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Maharani रिव्यू: साहेब बीवी और बिहार...राजनीति के उस अध्याय को बखूबी दिखा गईं हुमा कुरैशी

Maharani Review: कहानी लालू या राबड़ी की नहीं है, लेकिन दौर जरूर वहीं वाला है, राजनीति भी तभी की दिखा दी गई है. बताते हैं कैसी है राजनीति की ये पाठशाला...

महारानी पोस्टर महारानी पोस्टर
फिल्म:महारानी
4/5
  • कलाकार : हुमा कुरैशी, सोहम शाह, अमित सियाल, प्रमोद पाठक
  • निर्देशक :करण शर्मा

बिहार को राजनीति की पाठशाला कहा जाता है. जातीय समीकरण समझने हो, राजनीतिक पैंतरे सीखने हों, या देश के असल मुद्दों पर ज्ञान चाहिए हो, तो बस बिहार चले जाइए, आपके ज्ञानचक्षु हमेशा के लिए खुल जाएंगे. वैसे भी बिहार की राजनीति के कई अध्याय हैं जिन्होंने ना सिर्फ बिहार को बदल कर रख दिया बल्कि देश की राजनीति पर भी अपना गहरा असर छोड़ा. ऐसा ही एक दौर था जब लालू प्रसाद यादव बिहार के सीएम हुआ करते थे. फिर उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने भी सत्ता संभाली. अब कई सालों बाद महारानी के मेकर्स हमें फिर उस दौर में ले गए हैं. कहानी लालू या राबड़ी की नहीं है, लेकिन दौर जरूर वहीं वाला है, राजनीति भी तभी की दिखा दी गई है. बताते हैं कैसी है राजनीति की ये पाठशाला...

कहानी

कई सालों बाद बिहार में पिछड़ी जाति का कोई मुख्यमंत्री बना है. नाम है भीमा भारती (सोहम शाह) और काम-पिछड़ों को बिहार की राजनीति में सबसे ऊपर ले आना, उन्हें ऊंची जाति वालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सिखाना. लेकिन राजनीति का ही खेल है कि सत्ता संभालते ही भीमा भारती पर जानलेवा हमला हो जाता है. गोली मारी जाती है, किसने मारी पता नहीं चलता. संकट काफी बड़ा है, सरकार अभी-अभी बनी है, राजा ही घायल हो गया है, ऐसे में बिहार जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी कौन संभालेगा. पार्टी में नेता कई हैं, सीएम बनने के सपने भी भुनाए जा रहे हैं, लेकिन भीमा भारती का दिमाग घोड़े से भी तेज चलता है. अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं को छोड़ पत्नी रानी भारती (हुमा कुरैशी) को सीएम बनवा देते हैं. फंडा सिंपल है, कागज पर मुख्यमंत्री रानी रहेंगी, लेकिन सत्ता भीमा ही चलाएंगे.

सीरीज के बड़े नाटकीय मोड़

इतना बड़ा दांव तो चल दिया, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ही नाराज कर गए. पार्टी के अंदर ही फूट पड़ गई और कई नेता अपने ही राजा को सबक सिखाने के चक्कर में पड़ गए. लेकिन बिहार की पहली महिला सीएम बनीं रानी भारती ने भी तेवर दिखाने शुरू किए. अपने ही 'साहेब' (बिहार में कई पत्नियां अपने पति को साहेब कहती हैं) के खिलाफ जाने की हिम्मत दिखाने लगीं. कभी मंत्रियों का मंत्रालय बदल दिया, किसी को बर्खास्त कर दिया, इनक्वायरी बैठा दी. सबकुछ होता रहा और भीमा भारती एक घायल राजा की तरह बस देखते रहे. यही है महारानी की कहानी. इसमें राजनीति है, राजनीतिक दांव-पेंच हैं और सत्ता में बने रहने की एक लालसा.

