मेनस्ट्रीम सिनेमा की चकाचौंध से अलग बॉलीवुड में कुछ ऐसी फिल्में भी बनती हैं जो संवेदनशील मुद्दों पर आधारित होती हैं और उनमें सधे हुए अभिनय की जरूरत होती है. बॉलीवुड में तमाम सितारे इसी पैरेलल सिनेमा के रास्ते आगे बढ़े. ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, पंकज कपूर संजीव कुमार और कमल हासन जैसे कलाकारों ने सिनेमा और थियेटर के रंगीन पहलुओं को छुआ तो कभी गंभीर मुद्दों को अपने अभिनय के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की. इसी फहरिश्त में एक नाम आशीष विद्यार्थी का भी है. आशीष कभी दिल्ली के थियेटरों की जान हुआ करते थे और उनके शोज देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती थी.
आशीष का जन्म (19 जून) कलाकारों के परिवार में हुआ. उनकी मां मशहूर कथक डांसर थीं और उनके पिता जाने माने थिएटर आर्टिस्ट थे. आशीष का नाटक दयाशंकर की कहानी बहुत पॉपुलर हआ था. इसमें मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में काम की तलाश में गए एक आदमी की कहानी है. फिल्मों में काम ना मिलने पर एक आदमी की मेंटल कंडीशन कैसी हो जाती है इस बारे में बताया गया था. गोविंद निहलानी की फिल्म द्रोकाल में उनके अभिनय को भला कौन भूल सकता है. फिल्म में उनके साथ ओम पुरी भी थे. अपनी शुरुआती दौर में ही उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिल गया था.
आशीष, मनोज बाजपेई और पीयूष मिश्रा ने दिल्ली के थिएटरों में नई जान फूंकी और अपने नाटकों के जरिए कभी सशक्त अंदाज में तो कभी हल्के-फुल्के लहजे में समाज के गंभीर मुद्दों को दर्शाया. एक समय इन तीनों कलाकारों के बिना दिल्ली के थियेटर की कल्पना करना बेहद मुश्किल था. काम की तलाश में और नाम कमाने के लिए मनोज वाजपेई ने फिल्मों की तरफ रुख किया. शुरुआत से ही उन्हें अच्छे रोल्स मिले. मगर शूल फिल्म में उनके द्वारा निभाया गया कड़क पुलिस इंस्पेक्टर का रोल लोगों के दिलों तक छा गया और वे एक हीरो बन गए. आशीष ने भी फिल्मों में ट्राए किया मगर उन्हें निगेटिव शेड्स के रोल काफी ज्यादा मिले.
आशीष का मन केवल थियेटर में ही काम करने में लगता था. एक बार किसी फिल्म की शूटिंग के दौरान ऐसा हुआ कि उन्होंने एक जबरदस्त सीन किया. डायरेक्टर को सीन काफी पसंद आया और उन्होंने आशीष को एक बेहतरीन कॉमर्शियल एक्टर कह दिया. ये बात आशीष को अच्छी नहीं लगी और वे उदास हो गए. इसके बाद वे अच्छे कंटेंट पर आधारित रोल्स तलाशने लगे.