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यूपी पर चुनावी रहमत की बारिश, केंद्र भी पीछे नहीं

राज्य सरकार ने सवा महीने में सवा सौ से ज्यादा योजनाओं के पत्थर लगाए, वहीं केंद्र ने भी सवा सौ करोड़ से ज्यादा की योजनाएं या तो मंजूर कर लीं या फिर योजनाओं के लिए रकम भुगतान करने की शुरुआत कर दी.

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यूपी में चुनाव प्रचार करते राजनाथ सिंह
यूपी में चुनाव प्रचार करते राजनाथ सिंह

उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड है लेकिन चुनावी आहट के बीच यूपी में सरकारी घोषणाओं की बारिश जारी है. राज्य सरकार ने सवा महीने में सवा सौ से ज्यादा योजनाओं के पत्थर लगाए, वहीं केंद्र ने भी सवा सौ करोड़ से ज्यादा की योजनाएं या तो मंजूर कर लीं या फिर योजनाओं के लिए रकम भुगतान करने की शुरुआत कर दी.

सबसे ताजा बारिश का दौर 29 दिसंबर को आया जिसमें एक ही झौके में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने लखनऊ मेट्रो के लिए ढाई सौ करोड़ रुपये रिलीज कर दिए. गृहमंत्री राजनाथ सिंह खुद इस प्रोजेक्ट की रफ्तार बढ़ाने के लिए निगाह बनाए रखेंगे, आखिर तभी तो चुनावी चौधराहट की मेट्रो भागेगी.

इस साल मई में इसी प्रोजेक्ट के लिए केंद्र सराकर ने 300 करोड़ रुपये रिलीज किए थे, यानी चुनावी साल में यूपी को लखनऊ में मेट्रो दौड़ाने के लिए 550 करोड़ रुपये मिल गए हैं. इस प्रोजेक्ट की रफ्तार को लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने खुद शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू से बात की. शहरी विकास मंत्री नायडू ने बताया कि लखनऊ में 23 किलोमीटर लंबी मेट्रो के लिए अनुमानित खर्च लगभग 6,930 करोड़ रुपये है.

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केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट में 1003 करोड़ रुपये देने जा रही है, इसमें से साढ़े पांच सौ करोड़ रुपये रिलीज किये जा चुके हैं. साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये कर्ज के रूप में दिए जा रहे हैं और 297 करोड़ रुपये इक्विटी शेयर के रूप में. बाकी बचे 2128 करोड़ रुपये यूपी सरकार अपने संसाधनों से लगाएगी. इस सिलसिले में यूरोपियन इनवेस्टमेंट बैंक इस प्रोजेक्ट को साढ़े तीन हजार रुपये का कर्ज दे रहा है.

अभी तीन दिन पहले ही एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने नोएडा ग्रेटर नोएडा मेट्रो के लिए एक हजार 587 करोड़ रुपये का कर्जा मंजूर किया है. वो भी बेहद आसान शर्तों और ब्याज दर पर. सरकारी रहमतों की बारिश का ये हाल है कि पारिवारिक कलह के बावजूद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पिछले सवा महीने में सवा हजार से ज्यादा योजनाओं को मंजूरी दे चुके हैं.

अधिकतर के पत्थर लगाये जा चुके हैं कहीं पर्दा खींचकर शिलापट्ट के रूप में तो कहीं वास्तविक शिलान्यास के रूप में. यानी चुनाव आयोग जब चुनाव कार्यक्रम का पर्दा उठाये तो मंच पूरी तरह सजा हुआ दिखे और सरकार अपने संवाद भी बेहतर तरीके से बोल सके. यानी नाटक वास्तविक लगना चाहिए.

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