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फेविकोल का नया एड: राजस्थान के पांडे हाउस का निकला असली सोफा, ये है इसके बनने की कहानी

फेविकोल के क्रिएटिव एड हमेशा से लोगों का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं. इस बार क्रिएटिव तरीके से एड के जरिए ब्रांड की अहमियत बताई गई है. वैसे ये बात दूसरी है कि तारीफ के साथ एड को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है. अब इसे बनाने वाले ने पहली बार बताया कि कहां से प्रेरणा मिली और कैसे तैयार हुआ ये एड.

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विज्ञापन का एक स्टिल
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एक अच्छा विज्ञापन आसानी से लोगों प्रभावित करता है. विज्ञापन जितना बेहतर होता है, दर्शक उसे उतना ही याद करते हैं. टीवी और सोशल मीडिया पर इन दिनों एक विज्ञापन खूब चर्चा में है. ये नया एड है Pidilite के फेविकोल का. इसमें एक सोफे की कहानी दिखाई गई है. फेविकोल ने अपने 60 साल पूरे होने के जश्न में ये नया एड लॉन्च किया.

फेविकोल के क्रिएटिव एड हमेशा से लोगों का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं. इस बार क्रिएटिव तरीके से एड के जरिए ब्रांड की अहमियत बताई गई है. वैसे ये बात दूसरी है कि तारीफ के साथ एड को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है. सोशल मीडिया में कुछ लोगों ने एड जातिवादी करार दिया है और सवाल उठाया कि इसमें शर्माइन, मिसिराइन जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों किया गया है.

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कुछ लोग एड पर धुन चोरी करने का भी आरोप लगा रहे हैं. खैर इन सब के बावजूद एड ट्रेंड में बना हुआ है. एक एड के जरिए ये दिखाना कि कैसे एक सोफा पीढ़ी दर पीढ़ी मजबूत बना रहा. 60 साल तक सोफे के बने रहने की कहानी दिलचस्प है. लेकिन इस एड के पीछे सोफे की असली कहानी क्या है यह नहीं पता. अब इस एड को बनाने वालों ने सोफे के पीछे की कहानी को साझा किया और बताया कि इसके बनने की प्रेरणा कहां से मिली.

एडमैन और फिल्ममेकर प्रसून पांडे ने सोफे के पीछे की पूरी कहानी इकोनॉमिक टाइम्स से एक बातचीत में बताई है. प्रसून ने कहा- "तकरीबन एक साल पहले Pidilite के चेयरमैन मधुरकर पारीख और Pidilite के एमडी के बीच एक 1 मिनट की मीटिंग हुई थी. जिसके बाद ये प्लान किया गया कि अब फेविकोल के नए एड की जरूरत है. ये पहली मीटिंग थी. दूसरी मीटिंग 7 महीने बाद हुई. मीटिंग आधे घंटे तक चली. मीटिंग के पहले 10 मिनट में ही एड के आइडिया को काफी पसंद और अप्रूव किया गया."

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"हालांकि, फेविकोल के 60 साल के सफर को एक स्क्रिप्ट में दिखाना बेहद ही मुश्किल था. लेकिन 90 सेकेंड की एक फिल्म के लिए के लिए स्क्रिप्ट तैयार की गई और स्क्रिप्ट थी फेविकोल सोफा. फेविकोल सोफा का आइडिया जितना सिंपल था उतना ही मुश्किल उसे एक्सप्लेन करना था. लेकिन उसकी स्क्रिप्ट को तारीफ की गई. सभी जानते हैं कि फेविकोल की जड़ें भारतीय सिद्धांतों से जुड़ी हुई हैं."

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प्रसून ने कहा- "जयपुर के पांडे हाउस में एक सोफा था इसी से इस एड की प्रेरणा मिली. काउच को मेरे पापा 1946 में लखनऊ से लेकर आए थे. जब ब्रिटिश अपने सामान को बेचकर जा रहे थे. हमारे घर में जो सामान आया था उसमें दो सिंगल चेयर और दो साइड टेबल आई थी. जिसे सोफे में बदला गया. जब ये सोफा आया था तो अलग था, लेकिन बाद में इस सोफे को कई अवतार दिए गए."

"जब हम स्कूल में थे तो ये ऑरेंज कलर का था. लेकिन जब हमारी बहन की शादी हुई तबू तक इसे कई लुक दिए जा चुके थे. ऐसी और भी कई कहानी हैं जिससे सोफा फिल्म तैयार करने में मदद मिली."

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