scorecardresearch
 

डीवी पलुस्कर को याद करते हुए: रे मन राम नाम तू जप

पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर का गाया हुआ एक भजन है, रे मन राम नाम तू जप. राग है ललित. साढ़े तीन मिनट के उस भजन में क्षणों का आलाप करुणा का आलोक रच जाता है, हमारी आत्मा को घेर कर बैठ जाता है. हम स्तब्ध सुनते हैं, बजने के दौरान, बजने के बाद तक, समय के अनंत में.

Advertisement
X
DV Paluskar
DV Paluskar

पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर का गाया हुआ एक भजन है, रे मन राम नाम तू जप. राग है ललित. सुबह की वेला में गाया जाने वाला यह राग अपने मूल स्वर में उदास है. साढ़े तीन मिनट के उस भजन में क्षणों का आलाप करुणा का आलोक रच जाता है, हमारी आत्मा को घेर कर बैठ जाता है. हम स्तब्ध सुनते हैं, बजने के दौरान, बजने के बाद तक, समय के अनंत में. उनके अपूर्व स्वर में वेदना की नदी बहती है जो हृदय के मैदान में उतरती चली जाती है, नीचे देह हमेशा नम रह जाती है. नई पीढ़ी भले ही डीवी पलुस्कर के नाम से नावाकिफ हो, लेकिन भजन और शास्त्रीय संगीत की दुनिया में वह एक जादू से कम नहीं थे. 1955 में 34 साल की उम्र में वह आज ही के दिन (26 अक्टूबर) दुनिया छोड़ गए थे.

बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में कुछ विलक्षण शास्त्रीय गायकों के बीच डी वी पलुस्कर की उपस्थिति अलग थी. घरानों की सांगीतिक परंपरा से भिन्न अपने पिता के मुक्तिगान में उन्होंने उन्होंने स्वर साधना शुरू की थी. जिसे बाद में पंडित नारायणराव व्यास और पंडित विनायकराव पटवर्धन ने पुष्ट किया था. लेकिन डीवी पलुस्कर आलाप के अन्वेषक थे. उनमें गुरुज्ञान के पार उतरने की प्रभा थी. उनकी आवाज सरल, सहज, प्रत्यास्थता से पूर्ण थी. दक्ष लेकिन दिखावे से दूर. उनरे स्वरों की शब्दावलियां संक्षिप्त और स्पष्ट होतीं,प्रवाह नियत रहता. बिना बात के कलाबाजियों और विकृति से वे बहुत दूर थे. इसीलिए उनके भजन शास्त्रीयता का सुंदर निर्वहन करते हुए अपने स्वरूप में सरल हैं. कहीं कोई तड़क भड़क नहीं, निर्झर की तरह बहता हुआ. ठुमक चलत रामचंद्र, रघुपति राघव राजा राम, जब जानकीनाथ सहाय करे, पायो जी मैंने राम रतन धन पायों, कहां के पथिक, जैसे भजनों को सुनते हुए सहज ही ये अनुभव होता है.

Advertisement

महज 34 वर्ष के छोटे से जीवन में उन्होंने एक महान गायक के रूप में प्रसिद्धि पा ली. शास्त्रीयता से कभी कोई समझौता नहीं किया लेकिन लोकप्रियता अपार मिली . उनके गायन की आवृतियों का आलोक ही ऐसा था कि सुनने वाला उनसे एकात्म स्थापित कर लेता . गायन में वह स्थिति जहां गायक और श्रोता एक हो जाते हैं. श्रोता गायक को सुनते हुए अपनी आत्मा में मौन गाता है और गायक, स्तंभित श्रोता में अपनी तान को सुनता है, जिसकी चर्चा विदुषी किशोरी अमोणकर अक्सर करती हैं . राग बागेश्री के उदास आलाप , कामोद की मुदित तंत्रियां, ललित का विषाद, विभास का धुंधलापन, बिलासखानी तोड़ी का प्रवाह, हमीर की चंचलता, मियां की मल्हार का मन्द्र स्वर सब उनके कंठ से शुद्ध रूप में निकलते थे.

लेकिन स्वरों की शुद्धता के आग्रही पलुस्कर प्रयोग के विरोधी नहीं थे बैजू बावरा फिल्म में तानसेन और बैजू के बीच हुई गायन प्रतियोगिता को जीवंत करने के लिए जब पलुस्कर को उस्ताद अमीर खां साहब के साथ गाने को कहा गया तो वे सोच में पड़ गए. उन्हें शंका थी कि सिनेमा में गाते हुए उनकी स्वाभाविकता चली जाएगी, लेकिन बाद में वे गाने के लिए तैयार हो गए. वह गाना हिन्दी सिनेमा के इतिहास की महानतम शास्त्रीय रचनाओं में से एक है. "आज गावत मन मेरो झूम के", में एक ओर अमीर खां साहब हैं, दूसरी ओर पंडित डीवी पलुस्कर. पलुस्कर ने हर स्वर में महान गायक अमीर खां साहब को टक्कर दी है. आलाप से लेकर तार सप्तक पर खत्म होते द्रुत ताल तक. और जब वे तार सप्तक पर उस गाने को खत्म करते हैं तो उनके स्वरों में बिजली सी दौड़ जाती है. उस गाने का प्रभाव अमिट रह जाता है.

Advertisement

डीवी पलुस्कर ने महज 14 साल की उम्र में पहला शास्त्रीय गायन किया था.तभी ये बात साबित हो गई थी महान गायक, साधक विष्णु दिगंबर पलुस्कर की आखिरी संतान भारतीय शास्त्रीय संगीत में अमूल्य योगदान देने वाली है लेकिन 11 संतानों की अकाल मृत्यु का दंश झेलने वाले विष्णु दिगंबर पलुस्कर की आखिरी संतान को भी 34 वर्ष ही मिले.

विष्णु दिगंबर पलुस्कर बचपन में पटाखों की चिंगारी से नेत्रहीन हो गए थे, डीवी पलुस्कर उनकी गायन परंपरा को अंतर्दृष्टि से आगे ले जाने वाले योग्य पुत्र थे. लेकिन उन्हें भी ये अवसर नहीं मिला. दुख इस बात का है कि मृत्यु उन्हें तब ले गई जब रागों के शुद्ध रूप को भीतर उतार कर उन्होंने नई रागात्मकता की दीप्ति में अपने सुरों को देखना शुरू किया था.

चेहरा अगर आत्मा का दर्पण है तो डीवी पलुस्कर उसके अनन्य उदाहरण हैं. स्वर को साधने की दिव्यता उनके व्यक्तित्व पर छिटकी हुई थी,निर्मल ज्योत्सना की तरह . विष्णु दिगंबर पलुस्कर की वेदना और साधना का निचोड़ उनके पुत्र डी वी पलुस्कर में था.काश ! ईश्वर ने उन्हें थोड़ी आयु और दी होती.

Advertisement
Advertisement