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Film Review: 'शोरगुल' अच्छी परफॉर्मेंस पर कहानी गुल

हर एक दशक में राजनीतिक बैकड्रॉप पर बहुत सारी हिंदी फिल्में बनाई गईं हैं. एक बार फिर से 'शोरगुल' के माध्यम से इसी मुद्दे को कैश करने की कोशिश की गई है. कंट्रोवर्सी से घिरी हुई ये फिल्म 'शोरगुल' कैसी है? आइये समीक्षा करते हैं.

फिल्म शोरगुल का पोस्टर फिल्म शोरगुल का पोस्टर

फिल्म का नाम: शोरगुल
डायरेक्टर: प्रणव कुमार सिंह और जीतेंद्र तिवारी
स्टार कास्ट: आशुतोष राणा, जिमी शेरगिल, संजय सूरी, नरेंद्र झा, सुहा गोजेन, दीपदास राणा, हितेन तेजवानी, एजाज खान
अवधि: 2 घंटा 12 मिनट
सर्टिफिकेट: U/A
रेटिंग: 2 स्टार

हर एक दशक में राजनीतिक बैकड्रॉप पर बहुत सारी हिंदी फिल्में बनाई गईं हैं. एक बार फिर से 'शोरगुल' के माध्यम से इसी मुद्दे को कैश करने की कोशिश की गई है. कंट्रोवर्सी से घिरी हुई ये फिल्म 'शोरगुल' कैसी है? आइये समीक्षा करते हैं-

कहानी:-
फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास के मलिहाबाद की है, जहां गांव का एक चौधरी (आशुतोष राणा), एक विधायक रंजीत ओम भैया (जिम्मी शेरगिल) और हिंदू-मुस्लिम परिवार रहते हैं. चौधरी का बेटा रघु (अनिरुद्ध दवे) और पास के मुस्लिम घर की लड़की जैनब (सुहा गोजेन) बचपन से ही एक दूसरे के पक्के दोस्त होते हैं. वह साथ-साथ कॉलेज भी जाते हैं. जब जैनब का निकाह, सलीम (हितेन तेजवानी) से तय होता है उसके बाद सलीम के भाई मुस्तकीन (एजाज खान) की मौजूदगी से कुछ ऐसा होता है जिसकी वजह से रघु की मौत हो जाती है. एक हिंदू लड़के की मौत होने से पूरे मलिहाबाद में हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो जाते जाते हैं. इसे राजनीतिक रंग भी दिया जाने लगता है और आखिरकार फिल्म का एक टिपिकल अंत होता है.

स्क्रिप्ट:-
फिल्म की कहानी राजनीतिक ड्रामा है जिसे आप कई दशकों से देखते आ रहे होंगे. यहां लव स्टोरी और पॉलिटक्स को मिक्स करके दर्शाने की कोशिश की गई है. संवादों में काफी दम है लेकिन कहानी वही पुरानी है, जिसमें आकर्षण कम है. लिखावट आपको 90 के दशक की याद दिलाती है जिसे और बेहतर किया जा सकता था. वैसे तो मात्र 132 मिनट की फिल्म है लेकिन देखते-देखते काफी लम्बी लगने लगती है. स्क्रीनप्ले और भी टाइट किया जा सकता था.

अभिनय:-
अभिनेता आशुतोष राणा के संवादों और एक्टिंग का मुजाहरा एक बार फिर से आपको देखने को मिलेगा. वही जिम्मी शेरगिल का काम भी सराहनीय है. अभिनेत्री सुहा गोजेन ने भी काफी अच्छा अभिनय किया है. एजाज खान, हितेन तेजवानी, नरेंद्र झा, संजय सूरी और दीपदास राणा का काम भी सहज है.

कमजोर कड़ी:-
फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी घिसी पिटी कहानी है जिस पर और भी ज्यादा काम करने की जरूरत थी. फिल्म को शुरुआत के डेढ़ घंटे में इतना फैला दिया जाता है किआखिर में इसे समेट पाना काफी मुश्किल लगता है. जिसके कारण क्लाइमेक्स काफी घिसा पिटा सा दिखाई देने लगता है. वहीं संजय सूरी, नरेंद्र झा, जैसे एक्टर्स को काफी छोटा रोल दिया गया था, जो न्यायसंगत नहीं लगता और भीड़ में खो जाता है.

संगीत:-
फिल्म का संगीत सही है जो की कहानी को सही तरीके से आगे ले जाता है. कपिल सिब्बल ने भी गाने लिखे हैं वहीं ललित पंडित के बनाए हुए गीत भी अच्छे लगते हैं.

क्यों देखें:-
अगर आपको आशुतोष राणा, जिम्मी शेरगिल जैसे मंझे हुए कलाकार और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो एक बार जरूर देख सकते हैं.

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