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Dolly Kitty Aur Woh Chamakte Sitare Review: सितारों को चमकाने निकलीं दो बहनों की कहानी, अंजाम तक ना पहुंची

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का फेम डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव अब लेकर आ गई हैं नई फिल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे. आइए जानते हैं इस बार उन्होंने क्या नया एक्सपलोर किया है और क्या ये फिल्म आपके देखने लायक है या नहीं.

डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे पोस्टर डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे पोस्टर
फिल्म:डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे
2/5
  • कलाकार : भूमि पेडनेकर, कोंकणा सेन शर्मा, विक्रांत मेसी
  • निर्देशक :अलंकृता श्रीवास्तव

बॉलीवुड में इस समय एक नया दौर चल पड़ा है जहां पर महिला सशक्तिकरण पर कई फिल्में बनाई जा रही हैं. ये ट्रेंड अच्छा है और कई फिल्ममेकर्स इसमें सफल भी रहे हैं. कंगना ने भी कई ऐसी फिल्में बनाई हैं जहां पर इसकी झलक साफ महसूस की जा सकती है. लेकिन फिर भी ये एक ऐसा मुद्दा है जिसको काफी एक्सपलोर किया जा सकता है. काफी कुछ और दिखाया जा सकता है. अब इसी जरूरत को समझा है लिपस्टिक अंडर माय बुर्का फेम डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव ने जो अब लेकर आ गई हैं नई फिल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे. आइए जानते हैं इस बार उन्होंने क्या नया एक्सपलोर किया है और क्या ये फिल्म आपके देखने लायक है या नहीं.

कहानी

ये कहानी दो बहनों की है- डॉली ( कोंकणा सेन) और किट्टी ( भूमिका पेडनेकर) . कहने को ये दो बहने हैं, लेकिन जिंदगी जीने के मायने दोनों के एकदम अलग और जुदा हैं. डॉली की शादी हो चुकी है और दो बच्चे भी हैं. वो एक नौकरी भी करती है, पैसे भी कमा रही है, तो कह सकते हैं एक सक्सेसफुल वर्किग वुमन है. लेकिन वहीं पर बात जब उसकी बहन किट्टी की आती है, तो वो काफी उलझी हुई है. उसे नहीं पता है कि क्या करना है, कैसे करना है. वो बिहार से नोएडा आ जाती है. कई जगहों पर ट्राइ करने के बाद वो रेड रोज कॉलिंग सेंटर में काम करने लगती है. जैसे ड्रीम गर्ल में आयुष्मान का किरदार लड़की बन लड़कों से बात करता था, बिल्कुल वैसा ही कुछ किट्टी करने लगती है. उसे दिक्कते आती हैं, परेशानी होती है, लेकिन मजबूरी में वो सब करती रहती है. कई लड़कों से बातचीत के बीच वो प्रदीप (विक्रांत मेसी) से मिलती है. उससे भी उसका संपर्क उसी कॉल सेंटर के जरिए होता है.

अब किट्टी का ये लाइफस्टाइल देख डॉली वैसे तो उसे डांटती है, लेकिन अंदर ही अंदर वो उससे जलने लगती है. उसे भी जिंदगी में सबकुछ करने का मन करता है. यही से फिल्म में सभी किरदारों की कहानी और राह बदल जाती है. डॉली शादी के बाद भी बाहर एक डिलीवरी बॉय से अफेयर चलाने लगती है, तो वहीं दूसरी तरफ किट्टी भी प्रदीप में अपना सच्चा प्यार ढूढ़ने की कोशिश करती है. सवाल बस ये है कि क्या डॉली और किट्टी का खुलकर जिंदगी जीने वाला सपना पूरा हो पाता है या नहीं? क्या गर्दिश में चल रहे उनके सितारे चमकते हैं या नहीं?

अलंकृता श्रीवास्तव ने जब लिपस्टिक अंडर माय बुर्का बनाई थी, तब उन्हें काफी तारीफ मिली. बताया गया कि काफी बोल्ड फिल्म है, ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिस पर फिल्म बनाने से पहले कोई हजार बार सोचेगा. अब वो सब ठीक था, वो फिल्म अलग थी, महिलाओं पर फोकस कर रही थी, तो सभी ने उसे पसंद किया. लेकिन अब उनकी ये नई फिल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे महिलाओं को रिझा पाएगी, मुश्किल लगता है. बल्कि कहना चाहिए काफी मुश्किल लगता है. आप 120 मिनट तक आंखें गड़ाए बैठे रहेंगे, फिल्म चलती रहेगी और खत्म हो जाएगी. अब ऐसा ही महसूस होने वाला है क्योंकि अंत में आपके हाथ कुछ नहीं आने वाला. फिल्म में मुद्दे कई उठाए गए, लेकिन किसी को भी उसके अंजाम तक नहीं पहुंचाया गया. ऐसा लग जरूर रहा था कि अलंकृता समाज के कई स्टीरियोटाइप तोड़ना चाहती हैं, महिलाओं की उन दबी इच्छाओं को जगाना चाहती हैं जो वो कब से दबाए बैठी हैं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होता है, सिर्फ कन्फ्यूजन ही रहता है.

एक्टिंग

फिल्म सिर्फ दो महिलाओं के कंधों पर टिकी है. भूमि पेडनेकर और कोंकणा सेन. दोनों का काम ठीक ही रहा है. अगर ये कहे कि दोनों की जोड़ी ने गदर मचा दिया, या कुछ ऐसा कर दिया कि आंखे चौंधिया गईं, तो ये कहना गलत होगा. उन्हें जितना करने को कहा गया, उन्होंने उतना करने की पूरी कोशिश की. फिर भी ये कह सकते हैं कि कोंकणा कुछ जगहों पर भूमि पर भारी रही हैं. उनके किरदार में ज्यादा गहराई है. भूमि को पूरी फिल्म में कन्फ्यूजड दिखाया गया है. अब कह सकते हैं कि वो किरदार की रिक्वायरमेंट थी, लेकिन उनकी तो एक्टिंग भी उलझ सी गई. इसी तरह भूमि के अपोजिट कास्ट किए गए विक्रांत मेसी का काम भी औसत ही कहा जाएगा. लेकिन कोंकणा के साथ अमोल पाराशर की जोड़ी बढ़िया दिखी है. डिलीवरी बॉय के रोल में भी वे जंच गए हैं.

डायरेक्शन

हमने आपको ये बता ही दिया है कि डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे में काफी कन्फ्यूजन है, ऐसे में इसका क्रेडिट तो अलंकृता श्रीवास्तव को ही देना पड़ेगा. इस बार तो ये भी नहीं कह सकते कि उन्होंने कोई बड़ा मुद्दा उठाने की कोशिश की है, क्योंकि असल में कोई मुद्दा है ही नहीं. सिर्फ कहानी को जलेबी की तरह घुमाया गया है और इसे 120 मिनट तक खींच दिया गया. इसी वजह से ये कहना गलत नहीं होगा- डॉली किट्टी और वो गर्दिश में सितारे!

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