स्टारप्लस पर आ रही महाभारत में स्वर्गलोक में अर्जुन को दिव्यास्त्रों की प्राप्ति हुई और भूलोक में भीम को मिला हनुमान जी का आशीर्वाद. आशीर्वाद लेने के बाद जब भीम वन में आगे की ओर बढ़े तो उनका सामना हुआ उनके पुत्र घटोत्कच से.
भीम कैसे मिले अपने पुत्र घटोत्कच से?
आगे ब्राह्मणों की टोली है हस्तिनापुर के यज्ञ से दान दक्षिणा लेकर लौट ही रही थी कि आगे उन्हें घटोत्कच मिल गया. जो उनमें से एक को ले जाना चाहता है बलि के लिए क्योंकि उसकी मां हिडिंबा मां शक्ति की पूजा कर रही है. तभी वहां भीम आ जाते हैं और खुद जाने की बात कहते हैं. भीम घटोत्कच के साथ घर आता है और जब हिडिंबा भीम को देखती है तो वो हैरान रह जाती है. और घटोत्कच को बताती है भीम उसके पिता हैं.
इस पर भीम क्रोधित होते हुए कहते हैं कि पहले मेरी बलि चढ़ाओ फिर घटोत्कच को बताना की मैं उसका पिता हूं. ये सुनकर हिडिंबा भीम से क्षमा मांगती है. अपनी गलती स्वीकार लेने पर भीम भी उसे क्षमा कर देते हैं और घटोत्कच को अपने सीने से लगाने के लिए व्याकुल हो जाते हैं तभी घटोत्कच अपने पिता भीम के चरण स्पर्श कर मानव रूप में आकर उनके गले लग जाता है. भीम हिडिंबा को बताते हैं कि वो पांडवों और द्रौपदी संग कुटीर में रह रहे हैं क्योंकि उन्हें 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला है. साथ ही भीम ये भी बताते हैं कि इस वनवास और अज्ञातवास के बाद महायुद्ध होगा कौरवों के साथ.
उर्वशी ने अर्जुन को दिया नपुंसक होने का श्राप?
स्वर्ग में इंद्रदेव सभी देवों के साथ अप्सरा के नृत्य का आनंद ले रहे हैं. तभी वहां अर्जुन दिव्यास्त्रों को प्राप्त करने के पश्चात वापस जाने की अनुमति लेने आते हैं. तब इंद्रदेव कहते हैं कि उसे गन्धर्वास्त्र नहीं प्राप्त हुआ है और चित्रसेन गंधर्व से उसे गन्धर्ववेद की शिक्षा लेने के लिए कहते हैं. तभी अर्जुन इंद्रदेव से प्रश्न करते हैं कि संगीत और नृत्य से एक योद्धा का क्या लेना देना? तब इंद्रा कहते हैं कि कला दिव्यास्त्रों में सबसे सबल अस्त्र है. इसपर अर्जुन कहते हैं कि वो युद्ध के उपरांत ये कला सीखने ज़रूर आएगा लेकिन इंद्रदेव उसे ज्ञात कराते हैं अज्ञातवास का. अर्जुन इंद्रदेव की आज्ञा लेकर चित्रसेन के चरण स्पर्श करते हैं. गुरु चित्रसेन से अर्जुन नृत्य सीखना शुरू कर देते हैं. अर्जुन की इन कलाओं पर वहां की अप्सरा उर्वशी उसपर न्योछावर हो जाती है और इंद्रदेव की आज्ञा लेकर वो पहुंच जाती है अर्जुन के पास जहां वो नृत्य और संगीत की कला सीख रहे होते हैं.
