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मैं जिस आदेश श्रीवास्तव को जानता हूं...

मैं जिस आदेश श्रीवास्तव को जानता हूं, मेरी नजर में उस आदेश का कद, उसके फिल्मी कद से कहीं ऊंचा है. चमक-दमक में घिरा फिल्मी जिंदगी का तारा. संगीत का सितारा. दोस्ती, इंसानियत, हमदर्दी और सरोकारों के उजालों से भरा.

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जाने-माने कवि-पत्रकार आलोक श्रीवास्तव, आदेश श्रीवास्तव के पारिवारिक मित्र हैं
जाने-माने कवि-पत्रकार आलोक श्रीवास्तव, आदेश श्रीवास्तव के पारिवारिक मित्र हैं

मैं जिस आदेश श्रीवास्तव को जानता हूं, मेरी नजर में उस आदेश का कद, उसके फिल्मी कद से कहीं ऊंचा है. चमक-दमक में घिरा फिल्मी जिंदगी का तारा. संगीत का सितारा. दोस्ती, इंसानियत, हमदर्दी और सरोकारों के उजालों से भरा. वो उजाला अब नहीं है. मैं मुंबई से दिल्ली लौट रहा हूं.

आज उसके शरीर को अपनी आंखों के सामने धूं-धूं कर जलते देखा है. पीली लपटों को नीले आकाश में खोते देखा है. लेकिन कलाकार कहां खोता है. वो तो जहाज के बगल वाली सीट पर बैठा अब भी गुनगुना रहा है. रागिनी बन के हवाओं में बिखर जाऊंगा, अब नई तर्ज, नया गीत गुनगुनाऊंगा...

संघर्ष के कण्ठ से जब कोई सुर निकलता है तो उस सुर का नाम आदेश श्रीवास्तव हो जाता है. कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं. परिवार का फिल्मों से कोई करीबी रिश्ता नहीं. बस, मध्यप्रदेश के जबलपुर में बैठे एक 17-18 साल के लड़के को धुन सवार होती है और वो मुंबई आ जाता है.

उंगलियां ड्रम पर थिरकती थीं तो पहले पहल इंडस्ट्री में 'ड्रमर' कहलाता है. यहीं से संघर्ष का पन्ना खुलता है. क्योंकि ये वो आकाश नहीं था जिसका सपना आदेश ने देखा था. वो फिल्मों के दरवाजे खटखटाता है. कोई बंद रहता है तो कोई खुल जाता है. 1990 के बाद आदेश रातों रात इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की 'आंखों' का तारा हो जाता है. संगीत जगत का सितारा हो जाता है. यहां एक बहुत पुराना जुमला फिर याद आता है : 'इसके बाद उसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.'

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आदेश भाई से मेरी मुलाकात का समय 1995 में तय होता है. ये फिल्मों में उनके संगीत की तूती बोलने का वक्त हुआ करता है. साथ काम करने का कोई मौका करवट लेने को ही होता है कि मैं मुंबई से वापस अपने वतन अपने शहर विदिशा आ जाता हूं. मिलने-मिलाने का सिलसिला फोन और मोबाइल तक सिमट जाता है. दस बारह बरस गंगा में पानी बह जाता है. अचानक पुराने रिश्ते फिर ताजा होते हैं. हम दोनों साल 2010 से फिर संपर्क में आते हैं. अब रिलेशन, प्रोफेशन नहीं रह जाता है. बल्कि परिवारों तक चला आता है. दोनों में एक पारिवारिक रिश्ता बन जाता है.

मेरा मुंबई जाना और उनका दिल्ली आना, एक दूसरे से मिलने की जरूरत बन जाता है. धीरे-धीरे मैं जान पाता हूं कि उनके अंदर हर वक्त सिर्फ संगीत ही नहीं गुनगुनाता है. बल्कि एक शानदार शख्स, हमदर्द दोस्त, जज्बाती भाई और खूबसूरत इंसान भी टिमटिमाता है. जिसकी मद्धम रोशनी में उनका 'मुकम्मल और बेहतरीन इंसान' सबको अपना दीवाना बनाता है.

एक रोज मैं दिल्ली से उन्हें फोन लगाता हूं. बताता हूं कि पांच साल की एक मासूम बच्ची के साथ उसी के एक अपने ने बेरहमी से बलात्कार कर दिया. बात खत्म हो जाती है. रात को आदेश भाई का फोन आता है. दूसरी तरफ से दो बेटों 'अवितेश और अनिवेश' का पिता बोल रहा होता है. जिसे पांच साल की गुड़िया के साथ हुए हादसे ने सोने नहीं दिया है, 'आलोक, गुड़िया के दर्द पर कुछ लिख कर दो. बनाता हूं, बहुत बेचैनी है मन में यार.'

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दूसरे ही दिन आदेश, नौ साल की अपर्णा पंडित की आवाज में गुड़िया के दर्द को समर्पित गीत, रिकॉर्ड करके दिल्ली भेज देते हैं. 'आजतक' उसे गुड़िया के दर्द की आवाज बना कर चलाते है. एक कलाकार के सरोकार से रूबरू कराते हैं.

