जयपुर से अपनी उम्मीदवारी के ऐलान के बाद हुई गिरधारीलाल भार्गव की मृत्यु ने पांच बार से चली आ रही अनवरत जीत के उनके सिलसिले को रोक दिया. समकालीन राजनीति में ऐसे विरले ही हैं जिन्हें जनता इस तरह सिर माथे बिठाती हो. पर उनके जाने के तुरंत बाद अहम सवाल उठ खड़ा हुआ कि उनकी जगह कौन? लंबे समय तक मगजमारी के बाद भाजपा ने आखिरकार घनश्याम तिवाड़ी पर अपना दांव चला और वसुंधरा राजे ने भी उन्हें अपना समर्थन दिया. तिवाड़ी क्यों? इसमें दो राय नहीं कि वे सच्चे मायनों में खांटी सियासतदां हैं. लेकिन उससे भी बड़ी योग्यता उनकी ब्राह्मण होने की है और जयपुर सीट को परंपरागत रूप से ब्राह्मणों की सीट माना जाता रहा है. वैसे, यह कहना पड़ेगा कि भार्गव की भारी लोकप्रियता में उनके ब्राह्मण होने से ज्यादा उनके जनता का सच्चा हमदर्द होने का बड़ा रोल था. खैर, एक वक्त राजमाता गायत्री देवी यहां से जीतती आई थीं. कांग्रेस ने भी यहां से महेश जोशी के रूप में ब्राह्मण प्रत्याशी उतारा है.
सियासी पार्टियों की चुनावी रणनीति के अध्ययन के लिहाज से जयपुर एक आदर्श सीट है. निर्णायक तत्व सिर्फ और सिर्फ जाति है. सिर्फ भी आला नेता से पूछिए कि फलां को उस सीट से टिकट क्यों दिया? तुरंत जवाब आएगा कि उस सीट पर फलां जाति के मतदाता ज्यादा हैं या फलां जाति पर पार्टी की नजर है. किसी प्रत्याशी की जाति वाले मतदाताओं का विस्तार अगर पड़ोस वाली सीट पर भी है तो उसकी संभावनाएं और भी प्रबल. मान लीजिए, किसी इलाके में जाट नाराज हैं. मसलन, बाड़मेर. यहां कांग्रेस के कर्नल सोनाराम पार्टी से खफा हैं. ऐसे में माना यह जा रहा है कि जाटों का एक तबका भाजपा के राजपूत प्रत्याशी मानवेंद्र सिंह को वोट दे सकता है.
यानी सभी जातियों पर नजर मारिए और फिर सर्वाधिक मतदाता वाली जाति के प्रतिनिधि को टिकट दे दीजिए. वे दिन लद गए, जब वसुंधरा राजे ने झालावाड़ को अपना गृह निर्वाचन क्षेत्र बनाया या माली जाति के होते हुए भी अशोक गहलोत जोधपुर में दबदबा बनाए रहे. पर आज? नागौर में जाट को ही उतारना पड़ेगा. और वह जाट अगर नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा हो तो फिर तो सोने में सुहागा. ज्योति के रूप में गहलोत दिग्गज जाट नेता की विरासत को एक तरह से वापस ले आए हैं. हालांकि बाबा (नाथूराम) किसानों के हित की लड़ाई में जाति वगैरह के दायरे से ऊपर उठ चुके थे.
{mospagebreak}जातिगत समीकरण ही तो हैं जो आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को सामान्य सीटों पर उतारे जाने को मजबूर कर रहे हैं. मीणाओं को ही लीजिए. हाल के विधानसभा चुनाव ने साबित किया है कि वे जाटों को पीछे धकेलते हुए सियासी दबदबे वाली सबसे बड़ी बिरादरी बन गए हैं. कांग्रेस ने नमोनारायण मीणा को सवाई माधोपुर सामान्य सीट से इसलिए उतारा क्योंकि दौसा आरक्षित सीट पर किरोड़ीलाल मीणा या किसी अन्य के लिए विकल्प खुला रखना था. यहां से अब उसने पूर्व आइपीएस लक्ष्मण मीणा को पेश किया है. वह मीणाओं को बताना चाहती थी कि उनकी बिरादरी के प्रति वह कितनी चिंतित है. समीकरण का ही तकाजा था कि गहलोत अपने पुत्र वैभव को सवाई माधोपुर सीट से उतार न सके. और मौका होने के बावजूद निजी हितों का बलिदान करते हुए गहलोत ने भी एक मिसाल ही बनाई है.
