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Mumbai Saga Review: पुराने दांव-पेच, डायलॉग्स की हवाबाजी, बोरिंग है जॉन की फिल्म

कैसे अमर्त्या राव के आंतक से मुंबई मुक्त हुआ, कौन थे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सावरकर, सिर्फ गैंगस्टराज या फिर टॉप लेवल की राजनीति, ये सब पता चल जाएगा जब आप मुंबई सागा देखेंगे.

मुंबई सागा का सीन मुंबई सागा का सीन
फिल्म:मुंबई सागा
1.5/5
  • कलाकार : जॉन अब्राहम, इमरान हाशमी, अमोल गुप्ते, काजल अग्रवाल
  • निर्देशक :संजय गुप्ता

Mumbai Saga Review  एक लाइन में कुछ ऐसे किया जा सकता है. आप लंबे वक्त बाद कोविड की सिचुएशन में फिल्म देखने का प्लान बना रहे हैं तो ये फिल्म पूरी तरह से निराश करने वाली है. फिर भी आप इस निराशा की वजह डिटेल में जानना चाहते हैं तो पढ़ें ये रिव्यू 

कहानी

ट्रेलर में ही बता दिया गया था कि ये मुंबई नहीं बॉम्बे की कहानी है जब सड़कों पर गैंगस्टर का राज था, गैंगवॉर हर चौराहे पर चलती थी और गोलियों थड़थड़ाहट से लोगों के दिल की धड़कने बढ़ जाती हैं. दो बड़े गैंगस्टर बॉम्बे पर अपना राज चाहते थे. एक था अमर्त्या राव (जॉन अब्राहम) और दूसरा गायतोंडे (अमोल गुप्ते). अब क्योंकि जंगल का राजा तो एक ही हो सकता है, इसलिए अमर्त्या और गायतोंडे में शुरुआत से ही दुश्मनी चलती है. (फिल्म देख वो दुश्मनी वाला एंगल समझ जाएंगे). दोनों के पास ना हथियार की कमी है और ना ही दहशत फैलाने के लिए गुंडो की, ऐसे में खूब मार-धाड़ होती है. इस दुश्मनी में अमर्त्या को भाउ (महेश मांजरेकर) का साथ मिलता है, वहीं गायतोंड़े के साथ बड़े-बड़े उद्योगपति खड़े हो जाते हैं. 

फिल्म में बालासाहब ठाकरे का रोल?

वैसे बता दें कि फिल्म में भाउ का रोल बालासाहब ठाकरे से काफी मेल खाता है. मेकर्स ने ऐसा क्लेम नहीं किया लेकिन फिल्म देखने के बाद आप खुद इसी सोच में पड़ सकते हैं. खैर कहानी आगे बढ़ती है और बॉम्बे से गैंगस्टर कल्चर खत्म करने के लिए इंस्पेक्टर विजय सावरकर (इमरान हाशमी) की एंट्री हो जाती है. ये एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हैं और इनका मकसद अमर्त्या राव को खत्म करना है. अब कैसे अमर्त्या राव के आंतक से मुंबई मुक्त हुआ, कौन थे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सावरकर, सिर्फ गैंगस्टराज या फिर टॉप लेवल की राजनीति, ये सब पता चल जाएगा जब आप 2 घंटा 15 मिनट निकालकर संजय गुप्ता की मुंबई सागा देख लेंगे.

बाबा आदम के जमाने में फिर स्वागत!

मुंबई सागा की कहानी ये बताने के लिए काफी है कि बॉलीवुड के पास आपको परोसने के लिए कुछ भी नया नहीं है. वो आज भी बाबा आदम के जमाने में चल रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि एक्टर जब तक घूंसा मार किसी को दो किलोमीटर दूर नहीं फेंक देगा, हॉल में सीटियां नहीं बजेंगी. लेकिन अफसोस तो इसी बात है कि दर्शक अब इस से ऊब चुके हैं. वो बिना सिर पैर का एक्शन देख सिर्फ ठहाके लगाते हैं और फिल्म को टाइम पास बताकर बाहर निकल जाते हैं. मूवी में डायलॉग्स की हवाबाजी दिखाई गई है और कुछ हद तक इमोशनल मेलो ड्रामा भी थोपा गया है. 

एक्टिंग अच्छी या वो भी खराब?

मुंबई सागा के लिए एक्टर्स को बड़ा चुन-चुनकर लाया गया है. एक्शन फिल्म है तो तगड़ी बॉडी के साथ जॉन अब्राहम को कास्ट कर लिया है. एक्शन करते समय अच्छे लगे हैं, लेकिन जैसे ही उनका हो-हल्ला शुरू होता है, आप अपने कान बंद करना चाहेंगे. मेकर्स ने बिना बात के उन्हें जरूरत से ज्यादा दहाड़ लगवा दी है. गुंडो को मार जॉन रहे हैं, लेकिन फिर भी कराहने की आवाज उनकी सुनाई देती है. इमरान हाशमी भी टुकड़ों में ठीक-ठाक काम कर गए हैं. कभी ओवर द टॉप चले जाएंगे तो कभी ऐसा डायलॉग मार जाएंगे कि दमदार दिखाई पड़ेंगे. 

जब रोल नहीं, हीरोइन को कास्ट क्यों किया?

गैंगस्टर के रोल में अमोल गुप्ते ने उतना कर दिया है जितना कहा गया. कमाल लगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता. फिल्म में रोहित रॉय भी नजर आएं हैं जिनके पास डायलॉग्स तो नहीं हैं, लेकिन उन्हें उनकी बॉडी दिखाने का पूरा मौका मिल गया है. काजल अग्रवाल को लीड एक्ट्रेस के तौर पर लिया गया है, लेकिन रोल के नाम पर कुछ नहीं मिला.

संजय गुप्ता के निर्देशन के बारे में ज्यादा बात करने का फायदा नहीं, उनसे बस इतनी अपील की जा सकती है कि वे अब ये पुराने दांव-पेंच का इस्तेमाल करना छोड़ दें और दर्शकों को वो दिखाएं जो वो देखना चाहते हैं.

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