नजर आता है डर ही डर तेरे घर बार में अम्मा, नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा.

इधर उत्तराखंड में बाढ़ से हाल बेहाल होता है, उधर आदेश अपने गायक मित्रों को टटोलते हैं. सिंगर शान मिल जाते हैं. आदेश बच्चों की तरह खिल जाते हैं. मुझे फोन लगाते हैं, 'आलोक, उत्तराखंड की त्रासदी पर एक गीत लिख, जल्दी. मैं उसे बनाऊंगा और शान के साथ गाऊंगा.' मैं हतप्रभ रह जाता हूं. बॉलीवुड की चकाचौंध से घिरे संगीत के इस सितारे को उत्तराखंड की त्रासदी भी बहा ले जाती है. गीत, केयर टुडे की मुहिम का हिस्सा बनता है. चैनल पर बजता है और दर्द जुबानों पर चढ़ जाता है.

न जीवन बचा न घरों की निशानी, पहाड़ों पे टूटा, पहाड़ों का पानी.

समय और समाज के साथ इस कलाकार के सरोकार का रिश्ता यहीं नहीं थम जाता है. एक दिन वो मुझे फिर एक धुन सुनाता है. कहता है, 'एक नेशन सॉन्ग बनाते हैं.' दादा (अमिताभ बच्चन जी) से गवाते हैं. मेरे सामने भी नए ख्वाब के वरक खुल जाते हैं. अमित जी आदेश से बहुत प्यार करते हैं, गीत को आवाज देने के लिए राजी हो जाते हैं. रिकॉर्डिंग के दिन आदेश दो बजे रात तक स्टूडियो में काम करते हैं. गाना बनता है. चैनल पर चलता है और जुबानों पर चढ़ता है, 'आओ सोचें जरा, आओ देखें जरा, हमने क्या क्या किया.' एक कलाकार का सरोकार फिर एक बार अपना परचम लहराता है. आदेश का कलाकार सेल्यूलाइट की लाइट्स से निकलकर कुछ अलग कर दिखाता है.

 

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26 जुलाई 2015, कोकिलाबेन अस्पताल अंधेरी का रूम नंबर 14011, सुबह के करीब 11 बजे. ये आदेश भाई और मेरी आखि‍री मुलाकात का वक्त होगा, मुझे मालूम न था. मुझे कमरे में आता देख उनकी नीम बेहोशी टूटी. हम हंसे-मुस्कुराए. साथ नाश्ता किया. देखते ही देखते कमरे की मायूसी शायरी और मौसिकी की महफि‍ल में बदल गई. मेरी एक पुरानी रोमांटिक गजल पर उनका दिल अटका हुआ था.

मंजि‍लों पर कहां है नजर आजकल,
आप जो हो गए हमसफर आजकल...

उसकी तर्ज बनाने लगे. जो आदेश भाई को जानते हैं उन्हें पता है कि जैसे ही कोई धुन, कोई तर्ज उनके जहन में आती थी वो फौरन उसे अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया करते. इस बार मेरे मोबाइल को भी उनकी इस तर्ज को रिकॉर्ड करने का मौका मिला. बैड पर बैठे-बैठ ही उन्होंने गजल की धुन बनाई और मोबाइल में रिकॉर्ड कर ली. नर्स भी हतप्रभ थी, बोली, 'कलाकार को बस कला मिल जाए, दुनिया की कोई दवा नहीं चाहिए फिर. कोई मानेगा कि अभी थोड़ी देर पहले ये कैसे बेसुध पड़े थे?' आदेश भाई के कलाकार की दवा सचमुच उनकी कला ही थी. संगीत ही था. वे जब तक जीए उसी के सहारे जीए और अब आगे भी हमारी यादों में अपने संगीत के सहारे ही जिंदा रहेंगे. और गालिबन वो तर्ज भी उनकी आख़िरी तर्जो के रूप में कभी सामने आए और हम सब उसे भी गुनगुनाएं. आमीन.

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मैं जिस आदेश श्रीवास्तव को जानता हूं, मेरी नजर में उस आदेश का कद, उसके फि‍ल्मी कद से कहीं ऊंचा है. चमक-दमक में घिरा फि‍ल्मी जिंदगी का तारा. संगीत का सितारा. दोस्ती, इंसानियत, हमदर्दी और सरोकारों के उजालों से भरा. वो उजाला अब नहीं है. मैं मुंबई से दिल्ली लौट रहा हूं. आज उसके शरीर को अपनी आंखों के सामने धूं-धूं कर जलते देखा है. पीली लपटों को नीले आकाश में खोते देखा है. लेकिन कलाकार कहां खोता है. वो तो जहाज के बगल वाली सीट पर बैठा अब भी गुनगुना रहा है.

रागिनी बन के हवाओं में बिखर जाऊंगा, अब नई तर्ज, नया गीत गुनगुनाऊंगा.

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