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Movie Review: उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती ऐश्वर्या-रणदीप की 'सरबजीत'

बॉलीवुड बायोपिक फिल्मों के मोह में उलझा है. पिछले हफ्ते 'अजहर' आई थी और इस हफ्ते सरबजीत. जानें कैसी है फिल्म...

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रेटिंगः 2 स्टार
डायरेक्टरः उमंग कुमार
कलाकारः ऐश्वर्या राय, रणदीप हुड्डा, रिचा चड्ढा और दर्शन कुमार

बॉलीवुड को यह बात कब समझ आएगी कि बायोपिक बनाना कोई सामान्य फिल्म बनाने जैसा नहीं है कि एक बड़ा सितारा पकड़ लिया और साल भर में फिल्म तैयार कर डाली और किसी की जिंदगी को पूरी तरह व्यावसायिक रंग दे डाला. यह किसी की जिंदगी और उसके भोगे यथार्थ को दिखाना होता है. जहां बायोपिक बनाने वाले डायरेक्टर तीन-चार साल (भाग मिल्खा भाग) में जाकर एक फिल्म बना पाते हैं वहीं उमंग कुमार दो साल में दो बायोपिक बना चुके हैं. 'मैरी कॉम' सितंबर 2014 में रिलीज हुई थी. उस समय भी प्रियंका चोपड़ा को लेकर उनकी चॉयस पर सवाल उठे थे. अब 'सरबजीत' में ऐश्वर्या राय को लेकर भी कुछ ऐसे ही सवाल पैदा होते हैं. फिल्म एक गलती से जिंदगी भर दर्द झेलने वाले शख्स और उसके परिवार को परदे पर उस तरह नहीं उतार पाती है, जैसा उतारना चाहिए था. यह भी गजब है कि ऐश्वर्या बॉलीवुड में वापसी के बाद चिल्ला-चिल्लाकर बोलने को अपनी यूएसपी बनाना चाह रही हैं या बॉलीवुड के डायरेक्टर जानबूझकर उनसे ऐसा करवा रहे हैं.

कहानी में कितना दम
कहानी पंजाब के भिखीविंड गांव के सरबजीत (रणदीप हुड्डा) की है. वह किसान है. उसकी एक बहन ऐश्वर्या राय है और उसकी बीवी रिचा चड्ढा है. उसकी दो बेटियां हैं. लेकिन एक दिन नशे में वह पाकिस्तान की सीमा में चला जाता है और उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है. बस यहीं से उसकी जिंदगी बदल जाती है. जेल, आरोप और यातना का कभी न खत्म होने वाला दौर शुरू हो जाता है. जब उसके परिवार और बहन को पता चलता है कि वह पाकिस्तान में कैद है तो फिर ऐश्वर्या राय उसे छुड़ाने के लिए जुट जाती है. हालांकि कहानी सरबजीत की है लेकिन डायरेक्टर का पूरा फोकस ऐश्वर्या राय बच्चन पर ही रहा है. शायद बड़ी हीरोइनों पर उमंग कुमार कुछ ज्यादा ही भरोसा करते हैं. इसलिए फिल्म में एक समय आकर रणदीप और रिचा सब गौण हो जाते हैं और सिर्फ रह जाती हैं तो ऐश्वर्या राय.

स्टार अपील
लोगों ने दलबीर कौर को देखा है. टीवी पर सुना है और वह आज भी दिखती हैं. यही सबसे बड़ी दिक्कत है. इस वजह से ऐश्वर्या के साथ उनकी तुलना हो ही जाती है. लुकवाइज वे कहीं भी दलबीर जैसी नहीं लगतीं. उम्र के कई दौर बीत जाते हैं लेकिन ऐश्वर्या के सिर्फ बाल सफेद होते हैं बाकी हाव-भाव सब वैसे ही रहते हैं. उनका उच्चारण गड़बड़ है. कुछ सीन हैं जहां वे ठीक रही हैं लेकिन कुल मिलाकर इमोशंस को लेकर डायरेक्टर की चॉयस निराश करती है.

फिल्म में कुछ देखने लायक है तो वह रणदीप हुड्डा हैं. उन्होंने खुद को जिस तरह रोल में उतारा है वह कमाल है. उन्होंने खुद को पूरी तरह बदल दिया और सरबजीत बन बैठे. उनके हाव-भाव, और बोलचाल बेहतरीन हैं. यातना सहना और जेल में पल-पल सिसकना परदे पर जीवित हो जाता है. वाकई रणदीप ने एक बार फिर अपनी कला का लोहा मनवाया है. उनके बाद, रिचा चड्ढा बिना बोले भी काफी कुछ कह जाती हैं. हालांकि ऐश्वर्या जैसी बड़ी अभिनेत्री के आगे डायरेक्टर को रिचा छोटी लगी होंगी तभी उनके लिए अवधि भी कम रखी गई.

कमाई की बात
उमंग कुमार इसे दिल को छू लेने वाली बायोपिक बनाने में पूरी तरह चूकते नजर आते हैं. वह एक बहन के संघर्ष को दिखाने की कोशिश में थे. उनके इरादे बेशक अच्छे रहे हैं लेकिन अत्यधिक व्यावसायिक सोच फिल्म को पटरी से उतार देती है. कुल मिलाकर यह पूरी फिल्म ऐश्वर्या राय के लिए बनाई गई लगती है. उनके हार्डकोर फैन्स के लिए यह फिल्म हो सकती है. 'सरबजीत' से एक शानदार बायोपिक की उम्मीद रखने वालों को जरूर निराशा हो सकती है.

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