जातिगत समीकरणों की वजह से ही पार्टियां विधानसभा चुनाव में हारे नेताओं या उनके परिजनों को टिकट देने पर मजबूर हो रही हैं. अलवर में यादवों के दबदबे को देखते हुए भाजपा ने यहां से विधायक जसवंत यादव की अर्धांगिनी किरण को टिकट दिया है. कांग्रेस ने भंवर जितेंद्र सिंह को उतारकर डॉ. करण यादव को नाराज होने का मौका दे दिया. जयपुर ग्रामीण से कांग्रेस ने जाट लालचंद कटारिया को चुना है तो भाजपा ने राजपूत राव राजेंद्र सिंह पर दांव खेला है.
कहने की जरूरत नहीं कि इस सबके बाद मुद्दों की बात के कोई मायने ही नहीं रह जाते हैं. ऐसे में अगर कोई अच्छी छवि और अच्छे चरित्र वाले प्रत्याशी चुनने की बात करता है तो यह विकल्प एक जाति विशेष के बीच ही सिमटकर रह जाता है. प्रतिद्वंद्वियों के वोटबैंक में सेंध मारने के लिए जाति के आधार पर कई डमी प्रत्याशी भी उतारे जा रहे हैं. यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि टीवी और संगोष्ठियों वगैरह में शानदार प्रदर्शन करने वाले सचिन पायलट को आधुनिक जयपुर का चेहरा बनाकर पेश करने की बजाए गुर्जर वोट बहुल अजमेर से पेश किया जाता है. यहां तक कि राजे के पुत्र दुष्यंत को भी गुर्जरों का समर्थन पाने के लिए पत्नी निहारिका को वोट मांगने भेजना पड़ा है, जो कि उसी समुदाय की हैं.
तो मुद्दे ये हैं कि किरोड़ीलाल मीणा अगर कांग्रेस से दूर रहे तो कांग्रेस को मिलने वाले मीणा वोटों पर असर पड़ेगा. एक धारणा यह बनी है कि गुर्जरों से समझौते की वजह से मीणा और दूसरी जनजातियां भाजपा से दूर हो गई हैं. अब तो गुर्जर नेता किरोड़ीसिंह बैंसला पार्टी में ही शामिल हो गए हैं. मुद्दा तो यह भी है कि बसपा का कोई वोटबैंक है या नहीं और अगर है तो क्या यह अपने छह विधायकों को हड़पने के लिए कांग्रेस को दंडित करेगा?
{mospagebreak}परिसीमन के बाद राजपूत बहुल हुई जोधपुर सीट से टिकट देने में कांग्रेस ने ज्यादा सतर्कता दिखाते हुए राजपूत कार्ड खेला. भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद जसवंतसिंह विश्नोई पर भरोसा किया है. राजपूत मतदाता भले बढ़ गए हों लेकिन बदले हालात में भी भाजपा को यहां काफी जोर आजमाइश करनी पड़ेगी. पाली में शामिल जाट बेल्ट ओसियां, भोपालगढ़ और बिलाड़ा के मतदाता भी हार-जीत में अपनी सीधी दखल रखेंगे. यही वजह है कि भाजपा ने पुराने घोड़ों को दौड़ाया है. कांग्रेस ने पूरी तरह से जातिगत समीकरणों को ध्यान में रख फिर जाटों को महत्व देते हुए बद्रीराम जाखड़ को पाली में उतारा है तो भाजपा के मौजूदा सांसद पुष्प जैन मैदान में हैं.
टिकट वितरण में जातिवाद सब ओर हावी है. जालौर-सिरोही में कलबी मतों की बहुलता के कारण दोनों पार्टियों ने कलबी जाट उम्मीदवार पेश किए हैं. भाजपा से देवजी एम. पटेल और कांग्रेस से संध्या चौधरी हैं. दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता इन प्रत्याशियों को पचा नहीं पा रहे हैं. इसी बीच चौधरी की एक सीडी कांग्रेस के लिए गलफांस बन गई है. इसमें चौधरी जाति के लोगों को पार्टी से ज्यादा तवज्जो देने की बात कहते हुए देखे गए हैं. भाजपा में पटेल की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही एक प्रमुख दावेदार तारा भंडारी भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में फूट-फूटकर रोने लगीं. भाजपा से अब तक जुड़ी रही राजपुरोहित राजपूत जाति भी अपने प्रतिनिधि को टिकट न मिलने से नाराज दिख रही है.
