्लड' का दर्शकों का बेसब्री से इंतजार था. शाहरुख खान का प्रोडक्शन हाउस, शो की इंप्रेसिव स्टारकास्ट को देखते हुए नेटफ्लिक्स की इस सीरीज से लोगों को काफी उम्मीद थी. लेकिन ये सीरीज ऊंची दुकान और फीके पकवान की तर्ज पर खास कमाल नहीं दिखा पाई.

इस सीरीज़ की सबसे बड़ी खामी थी कि इसने सिनेमा के बुनियादी उसूलों को ही पलट कर रख दिया. एक विजुएल माध्यम होने के कारण कम से कम या केवल जरूरी शब्दों के साथ फिल्म की कहानी का ताना बाना बुना जाता है और विजुएल्स के जरिए फिल्म की कहानी को लय दी जाती है. इसके सहारे ऑडियन्स को एंगेज करने की खूबसूरती से कोशिश की जाती है. लेकिन इस सीरीज में इतनी बार डायलॉग्स द्वारा जाहिर सी बातों को बयां किया जाता रहा, जिससे ऐसा फील होने लगता है कि वेब सीरीज नहीं बल्कि स्कूल में बैठकर कोई बोरिंग लेक्चर सुनाया जा रहा है.

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इस सीरीज में बने बनाए ढर्रों पर ही कुछ चीज़ों को दिखाया गया और स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने की कोई कोशिश नहीं हुई. मसलन इस सीरीज में दाढ़ी वाले मुसलमान जिहाद के लिए आवाज उठाने में व्यस्त थे, वहीं बिना दाढ़ी वाले शरीफ मुसलमानों को लिबरल प्रोग्रेसिव ही दिखाया गया. यानि किसी भी तरह का फ्रेश नजरिया इस सीरीज को देखने पर नहीं मिलता है. वही सीरीज के राइटर की बिखरी राइटिंग ने विनीत, सोभिता और इमरान जैसे अच्छे कलाकारों को भी अपनी रेंज दिखाने का मौका नहीं दिया.

इसके अलावा मनोज वाजपेयी की वेब सीरीज द फैमिली मैन अपने कॉन्सेप्ट और अनबायस्ड स्टोरी के जरिए जरूर प्रशंसा बटोर रही है. लेकिन कई गंभीर सिनेमाप्रेमियों की भी इस शो से काफी शिकायते हैं जिनमें सबसे प्रमुख यही है कि ये शो काफी प्रीडिक्टेबल था और उन्हें साफ समझ आ रहा था कि आगे सीरीज़ में क्या होने वाला है.

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सवाल ये उठता है कि क्या इंडियन प्रोड्यूसर्स फिल्मों में औसत कंटेंट को भी नेटफ्लिक्स और एमेजॉन की ग्लोबल ऑडियंस के सामने दोहराने की गलतियां कर रहे हैं? बॉलीवुड की कई फिल्मों में अक्सर सिनेमाटोग्राफी शानदार होती है जैसा कि बार्ड ऑफ ब्लड में देखने को मिला. लेकिन कंटेंट का स्तर बेहतर नहीं होता है लेकिन कुछ स्टार्स अपने स्टारडम के चलते इन फिल्मों को हिट कराने में कामयाब हो जाते हैं लेकिन साफ है कि स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स की दुनिया में ये पैंतरा काम करने वाला नहीं है.

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करण जौहर हाल ही में इंडिया टुडे के माइंडरॉक्स सेशन में भी ये कह चुके हैं कि आज के दौर में सुपरस्टार पावर का कॉन्सेप्ट धीरे धीरे खत्म हो रहा है और अगर कोई सुपरस्टार आज के दौर में है तो वो कंटेंट है. ऐसे में, दि स्पाई और शेरनोबेल जैसे बेहतरीन शोज के दौर में अगर स्क्रिप्ट्स और कंटेंट को लेकर भारत ढुलमुल रवैया अपनाता है तो भारतीय इंडस्ट्री के लिए आगे आने वाला समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

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