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फिल्म रिव्यूः फिल्म '21 तोपों की सलामी' में स्टार नहीं एक्टर हैं, मसाला नहीं कहानी है

फिल्म '21 तोपों की सलामी' में स्टार नहीं एक्टर हैं. मसाला नहीं कहानी है. ताली बटोर वन लाइनर नहीं, मगर भाव प्रवण संवाद हैं. इसलिए इसे देखना बुरा ख्याल नहीं. खास तौर पर उन लोगों को देखना चाहिए, जिन्हें ईमानदारी एक आउट डेटेड मूल्य लगती है.

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फिल्म '21 तोपों की सलामी'
फिल्म '21 तोपों की सलामी'

एक्टरः अनुपम खेर, नेहा धूपिया, दिव्येंदु शर्मा, मनु ऋषि चड्ढा, अदिति शर्मा, राजेश शर्मा, उत्तरा बाओकर, आसिफ शेख, अनुराग अरोड़ा
डायरेक्टरः रविंद्र गौतम
ड्यूरेशनः 2 घंटे 20 मिनट
रेटिंगः 5 में 3 स्टार

जोशी जी (अनुपम खेर) मुंबई म्यूनिसिपैलिटी के मलेरिया विभाग में पूरी जिंदगी ईमानदारी से काम करते रहे. उनके दोनों बेटे शेखर (मनु ऋषि) और सुभाष (दिव्येंदु) बाबू जी की इस हरकत से गजब की चिढ़ पाल बैठे. शेखर शादीशुदा है और म्यूनिसपैलिटी में ही अफसर है, दुनियादारी के चलन के मुताबिक भ्रष्ट. उधर, सुभाष युवा राजनीतिक कार्यकर्ता है, जो बाबू जी को नहीं बल्कि मुख्यमंत्री दयाशंकर पांडे (राजेश शर्मा) को अपना आदर्श मानता है. भले ही मुख्यमंत्री को लगता हो कि भ्रष्टाचार का शिष्टाचार यह कहता हो कि हजार करोड़ से कम का घोटाला उनकी तौहीन है. मुख्यमंत्री का भाषण लिखने वाली तान्या से सुभाष प्यार करता है और बाबू जी भी इस रिश्ते को सहमति दे देते हैं.

सब कुछ सामान्य चल रहा है. और तभी बाबू जी की सर्विस का आखिरी दिन आ जाता है. उन्हें लगता है कि 37 साल की ईमानदारी के लिए उन्हें शाल और नारियल देकर सम्मानित किया जाएगा. मगर किसी और की गलती के चलते उन पर बेईमानी का दाग लगा दिया जाता है. साथ में सस्पेंशन की टीप भी. बाबू जी इससे जूझने की हिम्मत ही जुटा रहे होते हैं, मगर उनके बेटे फट पड़ते हैं. यह देख बाबू जी की आस दम तोड़ देती है. जाने से पहले वह बेटे सुभाष के एक सवाल के जवाब में कहते हैं. मुझे चिता जलने से पहले 21 तोपों की सलामी चाहिए. बोलो दिलवा सकोगे.

बेटा कोशिश में जुट जाता है और इस क्रम में रिश्ते-नाते, समाज का हाल, राजनीति का कुरुप चेहरा और जिंदगी के असल मायने, सब उसके सामने खुलने लगते हैं.

फिल्म 21 तोपों की सलामी की सबसे बड़ी खासियत है इसके चुटीले संवाद, सरल कहानी, मगर चुस्त स्क्रीनप्ले और उम्दा एक्टिंग. कहते हैं कि मरा हाथी भी सवा लाख का होता है. वही हाल अनुपम खेर का भी है. उनका किरदार जब जीवित दिखता है, तब तो खूब संवारता ही है स्क्रीन को और कहानी को अपनी एक्टिंग से. मगर उनकी लाश भी उतनी ही अभिनयवान लगती है.