राजनीति पर तो कई फिल्में बन गई हैं. एक बार के लिए प्रकाश झा को तो हम एक्सपर्ट भी मानने लगे हैं. लेकिन कहते हैं ना क्रिएटिविटी की कोई सीमा नहीं होती और कंटेंट तो कही से भी जनरेट किया जा सकता है. महारानी सीरीज के जरिए सुभाष कपूर और करण शर्मा ने हमे बिहार की राजनीति के जबरदस्त दर्शन करवा दिए हैं. 10 एपिसोड खत्म हो जाएंगे, लेकिन आपका मन नहीं भरेगा. शानदार कहानी है, ठहराव भी ऐसा है कि हर एपिसोड के बाद आपका कनेक्शन और मजबूत होता जाएगा.

क्लिक करें- ट्विंकल खन्ना ने देखी हुमा कुरैशी की 'महारानी', अपना रिव्यू देते हुए कही ये बात 

स्टार कास्ट ने गदर मचा दिया

इतना सबकुछ बेहतरीन इसलिए दिखाई पड़ा है क्योंकि महारानी की पूरी स्टार कास्ट ने आला दर्जे का काम कर दिखाया है. हुमा कुरैशी लीड में हैं तो उनके किरदार को भी वैसे ही भुना गया है. ठेठ बिहारी तो उन्होंने ऐसी बोली है कि आप भी एक बार के लिए भूल जाएंगे कि वे हुमा कुरैशी हैं. ये किरदार सिर्फ इन्हीं के लिए बना था और उन्होंने ये अपनी एक्टिंग से बखूबी साबित कर दिया. भीमा भारती के रोल में सोहम शाह ने भी गदर मचाया है. अभी पिछली फिल्म उनकी बिग बुल थी. एक्टिंग भी फीकी लगी थी और उनका किरदार भी काफी कमजोर रहा. लेकिन महारानी में उन्होंने दिखा दिया कि अगर हुमा रानी थीं और तो वे भी राजा हैं. बेहतरीन अभिनय किया है और स्क्रीन प्रेसेंस भी तगड़ी लगी है. 

दूसरे बड़े नेता बने अमित सियाल ने भी दिल खुश कर दिया है. सिंपल, सटीक और साधारण एक्टिंग रही है उनकी, इसी वजह से उनका नवीन बाबू वाला किरदार छा गया. प्रमोद पाठक को भी लंबे टाइम बाद एक सॉलिड रोल मिल गया है. उन्हें मिश्राजी का किरदार दिया गया है और वे पार्टी के महासचिव दिखाए गए हैं. कोई एक्टिंग नहीं की है, बस किरदार निभा गए हैं. राज्यपाल की भूमिका में अतुल तिवारी आ गए हैं और उन्होंने भी महारानी की कहानी को खूब मजबूती दी है. इस सीरीज में कई दूसरे और आला दर्जे के कलाकार हैं जिनका काम देख आप सिर्फ तारीफ करने को मजबूर रहेंगे.

डायरेक्शन भी आला दर्जे का

डायरेक्शन की बात आती है तो करण शर्मा ने तो बढ़िया काम किया ही है, सुभाष कपूर की भी तारीफ बनती है. वो तो पहले भी कई पॉलिटिकल फिल्में दिखा चुके हैं, ऐसे में महारानी सीरीज में उन्होंने अपने उसी अभुनव का निचोड़ निकाल दिया है. कबीर के दोहे से हर एपिसोड की शुरुआत होती है और फिर उसी ट्रैक पर कहानी चल पड़ती है. दिखाने का जो अंदाज है,वो दर्शकों को अपनी तरफ खींचने वाला साबित हुआ है. सीरीज के डायलॉग भी एक मजबूत कड़ी बनकर उभरे हैं. कई ऐसे डायलॉग हैं जो आपको सीरीज खत्म होने के बाद भी याद रहने वाले हैं. जैसे ये वाला-( रानी अपने साहेब से कहती हैं)- आप अपनी पत्नी से मिलना चाहेंगे, तो मैं मिलूंगी, अगर सीएम से मिलना चाहेंगे तो रानी भारती से मुलाकात होगी. आप सीरीज देख डालिए,समझ जाएंगे कि ये लिस्ट भी काफी लंबी होने वाली है.

तो बस यहीं कहेंगे, अपनी जिंदगी के 450 मिनट महारानी सीरीज को दे दीजिए, राजनीति भी समझ जाएंगे, एंटरटेनमेंट भी हो जाएगा और कोरोना काल में एक शानदार सीरीज भी देख लेंगे.

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