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Review: 'कागज' से पत्थर की लकीर मिटाने निकले पंकज त्रिपाठी, बुलंद हौसले की सुनाएंगे कहानी

किसी कागज पर सरकारी मुहर लग जाए तो उसकी अहमियत सोने-चांदी से भी ज्यादा हो जाती है. इसी कागज का मायाजाल दिखाने के लिए साथ आए हैं पंकज त्रिपाठी और सतीश कौशिक. जानते हैं कितना जमा पाए हैं रंग

कागज पोस्टर कागज पोस्टर
फिल्म:कागज
3/5
  • कलाकार : पंकज त्रिपाठी, सतीश कौशिक, मोनल गज्जर
  • निर्देशक :सतीश कौशिक

कहने को कागज इस दुनिया में सबसे कमजोर माना जाता है. कभी हवा से उड़ जाए तो कभी एक झटके में फट जाए. लेकिन इस कागज पर चला एक कलम कई बार जिंदगी की ऐसी दास्तान लिख जाता है, जिसे चाहकर भी मिटाना मुमकिन नहीं होता. किसी कागज पर सरकारी मुहर लग जाए तो उसकी अहमियत सोने-चांदी से भी ज्यादा हो जाती है. इसी कागज का मायाजाल दिखाने के लिए साथ आए हैं पंकज त्रिपाठी और सतीश कौशिक. जानते हैं कितना जमा पाए हैं रंग-

कहानी

उत्तर प्रदेश का निवासी भरत लाल (पंकज त्रिपाठी) खुद का बैंड चलाता है. उसकी धुन सभी का दिल बहलाती है. लेकिन बड़े सपनों को पूरा करने के लिए जनाब कर्जा लेना चाहते हैं. फैसला जरूर भरत लाल की पत्नी का है, लेकिन ये जनाब भी खुशी-खुशी ख्याली पुलाव पका रहे हैं. वे सीधे लेखपाल के पास जाते हैं और अपने हक की जमीन मांगते हैं. (कर्जा लेने के लिए जमीन को बतौर सिक्योरिटी देने की बात हुई है) बस इतना बोलते ही भरत लाल के सारे सपने टूट जाते हैं क्योंकि जमीन मिलना तो दूर उन्हें तो अपनी जिंदगी का वो सच पता चल जाता है जिसकी वजह से 18 साल लंबी एक जंग की तैयानी करनी पड़ती है. 

भरत लाल कानूनी कागजों में कई साल पहले ही मृतक बता दिए गए हैं. शरीर से जिंदा हैं, लेकिन रिकॉर्ड में वे मर गए हैं. भरत के लिए एक कागज ने ऐसी दुविधा पैदा कर दी है कि उन्हें अब जिंदा होते हुए भी अपने जीवित होने का सबूत देना पड़ रहा है.

अब अपना जीवित होने का प्रमाण कैसे देंगे? विरोध करेंगे, अपील करेंगे और बाद में कोर्ट-कचेरी के चक्कर काटेंगे. इस पूरी लड़ाई में साधूराम (सतीश कौशिक) नाम का वकील भरत लाल के साथ लगातार खड़ा रहेगा. तो क्या कागज से इस पत्थर की लकीर को मिटा पाएंगे भरत लाल? जिंदा होकर भी जीवित होने का सबूत पेश कर पाएंगे भरत लाल? जानने के लिए देखिए सतीश कौशिक की फिल्म कागज.

सत्य घटनाओं से प्रेरित

सतीश कौशिक के निर्देशन में बनी कागज सत्य घटनाओं से प्रेरित है. कहानी लाल बिहारी मृतक की है जिन्होंने अपनी जिंदगी के 19 साल सिर्फ ये साबित करने में निकाल दिए कि वे जिंदा हैं. अब सतीश कौशिक ने काफी हद तक उनकी जिंदगी को अपनी कहानी में पिरोया है. दूसरे हाफ में जरूर कहानी थोड़े हिचकोले खाती है, दिशा से भटकरती है और बोर भी करती है. लेकिन एक फिल्म के तौर पर कहानी 1 घंटा 50 मिनट तक बांधने में कामयाब रही.

पंकज त्रिपाठी ने फिर किया कमाल

जिस फिल्म के साथ पंकज त्रिपाठी का नाम जुड़ जाए तो एक्टिंग की बात करना फिजूल लगता है. वे कभी भी एक्टिंग नहीं करते हैं. वे तो उस किरदार को ऊपर से लेकर नीचे तक, सिर्फ जीते हैं. कागज में पंकज की वो प्रथा जारी है. भरत लाल बन पंकज ने गदर मचा दिया है. इस किरदार में सिर्फ 'तड़प' और 'दुविधा' को दिखाने की जरूरत है और वो काम पंकज त्रिपाठी करने में सफल कहे जाएंगे. भरत लाल की पत्नी के रोल में मोनल गज्जर का काम भी शानदार रहा है. उन्होंने पंकज संग अपनी केमिस्ट्री बेहतरीन अंदाज में जमाई है. 

हैरत में डालने वाले सीन

सतीश कौशिक की बात करें तो निर्देशन भी उनका रहा और एक्टिंग भी उन्होंने कर ली है. एक्टिंग के मामले में तो सतीश कौशिक को पूरे नंबर देने पड़ेंगे क्योंकि हर बार फिसलती कहानी को उन्होंने अपने दम पर सहारा दिया है. वहीं उनका निर्देशन भी अच्छा कहा जा सकता है. किसी की जिंदगी पर फिल्म बनाना अलग बात होती है और उन घटनाओं को सही तरीके से पेश करना अलग. ऐसे में कागज में कई ऐसे सीन हैं जिन्हें देख आप हैरत में पड़ जाएंगे. चुनाव लड़ना-हारने के लिए, अपहरण करना-FIR के लिए, ये घटनाएं आप पर असर जरूर डालेंगी.

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देखने लायक है या नहीं?

फिल्म में सलमान खान और सतीश कौशिक का नरेशन भी सुनने को मिलता रहेगा. सलमान की सुनाई कविता तो जरूर बढ़िया लगेगी लेकिन सतीष का नरेशन थोड़ा 'कम्यूनिटी रेडियो' के किसी शो जैसा लगता है. कई बार बिना कुछ कहे भी बात समझ आ जाती है, ऐसे में कागज में इतना सारा नरेशन समय बर्बाद वाला लगता है. कागज में तमाम गाने भी सिर्फ इसलिए डाल दिए गए हैं कि साबित हो जाए कि बॉलीवुड फिल्म बनाई है. लेकिन उन्हें सुन सिर्फ मजा किरकिरा होगा. एक इंट्रेस्टिंग कहानी और पकंज त्रिपाठी की एक्टिंग के लिए इस कागज को एक बार जरूर देखा जा सकता है. 

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