यहां यह बताना लाजिमी हो जाता है कि दूसरे हाफ में फिल्म जाने भी दो यारों की तर्ज पर बाबू की लाश भी एक किरदार बन यहां से वहां डोलती है. ताकि उनके बेटे उनका सम्मान से अंतिम संस्कार कर सकें. सुभाष के रोल में दिव्येंदु ने खूब आग पानी दिखाया है. उनका मैं प्यार का पंचनामा फिल्म के दिनों से ही फैन हूं. उम्मीद है कि मायानगरी में उन्हें अच्छे और विविधतापूर्ण रोल मिलते रहें. शेखर के रोल में अपने बाबू जी को कोसते, डरपोक, लालची, भावुक बड़े बेटे के रोल में मनु ऋषि ने भी खूब काम किया है. फिल्म के संवादों पर भी उनका दिल्ली वाला असर दिखता है. तान्या के रोल में अदिति शर्मा के हिस्से कुछ अच्छे सीन आए हैं. मसलन, मुख्यमंत्री की गाली गलौज वाली भाषा को संयत स्पीच में तब्दील करने वाला दृश्य. मगर भावुकता भरे दृश्यों पर अदिति को और मेहनत करने की जरूरत है.

मुख्यमंत्री के रोल में राजेश शर्मा उस अश्लीलता को बखूबी सामने रखते हैं, जो सत्ता से चिपके रहने के सुख से चेहरे पर पसर जाती है. उनकी महात्वाकांक्षी मां के रोल में वरिष्ठ अदाकारा उत्तरा बाओकर और प्रेमिका या चलन के लहजे में कहें तो रखैल के रोल में नेहा धूपिया भी जमी हैं. नेहा पर फिल्माया गया गाना यूं न देखो सांवरिया दूर दूर से अपनी कल्पनाशीलता के चलते लुभाता है.

फिल्म में कुछ देर के लिए पत्रकार अरनब (आसिफ शेख) और ईमानदार उच्च अधिकारी खैरनार (अनुरोग अरोड़ा) आते हैं. और उतने ही समय में अपनी काबिलियत का परिचय देते हैं.

फिल्म त्रासदी और उम्मीद के बीच झूलती है. और इसे सुरीली लोरी सुनाने का काम करते हैं संवाद. सामान्य बातचीत हो या झगड़ा या फिर साजिशें. डायलॉग असलियत की जमीन नहीं छोड़ते. और इसलिए मारक बन जाते हैं. इसी तरह टीवी पत्रकारों के घड़ी घड़ी एसएमएस मंगवा ओपिनियन पोल बनाने की जुगत हो या आलाकमान के सामने वंशवाद के तहत दावा पेश करती सीएम की मां. या फिर सिक्युरिटी वालों और अफसरों से नेताओं का व्यवहार. सब कुछ समाज की कुछ प्रवृत्तियों पर नए सिरे से उंगली उठाते हैं.

अब बात कुछ कमियों की
पहली, फिल्म की अवधि प्लॉट के हिसाब से कुछ ज्यादा हो गई है. इसे और छांटा जाना चाहिए था. दूसरी, सुभाष के प्यार का एंगल पसारने के चक्कर में एक गाना दो बार टुकड़ों के अंदाज में ठेल दिया गया है. इससे फिल्म पहले हाफ में कुछ ढीली पड़ती लगती है. तीसरी, फिल्म के बिल्कुल आखिर में संदेश देने की मंशा से क्लाइमेक्स को बहुत खींच दिया गया है.

शायद, फिल्म के टाइटिल की सलामती के लिए. स्वच्छता के संदेश को और भी असरदार बनाने के लिए. या अनुपम खेर के शब्दों में कहें तो कॉमन मैन की जय हो बोलने के लिए.

फिल्म '21 तोपों की सलामी' में स्टार नहीं एक्टर हैं. मसाला नहीं कहानी है. ताली बटोर वन लाइनर नहीं, मगर भाव प्रवण संवाद हैं. इसलिए इसे देखना बुरा ख्याल नहीं. खास तौर पर उन लोगों को देखना चाहिए, जिन्हें ईमानदारी एक आउट डेटेड मूल्य लगती है.

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