जन्म से ही मिलने वाले तमाम रिश्तों के बीच, दोस्ती ही इकलौता ऐसा संबंध है, जिसको हम खुद बनाते हैं. दोस्ती को एक दिन के जश्न में बांध देना
संभव नहीं है लेकिन फिर भी अगस्त के पहले रविवार को दुनिया फ्रेंडशिप डे मनाती है. आइए इस खास दिन जिक्र करें, उन फिल्मों का जिनकी दोस्ती
हमारी यादों में अमर हो गईं...
1964 में आई फिल्म 'दोस्ती' शायद, बॉलीवुड की सबसे पुरानी दोस्तों की कहानी पर आधारित फिल्म होगी. इसमें रामू और मोहन की कहानी को कौन भूल
सकता है?
फिल्म 'दिल चाहता है' के तीन दोस्त आकाश, समीर और सिद्धार्थ को आप नहीं भूले होंगे. जिंदगी की बिसात पर इनकी कहानियां क्या मोड़ लेती है, पूरी
फिल्म इसी पर बनी है.
दोस्ती की बात हो और फिल्म 'आनंद' का जिक्र न हो ऐसा संभव नहीं है. भास्कर और आनंद के बीच डॉक्टर और मरीज से ज्यादा एक दोस्त का रिश्ता था.
आनंद दुनिया को अलविदा कह देता है लेकिन जिंदगी के मायने सिखा जाता है.
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फिल्म 'अंदाज अपना-अपना' में प्रेम और अमर की जोड़ी अमर प्रेम थी. दोनों रवीना के लिए पागल थे लेकिन दोस्ती भी उतनी गहरी थी.
फिल्म 'फुकरे' में दोस्त के सपने पर सट्टा लगाने वाले हनी और चूचा की दोस्ती भी बॉलीवुड की गलियों में एक मिसाल है. दोनों खेलते साथ हैं, लड़ते और
फंसते भी साथ हैं.
दिल से दोस्ती सिर्फ इंसानों से ही नहीं जानवरों से भी होती है. राजेश खन्ना की फिल्म 'हाथी मेरे साथी' ने ये दुनिया को दिखाया भी.
खुंखार गब्बर से साथ लड़ने वाले फिल्म 'शोले' के जय और वीरू की दोस्ती कौन भूल सकता है. जो हंसे साथ और लड़े साथ.
दोस्ती की बात हो और फिल्म 'जंजीर' का गाना, यारी है इमान मेरा कैसे भूल सकते हैं. सिर्फ गाना नहीं बल्कि फिल्म भी दोस्ती की मिसाल है.
डॉक्टर अगर मुन्ना भाई हो तो दोस्त सर्किट जैसा चाहिए. बिना सर्किट के मुन्ना की जोड़ी अधूरी है.