उर्वशी अपने भटकते मन का प्रश्न अर्जुन के समक्ष रखती हैं. तभी अपने लक्ष्य को पाने के लिए उर्वशी अपनी बाहों का जाल अर्जुन पर डालती है पर अर्जुन माना कर देते हैं और उर्वशी को मां का दर्जा देता है और याद दिलाता है कि उसके पूर्वज महाराज पुरुरवा उर्वशी की सौन्दर्यता पर मोहित हुए थे और उर्वशी भी उनकी पत्नी बनकर उनके साथ रही थीं. इसलिए अर्जुन, उर्वशी में माता कुंती और माता माधवी का ही रूप देखते हैं. उर्वशी क्रोध में आकर अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप दे दिया.
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उर्वशी, अर्जुन को नपुंसक का श्राप देकर इंद्रदेव के पास आती है जहां इंद्रदेव उसे कहते है कि उसने अप्सरा की मर्यादा का उलंघन किया है. इसपर उर्वशी हाथ जोड़कर क्षमा मांगती है और इंद्रदेव उसे अर्जुन के श्राप की आयु घटाकर एक वर्ष करने को कहते हैं. इंद्रदेव की आज्ञा मानकर उर्वशी वहां से चली जाती है. तभी अर्जुन इंद्रदेव के पास आते हैं और इंद्रदेव उसे बताते हैं कि उर्वशी ने अपने श्राप की सीमा घटाकर एक वर्ष के लिए कर दी है, और वो एक वर्ष अर्जुन चुन सकता है. इंद्रदेव उसे ये भी कहते हैं कि ये श्राप उसे अज्ञातवास में काम आएगा और अर्जुन को भूलोक में जाने की अनुमति देते हैं.
शुरू हुई युद्ध की तैयारियां
इधर, द्वारिका में अभिमन्यु की नटखट लीलाओं से सुभद्रा परेशान है. अभिमन्यु भागकर आकर मामा श्री कृष्ण के पीछे छिप जाता है और सुभद्रा अभिमन्यु को इधर उधर ढूंढती है. ये देख कृष्ण सुभद्रा को अपना बचपन बताने लगते हैं कि तभी अभिमन्यु बोल पड़ता है. सुभद्रा को डांट फटकार लगती है लेकिन कृष्ण अभिमन्यु को बचाते हुए सुभद्रा को बताते हैं कि उसका विवाह अर्जुन से इसीलिए हुआ है क्योंकि अभिमन्यु को आना था जो भविष्य की धरोहर है. अभिमन्यु कहता है कि उसे अपने पिताश्री जैसा धनुर्धर बनना है और जब वो अभ्यास करने लगता है तो उसकी माँ आकर कभी भोजन, तो कभी सांयकाल बोलकर उसका अभ्यास रोक देती हैं.
ये सुनकर कृष्ण हंसते हुए सुभद्रा को बताते हैं कि, " ये तपस्वी है और यही इसके मोक्ष का मार्ग है. इसे टोका ना करो. ये मानव इतिहास में सबसे कम आयु वाला महारथी होने वाला है और ये ऐसा युद्ध करेगा कि भूत, भविष्य और वर्तमान , तीनों ही इसे सदैव प्रणाम करते रहेंगे." युद्ध सुनकर सुभद्रा डर जाती है और कृष्ण उसे बताते हैं कि ये युद्ध इस युग में सत्य और असत्य, प्रकाश और अंधकार के बीच होगा. और अभिमान ऐसा रण जीतेगा की संसार के बड़े-बड़े योद्धा और महारथी इसे प्रणाम करेंगे.
वहां हस्तिनापुर में भीष्म और द्रोणाचार्य, विदुर से होने वाले युद्ध को रोकने का उपाय ढूंढने को कहते हैं. भीष्म चाहते हैं कि ये युद्ध ना हो, क्योंकि उस युद्ध में भीष्म चाहकर भी धर्म के पक्ष में नहीं लड़ सकेंगे क्योंकि वो प्रतिज्ञाबद्ध हैं और विवश होकर उन्हें अधर्मी दुर्योधन के लिए लड़ना पड़ेगा. भीष्म विदुर से ये भी कहते हैं कि जिस दिन युद्ध होगा उस दिन उनके सारे अस्त्र-शस्त्र दुर्योधन के साथ होंगे और आशीर्वाद पांडवों के साथ होगा.
