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Radhe Shyam Review: बड़े बजट से कुछ नहीं होता, कहानी भी जरूरी, फेल हुए प्रभास!

Radhe Shyam Review: प्रभास की राधे श्याम को 350 करोड़ रुपये में बनाया गया है. फिल्म चार भाषाओं में भी रिलीज हुई है. मतलब स्केल तो काफी बड़ा है. लेकिन फिल्म दर्शकों का दिल जीत पाई है या नहीं, ये बड़ा सवाल है.

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Radhe Shyam Review (Prabhas-Pooja Hegde) Radhe Shyam Review (Prabhas-Pooja Hegde)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कहानी के नाम पर कुछ नहीं, सेट पर पैसे खर्च
  • प्रभास-पूजा की केमिस्ट्री फीकी, मजा नहीं
फिल्म:राधे श्याम
1.5/5
  • कलाकार : प्रभास, पूजा हेगड़े
  • निर्देशक :राधा कृष्ण कुमार

कई बार फिल्मों पर करोड़ों रुपय खर्च कर दिए जाते हैं, बजट के नाम पर नए रिकॉर्ड बनाए जाते हैं, प्रमोशन भी ऐसे किया जाता है कि आज से पहले आपने ऐसा कुछ कभी नहीं देखा होगा. जाहिर सी बात है, पैसा ज्यादा लगाया तो मतलब टेक्नोलॉजी और ज्यादा एडवांस होगी, VFX सुपर से भी ऊपर हो जाएंगे. प्रभास की जो नई फिल्म है राधे श्याम, उसको लेकर भी ये सब कहा गया था. रिलीज तो पिछले साल होनी थी, लेकिन कोरोना ने लेट कर दिया. अब 350 करोड़ के बजट में बनी डायरेक्टर राधा कृष्ण कुमार की राधे श्याम रिलीज हो गई है. देखना तो बस ये है कि 350 करोड़ रुपये मेकर्स ने आखिर खर्च कहा पर किए हैं? और क्या ऐसा कुछ कमाल किया है कि इस फिल्म ने कि इसको सालों तक याद रखा जाए? आइए जानते हैं....

कहानी

राधे श्याम उन दो प्यार करने वालों की कहानी है जिसे हाथ की लकीरें शायद कभी मिलने ना दें, जिसे किस्मत हमेशा एक दूसरे से अलग करने की साजिशे करें. एक विक्रम आदित्य (प्रभास) और उसका प्यार है प्रेरणा (पूजा हेगड़े). विक्रम हाथों की लकीर देख भविष्य बता देता है. फिल्म ने कई बार हमे बताया कि इनसे सटीक भविष्य आजतक किसी ने नहीं बताया है. ये जनाब तो पहले से ही जान लेते हैं कि आगे क्या होने वाला है. इसी भविष्य जानने वाली शक्ति ने विक्रम को बता दिया है कि उसकी जिंदगी में प्यार नहीं है. फ्लर्ट कर सकता है, लेकिन किसी से प्यार नहीं कर पाएगा. दूसरी तरफ खड़ी है प्रेरणा, पेशे से डॉक्टर है और इन हाथ की लकीरों में कोई विश्वास नहीं जताती है.

यही है पूरी फिल्म का प्लॉट....एक हाथ की लकीरों को जिंदगी की सच्चाई मानकर चलता है...तो दूसरा सिर्फ अपने कर्मों पर विश्वास जताता है. बीच में और भी कई घटनाएं होती हैं, दोनों प्यार में पड़ते हैं, लेकिन फंडा वही है- एक लकीरों के चक्कर में उस प्यार को समझ नहीं पाता तो दूसरा उस प्यार को हासिल करने के लिए कोई भी हद पार करने को तैयार है. अब हाथ की लकीरें सच निकलती हैं या प्रेरणा का कर्मों पर विश्वास? दो प्यार करने वाले क्या साथ आ पाते हैं या नहीं? विक्रम की भविष्यवाणी सच होती है या गलत. इन सब सवालों के जवाब मिलेंगे जब आप देखेंगे राधे श्याम.

सिर्फ बड़े बजट से कुछ नहीं होता!

थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं....साल 2017, प्रभास की फिल्म आई थी साहो....बजट था 350 करोड़, वहीं जो इस राधे श्याम का भी है. उस फिल्म को लेकर कहा गया था कि ऐसा एक्शन है कि पहले कभी नहीं देखा होगा. लेकिन एंड रिजल्ट किया था- फिल्म बड़ी फ्लॉप साबित हुई, लोगों ने निष्कर्ष निकाला- इसे कहते हैं पैसों में आग लगाना. अब प्रेसेंट में आते हैं. राधे श्याम को भी मेकर्स ने बड़े ही अच्छे से सजाया है. सारा पैसा या तो सेट पर खर्च किया गया है और जो बचा है वो VFX में लग गया है. लेकिन दर्शकों का क्या मिला? सिर्फ बोरियत, बिना कहानी वाली एक बेमेल केमिस्ट्री, बिना सिर पैर वाला ऐसा VFX जिसको मेकर्स भी जस्टिफाई नहीं कर पाए. मतलब शुरुआत से लेकर अंत तक आपकी आंखे तरस जाएंगी....सिर्फ ये देखने के लिए कि कहानी है क्या....स्क्रीन पर तो काफी कुछ हो रहा है...कभी ट्रेन में प्रभास रोमांस कर रहे हैं, कभी अस्पताल में डॉक्टर बनीं पूजा रोमांटिक हो रही हैं. लेकिन इस सब का लिंक किया है...किसी को नहीं पता, शायद मेकर्स भी कनेक्ट करना भूल गए.

