पिछले 18 वर्षों में बिहार में चाहे कोई भी चुनाव हुआ हो आरजेडी उसमें प्रमुख तौर पर शामिल रही है. जनता दल परिवार से निकलकर बनी राष्ट्रीय जनता दल समाजवादी विचारधारा पर चलने का दावा करती है लेकिन इसे लालू यादव की पार्टी के तौर पर ही देखा जाता है. इसपर वंशवाद के तमाम आरोप भी लगते रहे हैं. बिहार चुनाव में इस बार आरजेडी जनता परिवार की ही पुरानी पार्टी जेडीयू और कांग्रेस के साथ मिलकर एनडीए को चुनौती दे रही है. आइए डालते हैं आरजेडी के सियासी सफर के अहम पड़ावों पर एक नजर.
1. 1997 में तब खड़ी कर ली जब जनता दल में उनके लिए मुश्किल वक्त चल रहा था. चारा घोटाला मामले में आरोपों से घिरने के बाद लालू यादव के लिए जनता दल अध्यक्ष पद पर बने रहना मुश्किल हो गया. शरद यादव को जनता दल का अध्यक्ष पद मिला. इसके बाद 5 जुलाई 1997 को लालू प्रसाद अपने विश्वासपात्र नेताओं को लेकर और यहीं से नींव पड़ी राष्ट्रीय जनता दल की यानी आरजेडी की.
2. रघुवंश प्रसाद सिंह, कांति सिंह समेत लोकसभा के 17 सांसद और राज्यसभा के 8 सांसद लालू प्रसाद की पार्टी में आ गए. लालू प्रसाद यादव के समर्थक नई दिल्ली में जमा हुए और राष्ट्रीय जनता दल बनाकर लालू यादव को इसका अध्यक्ष बनाया गया. इस पार्टी को और लालू यादव ने दावा किया कि ये और समाजवाद का नारा बुलंद करेगा.
3. 1999 के शुरुआत में लालू यादव को चारा घोटाले में जेल जाना पड़ा और बिहार में सरकार की कमान . मार्च 1998 में हुए आम चुनावों में आरजेडी को बिहार में लोकसभा की 17 सीटों पर जीत हासिल हुईं. इसके बाद आरजेडी ने मुलायम सिंह यादव की पार्टी के साथ भाजपा के खिलाफ गठबंधन बनाया लेकिन ये कोशिश भी कोई खास असर नहीं दिखा सकी.
4. अक्टूबर 1999 में . आरजेडी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी लेकिन केवल 10 सीटें ही जीत सकी.
5. हालांकि, 2000 में बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी बहुमत हासिल कर सत्ता में आई. राबड़ी देवी ने फिर से बिहार की सत्ता संभाली. इसके बाद जेल से बाहर आने पर लालू यादव ने केंद्र की सत्ता की ओर रुख किया. 2004 के लोकसभा चुनावों में आरजेडी यूपीए गठबंधन का हिस्सा बनकर चुनावी मैदान में उतरी और 21 सीटों पर जीत हासिल की. केंद्र की सरकार में लालू यादव शामिल हुए और रेल मंत्रालय का जिम्मा संभाला.
6. हालांकि, 2005 में जब बिहार विधानसभा के चुनाव हुए तो समीकरण काफी बदल गए. भाजपा ने एनडीए गठबंधन बनाया और नीतीश कुमार को बिहार में एनडीए के चेहरे के तौर पर पेश किया. लालू यादव की पार्टी को 75 सीटें हीं हासिल हो पाई. हालांकि, कोई भी दल सरकार नहीं बना सका. उसी साल फिर चुनाव हुए और आरजेडी 21 सीटों पर सिमटकर आ गई. एनडीए गठबंधन को बहुमत मिला और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने.
7. बिहार के अलावा झारखंड और पूर्वोत्तर के राज्यों में उपस्थिति दर्ज कराने वाली आरजेडी को 2008 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल हुआ.
8. 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस के साथ सीटों का बंटवारा नहीं हो सका और आरजेडी यूपीए से बाहर आ गई. रामविलास पासवान और समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ हुआ. इस चुनाव में आरजेडी का प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा. लोकसभा में पार्टी के कावल 4 सांसद ही पहुंच पाए. 2010 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ लिया. 30 जुलाई 2010 को राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय पार्टी के दर्जा को वापस ले लिया गया.
9. 2014 के आम चुनावों में आरजेडी फिर यूपीए के साथ मिलकर लड़ी. हालांकि, नरेंद्र मोदी की अगुवाई में उतरी भाजपा की आंधी को रोकने में यूपीए गठबंधन पूरी तरह विफल रहा. लालू यादव सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण चुनावों में नहीं उतर सके. उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती चुनाव हार गए. एनडीए गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत हासिल की. जहां, कांग्रेस पार्टी केवल 44 सीटों पर सिमट कर रह गई वहीं आरजेडी के केवल 4 सांसद लोकसभा पहुंच सके.
10. लोकसभा चुनावों में मिली हार और भाजपा के उदय ने जनता दल परिवार के दलों को एकजुट किया और 14 अप्रैल 2015 को आरजेडी, जेडीयू, जेडी-एस, समाजवादी पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी ने ऐलान किया कि सभी दलों का विलय कर . कई दौर की बातचीत हुई और मुलायम सिंह यादव को प्रस्तावित नई पार्टी का मुखिया भी घोषित कर दिया गया. लालू प्रसाद यादव ने संवाददाता सम्मेलन कर आरजेडी के विलय की घोषणा भी कर दी. लेकिन बिहार चुनाव नजदीक आते ही पड़ गया.
एकजुटता की इस कोशिश के विफल हो जाने के बाद फिर दावा किया गया कि सभी दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे. लेकिन आरजेडी-जेडीयू और कांग्रेस द्वारा कम सीटें घोषित किए जाने के बाद मुलायम सिंह की . जनता परिवार को एक करने का सपना भी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं में फिर से खो गया. बिहार विधानसभा चुनावों में लालू यादव की आरजेडी 101 सीटों पर चुनाव में उतरी है जबकि जेडीयू 101 और कांग्रेस 41 सीटों पर.