जाटलैंड नागौर में परिसीमन के बाद लगा था कि शायद किसी दूसरी जाति का उम्मीदवार भी खड़ा हो सके. पर आखिरकार ज्योति मिर्धा और बिंदु चौधरी के रूप में वही जाति का दांव. संसदीय चुनावों में अहम भूमिका निभाने वाले जाट बैल्ट मेड़ता-डेगाना इस दफा राजसमंद जिले में चले गए. अभी तक के संसदीय चुनावों में मेड़ता-डेगाना से ही सांसद बनते आए थे. इन दो क्षेत्रों की जगह जायल और लाडनूं नागौर में शामिल हुए. जायल क्षेत्र भी पूरी जाट पट्टी है.
चार जिलों के जोड़-तोड़ से बनी नई लोकसभा सीट राजसमंद में भाजपा ने अजमेर के सांसद रासासिंह रावत को खड़ा किया है. वे इसी जिले के हैं. कांग्रेस ने नागौर के राजपूत जमींदार परिवार गोपालसिंह इड़वा को यहां से प्रत्याशी बनाया. दूसरे जिले का होने से इड़वा को स्थानीय कार्यकर्ताओं का विरोध झेलना पड़ा.
{mospagebreak}परिसीमन के बाद बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र का भूगोल कुछ के लिए राहत देने वाला तो कुछ के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला बन गया है. लेकिन सीधे तौर पर देखें तो ज्यादातर राजपूत मतदाताओं, जो कि भाजपा समर्थक हैं, के जोधपुर लोकसभा क्षेत्र में चले जाने से उसका सीधा नुक्सान भाजपा प्रत्याशी मानवेंद्र सिंह को होगा. नए परिवेश में धोरों की राजनीति का रंग चटख हो गया है. पहली दफा चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के हरीश चौधरी लड़ाई में हैं लेकिन विधायक कर्नल सोनाराम चौधरी के भितरघात के अंदेशे और मुसलमान मतदाताओं के खुलकर कांग्रेस के समर्थन में न आने से चौधरी मामला फंस गया है. कुल 14 लाख में से दो लाख मुसलमान मतदाता निर्णायक होंगे. वैसे यहां सबसे ज्यादा करीब तीन लाख मतदाता जाट हैं. पिछले चुनाव में मानवेंद्र ने जीत की तिकड़ी बना चुके कर्नल को चुनावी प्रबंधन कौशल के बूते उनके ही मोहरों से मात दी थी. मुसलमान मतदाताओं पर मानवेंद्र का जादू जमकर चला था. इस दफा वैसे चौधरी के पक्ष में जाट मतदाता लामबंद हैं. इलाके के 8 में से 6 विधायक कांग्रेसी हैं. दो तो राज्य सरकार में मंत्री हैं. गहलोत के लिए भी यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल है क्योंकि चौधरी को वे ही लाए हैं.
भीलवाड़ा सीट पर मौजूदा सांसद वी.पी. सिंह के सामने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सी.पी. जोशी की मौजूदगी ने मुकाबले को रोचक बना दिया है. यहां कुल 14.92 लाख मतदाताओं में सवा लाख से ज्यादा ब्राह्मण हैं. बूंदी का हिंडौली और नैनवां क्षेत्र मिलने से गुर्जरों की तादाद डेढ़ लाख हो गई है. तिकड़ी बनाने की जुगत में जुटे सिंह के तिलिस्म को तोड़ने के लिए जोशी जातिगत समीकरणों पर ही निर्भर हैं. राज्य सरकार के नव नियुक्त मंत्री रामलाल जाट उन्हें जाट वोट दिलाने में मददगार हो सकते हैं. भीलवाड़ा के गुर्जरों ने तो कर्नल किरोड़ीसिंह बैंसला के भाजपा में शामिल होने को समाज के साथ धोखा बताते हुए उन्हें जिले की सीमा में न घुसने देने की धमकी दे डाली है. उनके चुनाव लड़ने पर कई नेताओं ने उनके खिलाफ प्रचार में उतरने को कहा है. भाजपा से छिटका वोट बैंक कांग्रेस के लिए ''सोने पे सुहागा'' बन सकता है लेकिन प्रह्लाद गुंजल की कांग्रेस से नाराजगी के अलावा बसपा से गुर्जर प्रत्याशी की उम्मीदवारी के कारण ऐसी उम्मीद कम है. बसपा ने यहां उत्तर प्रदेश के विज्ञान और औद्योगिक मंत्री हरीश गुर्जर को लड़ाया है.
