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Review बॉम्बे वेलवेट: रणबीर हिट, लेकिन फिल्म निराशाजनक

अनुराग कश्यप का जिक्र होते ही एक अलग फिल्म की सोच अपने आप ही पनपने लगती है , चाहे वो ब्लैक फ्राइडे , गुलाल , गैंग्स ऑफ़ वासेपुर हो या फिर अग्ली , और इस बार भी कुछ अलग करने की कोशिश की है अनुराग ने , इतिहासकार ज्ञान प्रकाश की किताब 'मुंबई फेबल्स ' से प्रेरित होकर उन्होंने पिछले आठ साल से सिर्फ 'बॉम्बे वेलवेट ' की लिखावट की और आखिरकार दर्शकों के सामने आ गयी उनकी कृति .

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बॉम्बे वेलवेट का एक सीन बॉम्बे वेलवेट का एक सीन

फिल्म का नाम: बॉम्बे वेलवेट
डायरेक्टर: अनुराग कश्यप
स्टार कास्ट: रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा, करण जौहर, के के मेनन, विवान शाह, मनीष चौधरी , सिद्धार्थ बासु
अवधि: 151 मिनट
सर्टिफिकेट: U/A
रेटिंग: 2 स्टार
अनुराग कश्यप का जिक्र होते ही एक अलग फिल्म की सोच अपने आप ही पनपने लगती है , चाहे वो ब्लैक फ्राइडे , गुलाल , गैंग्स ऑफ़ वासेपुर हो या फिर अग्ली , और इस बार भी कुछ अलग करने की कोशिश की है अनुराग ने , इतिहासकार ज्ञान प्रकाश की किताब 'मुंबई फेबल्स ' से प्रेरित होकर उन्होंने पिछले आठ साल से सिर्फ 'बॉम्बे वेलवेट ' की लिखावट की और आखिरकार दर्शकों के सामने आ गयी उनकी कृति . जब हम कोई नया प्रयोग करते हैं तो सिर्फ दो बातें होती हैं या तो वो सफल होता है या निराशा हाथ लगती है . आइये जानते हैं अनुराग का ये प्रयास कैसा है.

कहानी :-
बलराज (रणबीर कपूर) भारत - पाक विभाजन के दौरान 1949 में अपनी मॉं के साथ बाम्बे (अब मुंम्बई कहलाता है) आता है और वहाँ कुछ परिस्थियों के कारण गरीबी झेलते हुए अमीर बनने का ख्वाब देखने लगता है और उसी सपने को सच करने के लिए बिजनेसमैन कैजाद खम्बाटा (करण जौहर) के 'बॉम्बे वेलवेट' क्लब में मैनेजर के तौर पर काम करने लगता है और उसी क्लब में जैज सिंगर के तौर पर काम करने वाली रोजी (अनुष्का शर्मा) को दिल दे बैठता है. इश्क के साथ साथ धंधा भी चलता रहता है फिर ट्विस्ट और अलग अलग कथानक सामने आते हैं और टिपिकल अनुराग कश्यप की फिल्मों से थोड़ा अलग क्लाइमेक्स आता है.

अभिनय एवं संगीत :-
अभिनय के लिहाज से रणबीर कपूर ने अपने किरदार में जान फूंक दी है , जिस तरह से उस दौर का लहजा ,चाल चलन, हाव भाव को रणबीर ने पकड़ा है वो काबिल ए तारीफ है . वहीं रोजी के किरदार में जैज सिंगर बनी अनुष्का शर्मा का काम प्रशंसनीय है लेकिन करण जौहर के कुछ ऐसे सीन हैं जो आपके चेहरे पर मुस्कान भी लाते हैं . अभिनेता के के मेनन का किरदार और भी बड़ा और बेहतर किया जा सकता था , इस फिल्म में उन्हें पूरी तरह से कैश नहीं कर पाये हैं अनुराग . विवान शाह भी कुछ फ्रेम शेयर करते हैं इस फिल्म में और एक और किरदार है चिम्मन यानी रबर के दोस्त का , जिसे मनीष चौधरी ने निभाया है, वो कई बार सराहनीय सा दिखता है.

वहीँ अगर गीत संगीत की बात करें तो 60 के दशक के गानो की छाप इस फिल्म में मिलती है और मेरे हिसाब से 1-2 गाने कम होने चाहिए थे. जिस तरह से गानो के दौरान 60 के दशक के वाद्य यंत्रों का प्रयोग अमित त्रिवेदी ने किया है वो भी काफी सराहनीय है.

क्यों देखें-
देखिये इस फिल्म को देखने की आपकी अपनी वजहें हो सकती हैं, मसलन आप रणबीर , अनुष्का, या करण जौहर के दीवाने हैं, और यदि आप अनुराग कश्यप और उनकी फिल्म के दीवाने हैं तो ये फिल्म शायद आपने मानको पर खरी ना उतरे और निराशा साथ आये.

क्यों ना देखें-
फिल्म को देखते देखते कई बार ऐसे ख्याल आते हैं की आखिर कब खत्म होगी ये फिल्म और पता चलता है की अभी तो इंटरवल भी नहीं हुआ है , अनुराग कश्यप ने गोलियां, मार धाड़, 60 के दशक का शहर बसाया है और हरेक छोटी छोटी बारीकी पर तो ध्यान दिया है लेकिन इस बार वो अपनी कृति से लोगों का मनोरंजन करने में असमर्थ से दिखते हैं, सोच काफी अच्छी थी की बॉम्बे को महानगर का दर्ज मिलने से पहले का वक्त और लोग कैसे थे लेकिन इस बार फिल्मांकन काफी ढीला रह गया. कहानी कहने का ढंग काफी निराशाजनक है और 151 मिनट के साथ साथ पैसा भी वसूल नहीं हो पाता है. मैं खुद अनुराग की कई फिल्मों से इत्तेफाक रखता हूँ लेकिन इस फिल्म की तुलना का स्टार काफी नीचे रह जाता है हालांकि रणबीर ने अपने सर्वोच्च प्रदर्शन में से एक रोल इस फिल्म में निभाया है लेकिन इस फिल्म की पटकथा का खामियाजा उन्हें भी उठाना पड़ेगा.

इस फिल्म को मैं 2 स्टार देता हूँ। 1 स्टार रणबीर कपूर की बेहतरीन और उम्दा परफार्मेस के लिये और 1 स्टार अनुराग कश्यप की 8 साल की तैयारी के लिये ,क्योंकि फिल्म बनाने में काफी मेहनत लगती है भले ही वो दिशाहीन ही क्यों ना हो.

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