जैसे -जैसे पांडवों के वनवास का 13 वर्ष सामने आ रहा है वैसे वैसे दुर्योधन की चिंता बढ़ती जा रही है क्योंकि उसे भीम का प्रण याद है और वो ये भी कहता है कि उसको और भीम को शिक्षा एक ही गुरु से मिली है. दोनों की नीतियां एक जैसी हैं, जीत उसकी भी हो सकती है और भीम की भी. वो युद्ध से नहीं डरता लेकिन वो भीम से हारना भी नहीं चाहता. इसपर युयुत्सु दुर्योधन को द्रोपदी के वस्त्रहरण पर ताने कसते हुए कहता है कि,"विनाश की चाप कभी सुनाई नहीं देती." ये सुनते ही दुर्योधन युयुत्सु पर आक्रमण करता है लेकिन कर्ण और दुशाशन उसे रोक लेते हैं. युयुत्सु वहां से चला जाता है.
अर्जुन दिव्यास्त्र लेकर अपने कुटीर वापस आता है और अपने भाइयों से मिलता है. नकुल और सहदेव, अर्जुन से पाशुपतास्त्र दिखाने को कहते हैं. अर्जुन पाशुपतास्त्र दिखता है और युधिष्ठर अर्जुन को पाशुपतास्त्र का प्रयोग करके दिखाने को कहता है. जैसे ही अर्जुन पाशुपतास्त्र को अपने धनुष में लगता है तभी आकाशवाणी होती है जो उसे चेतावनी देते हुए कहती है कि दिव्य शक्तियों का प्रयोग मानव कल्याण के लिए किया जाना चाहिए. पांचों पांडव क्षमा मांगते हैं और युधिष्टर अर्जुन को स्नान कर विश्राम करने को कहते हैं.
जयद्रथ ने किया द्रोपदी का हरण
वहां हस्तिनापुर में दुर्योधन अपने आपको मज़बूत बनाने की कोशिश में जुटा है. तभी कर्ण आकर दुर्योधन को शाल्व में हो रहे स्वयंवर में जाने का सुझाव देता है. लेकिन दुर्योधन युद्ध की तैयारी करना चाहता है इसलिए उसने शाल्व ना जाने का निश्चय किया. जयद्रथ शाल्व के स्वयंवर में जाने से पहले हस्तिनापुर की तरफ आ रहा होता है कि राह में उसकी भेंट हो जाती है द्रोपदी से.
जयद्रथ द्रोपदी का रास्ता रोककर उसपर बुरी नज़र डालता है और द्रोपदी के रोकने पर भी वो उसे जबरन उठाकर अपने रथ में बिठाता है और सारथी को सिन्धुदेश की ओर चलने का आदेश देता है. पांडव अपने कुटीर में आते हैं जहां उन्हें पांचाली नज़र नहीं आती. युधिष्टर अर्जुन और भीम को वन में भेजते हैं पांचाली को ढूंढने के लिए. बड़े भाई की आज्ञा लेकर अर्जुन और भीम जब वन में आते हैं तो उन्हें द्रोपदी के गागर के टुकड़े दिखाई देते हैं. साथ ही उन्हें व्यक्ति और घोड़े के पद चिन्ह भी दिखाई देते हैं और दोनों उन्हीं पदचिन्हों की राह पर जाते हैं. तभी उन्हें रास्ते मे एक बूढा व्यक्ति दिखता है जो उन्हें बताता है कि एक राजा ने किसी स्त्री का हरण किया है और वो एक कोस दूर निकल गए है . ये सुनकर भीम दौड़ लगा देता है और अर्जुन अपने अग्नि बाण से एक कोस दूर आग लगा देता है, जिसे देख जयद्रथ का रथ और सेना रुक जाते हैं.