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के करौली-धौलपुर, भरतपुर और दौसा संसदीय क्षेत्रों में सभी राजनैतिक समीकरण ध्वस्त होते दिखाई दे रहे हैं. करौली-धौलपुर सुरक्षित सीट से खिलाड़ीलाल बैरवा (कांग्रेस), डॉ. मनोज राजौरिया (भाजपा) और हट्टीराम जाटव (बसपा) प्रत्याशी हैं. करौली-धौलपुर सीट से जाटव और खटीक समाज को टिकट मिल गया लेकिन कोली समाज के दावेदारों को किसी भी पार्टी से टिकट न मिल पाने से समाज में रोष है. टोडाभीम पंचायत समिति के प्रधान रामसिंह महावर (कोली) ने कांग्रेस से टिकट के लिए बड़ी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए.
{mospagebreak}सामान्य रही सीट भरतपुर अब आरक्षित (अनुसूचित जाति) हो गई है. प्रत्याशी हैं रतनसिंह जाटव (कांग्रेस) और खेमचंद कोली (भाजपा). जाटव भरतपुर कांग्रेस संगठन से कभी भी किसी संपर्क में नहीं रहे. सरकारी कर्मचारी रहे जाटव रिटायर होने के बाद कांग्रेस का टिकट ले आए. वहीं कोली गांव से जुड़े हैं. राजा महाराजाओं के गढ़ रहे भरतपुर की राजनीति में जाट समुदाय का दबदबा रहा है पर आरक्षित होने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि जाट किस ओर जाते हैं.
इस बार जनजाति के लिए आरक्षित हुई दौसा सीट पर मुकाबले के लिए पूर्व आइपीएस लक्ष्मण मीणा कांग्रेस की ओर से मुखातिब हैं. टोडाभीम के विधायक और मीणा समाज के कद्दावर नेता डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरा है. विधानसभा चुनाव में उनके साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाले परसादीलाल मीणा, रामकिशोर सैनी और ममता भूपेश में से एक भी उनके पर्चा भरते वक्त मौजूद नहीं था. इस सीट से राजेश पायलट, उसके बाद उनकी पत्नी रमा पायलट और फिर पुत्र सचिन पायलट सांसद रहे हैं. जम्मू कश्मीर के राजौरी-पूंछ जिले से गुर्जर समुदाय के कमर रब्बानी ने भी निर्दलीय के रूप में पर्चा दाखिल किया है. कैसे? वो ऐसे कि जम्मू-कश्मीर में गुर्जर अनुसूचित जनजाति में आते हैं. दौसा जिले के बारे में यह देखने को मिला है कि जहां जिस जाति का दांव लगा, वहां उसने अपनी मनमानी और मनचाहे तरीके से मतदान किया है.
जातिवाद का असर झालावाड़ सीट पर भी कम नहीं. परंपरागत रूप से पूर्व मुख्यमंत्री और अब विपक्ष की नेता वसुंधरा राजे का गढ़ रहे झालावाड़ संसदीय क्षेत्र में पिछले 6 लोकसभा चुनावों से पहले राजे और पिछले चुनाव से पुत्र दुष्यंत झालावाड़ संसदीय क्षेत्र के राजपूत बहुल मतदाताओं को रिझाते रहे हैं. परिसीमन के बाद नए समीकरण में वैश्य समाज के बड़े वोट बैंक के रूप में उभरने से झालावाड़ क्षेत्र में पड़ने वाले बारां जिले के कांग्रेसी विधायक प्रमोद जैन 'भाया' की पत्नी उर्मिला जैन को कांग्रेस ने टिकट दिया है. इस इलाके की अंता विधानसभा सीट पर वैश्य समाज की अच्छी आबादी है और झालावाड़ में भी समाज की मौजूदगी ठीक-ठाक है. झालावाड़ क्षेत्र में राजपूत मतदाताओं की अच्छी-खासी पैठ रही है जिसके चलते राजे और उनके पुत्र यहां से लोकसभा चुनाव जीतते रहे हैं वहीं कांग्रेस ने राजपूत मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए वसुंधरा के सामने दो बार मान सिंह और एक बार भरत सिंह को चुनाव लड़वाया था. इस सीट पर गुर्जर भी बहुतायत में हैं. राजे ने झालारपाटन से 2003 में विधानसभा चुनाव लड़ा तो रमा पायलट कांग्रेस की ओर से उनके सामने थीं.