पहला हाफ फिल्म का स्लो है. सिर्फ इतना बताया गया है कि विक्रम इंडिया के नंबर 1 Palmist हैं. कुछ लोग उनसे भविष्य पूछने आते हैं....इंदिंरा गांधी भी....हैरान मत होइए....ये फिल्म ही ऐसी है, यहां कुछ भी दिखाया गया है. फिल्म का जब दूसरा हाफ आता है, कहानी जो स्लो चल रही थी, वो डिप्रेशन का शिकार हो जाती है. स्लो के साथ उदासी वाला फैक्टर भी जुड़ जाता है, मतलब दर्शकों के लिए कुर्सी पर बैठे रहना मुश्किल हो सकता है. 

प्रभास ने किया निराश, पूजा बेदम

चलिए एक्टिंग की भी बात कर लेते हैं, आखिर 350 करोड़ वाली फिल्म में 'बाहुबली' को साइन किया गया है. प्रभास इस फिल्म में कुछ भी नहीं कर पाए हैं....एक ही एक्सप्रेशन....एक ही टोन और पूरी फिल्म खत्म हो गई. बड़ी बात ये है कि उन्होंने हिंदी वाली डबिंग भी खुद ही कर दी है. अब वैसे तो इस डेडीकेशन की तारीफ होनी चाहिए, लेकिन फिल्म के लिहाज से जबरदस्त नुकसान हो गया है. प्रभास के हिंदी संवाद काफी सपाट हैं. कोई फीलिंग नहीं, कोई इंटेंसिटी नहीं, सिर्फ बोल दिए हैं. 

पूजा हेगड़े राधे श्याम की लीड एक्ट्रेस हैं. उनका काम भी औसत ही रह गया है. हिंदी के मामले तो जरूर वे प्रभास से काफी बेहतर हैं, लेकिन स्क्रीन पर उनकी केमिस्ट्री ज्यादा रंग नहीं लाई है. मेकर्स ने कोशिश पूरी की एक लार्जर दैन लाइफ प्रेम कहानी बनाने की. लेकिन एक बार भी वो कनेक्ट फील नहीं हुआ. उस वजह से पूजा भी कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाईं. फिल्म में कुछ दूसरे बड़े नाम भी हैं- भाग्यश्री, सचिन खेडेकर और Jagapathi Babu. लेकिन किसी का भी करेक्टर इस फिल्म की कहानी को रफ्तार नहीं दे पाया है, सेंस भी नहीं बना है.

कहां कर गए सबसे बड़ी चूक?

राधे श्याम का डायरेक्शन कई मामलों में गच्चा खा गया है. मतलब क्रिएटिव लिबर्टी तक ठीक है, लार्जर दैन लाइफ होने में भी कोई गुरेज नहीं. लेकिन कही से कुछ भी दिखा देना, बिना किसी बैकग्राउंड के दर्शकों को कुछ मानने पर मजबूर करना, ये सब काफी खटकता है. फिल्म देख ऐसा लगता है कि राधा कृष्ण कुमार ने 'ओवरथिंकिंग' की है. उन्होंने खुद कहा था कि इस फिल्म को लिखने में ही कई साल लग गए. उन कई सालों ने ही इस फिल्म की कहानी को इतना घुमावदार बना दिया कि फ्लो तो खत्म हुआ ही, वास्तविकता भी कोसो दूर हो गई. इस कमजोर कहानी का असर Cinematographer Manoj Paramahamsa के काम पर भी काफी पड़ गया है. उन्होंने तो अपने कैमरे के लैंस में शानदर सीन कैद कर लिए, डायरेक्टर ने चाहा तो रोम की बढ़िया लोकेशन भी दिखा दीं. लेकिन क्योंकि कहानी में ही दम नहीं, इसलिए फिल्म का ये पहलू भी जान नहीं फूंक पाता. 

वैसे राधे श्याम में कुछ अच्छे गाने जरूर सुनने को मिल जाएंगे, लेकिन उसके लिए पूरी फिल्म देखने की जरूरत नहीं, गूगल पर एलबम सर्च कीजिए और मजे लीजिए क्योंकि यहां तो मेकर्स ने पैसे खर्च किए हैं, कहानी के नाम पर कुछ डिलीवर नहीं हुआ है.

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