{mospagebreak}कोटा सीट के प्रत्याशियों को देखकर भी जातिगत समीकरणों का ख्याल साफ नजर आता है. भाजपा ने पुरानी परिपाटी पर चलते हुए ब्राह्मण उम्मीदवार फिर से उतारा है. 80 के दशक तक सुरक्षित रही इस सीट के सामान्य होने के बाद भाजपा ने हमेशा सवर्ण को ही टिकट दिया. मौजूदा सांसद रघुवीरसिंह कौशल की सेहत ठीक न होने से इस दफा भाजपा ने श्याम शर्मा पर दांव लगाया है.
राज्य के उत्तर पश्चिम छोर पर स्थित गंगानगर लोकसभा सीट का भूगोल भी बदल गया है. परिसीमन के बाद दो विधानसभा क्षेत्र टिब्बी और केसरीसिंहपुर खत्म हो गए. नोहर और भादरा चूरू में चले गए. रायसिंहनगर, सूरतगढ़ और पीलीबंगा को बीकानेर से हटाकर जोड़ दिया गया. लेकिन एक बात नहीं बदली. वो है जात. यहां से नौ बार कांग्रेस और तीन बार भाजपा जीती है. पर एक बार भी कोई गैर-मेघवाल सांसद नहीं बना. पन्नाराम बारूपाल से हुई इस शुरुआत को बीरबलराम, बेगाराम, शंकर पन्नू ने आगे बढ़ाया. अब यह सिलसिला बेगाराम के बेटे निहालचंद जारी रखे हुए हैं.
उनके सामने कांग्रेस की ओर से भरतराम मेघवाल हैं. भाजपा से डॉ. ओ.पी. महेंद्रा और सीताराम मौर्य दावेदारों में थे. पर पार्टी निहालचंद से आगे सोच ही नहीं पाई. असल में, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित गंगानगर से इस वर्ग का उम्मीदवार उतारना राजनैतिक दलों की मजबूरी है. पर मेघवाल ही क्यों? इसका जवाब देने की कोशिश करते हुए कांग्रेस नेता जगदीश जांदू कहते हैं, ''यहां अनुसूचित जाति के वोट बैंक में करीब एक तिहाई हिस्सा मेघवालों का है, इसलिए राजनैतिक दलों को लगता है कि यह जाति निर्णायक साबित होगी. यह फीडबैक ही शायद हर चुनाव में उम्मीदवारों के चयन का आधार बनने लगा है.'' राजनैतिक समीकरण कोई भी हों, मुद्दे कैसे भी हों, कोई भी जीते, गंगानगर लोकसभा सीट लगातार 16वीं बार एक मेघवाल को अपना सांसद चुनने जा रही है. एक ही मुद्दा है और वो है मेघवाल का. कौन कह रहा था कि चुनाव में जाति की बात करना लोकतांत्रिक दृष्टि से आदर्श नहीं है.
तो भइया, पिछली वसुंधरा राजे सरकार भ्रष्ट थी या नहीं या फिर मनमोहन सिंह कमजोर प्रधानमंत्री हैं या नहीं? राजे ज्यादा ऊर्जावान थीं या गहलोत हैं? केंद्र में भाजपा बेहतर साबित होगी या कांग्रेस? ये सब बातें पार्टियों के प्रतिबद्ध वोटबैंक के ही .जेहन में आती हैं. पार्टियों का मानना है कि बाकी दूसरे लोग तो जाति की लाइन पर वोट डालते हैं. और पार्टियों की यह धारणा अमूमन सच ही साबित हुई है. राजस्थान की राजनीति कुछ ज्यादा ही जातिवादी हो गई है.
-साथ में पीयूष पाचक, विजय महर्षि, रामप्रकाश मील, रुबीना .काजी, प्रकाश शर्मा और विमल भाटिया