दिल्ली के एक बुजुर्ग रिटायरमेंट के बाद कुछ अलग ढंग से ही जीवन बिता रहे हैं. 75 साल की उम्र में आज लोग उन्हें उनके काम से पहचानते हैं. वो अब झुग्गी में रहने वाले बच्चों की पढ़ाई के लिए घर-घर जाकर लोगों से बेकार लकड़ी मांगते हैं. फिर उन लकड़ियों से बेंच और डेस्क आदि बनाकर इन बच्चों के लिए चल रहे ओपन स्कूल में देते हैं.
मयूर विहार के राम गोपाल गुप्ता ने आज तक से बातचीत में बताया कि उनके इस काम में एक बुजुर्ग कारपेंटर उनकी मदद करते हैं. वो कहते हैं कि बेकार लकड़ियों को लोग बहुत सस्ते दामों में बेच देते हैं या फेंक देते हैं, लेकिन अगर वो हमें दे देते हैं तो हम बच्चों के लिए इससे काम की चीजें बना लेते हैं. प्राइवेट नौकरी से रिटायरमेंट के बाद उन्होंने समाज सेवा को फुलटाइम प्रोफेशन बना लिया है. उनका दावा है कि वो सैकड़ों बेंच के सेट बनवाकर स्कूल के बच्चों के लिए डोनेट कर चुके हैं. ये डेस्क ऐसे स्कूलों में दिए हैं जहां बच्चे गर्मी और सर्दी में जमीन पर बैठकर पढ़ाई करते थे.
ऐसे हुई शुरुआत
वो बताते हैं कि एक बार यमुना खादर की झुग्गियों के पास ठंड में बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ते देखा तो मन दुखी हुआ. ये बच्चे झुग्गी में चल रहे स्कूल में जमीन पर बैठे थे. मैंने वहीं से पहल शुरू की और घर-घर जाकर लोगों से लकड़ी मांगी. लोग कबाड़े में रखी लकड़ियां देने लगे तो सिलसिला चल निकला.
कारपेंटर रईसुद्दीन का बड़ा रोल
बच्चों के लिए बेंच बनाने में बुजुर्ग कारपेंटर रईसुद्दीन का भी बहुत बड़ा रोल है. राम गोपाल लकड़ियां मांगकर लाते हैं तो रईसुद्दीन इन लकड़ियों को अपनी मेहनत से बेंच का आकार देते हैं. वो इसके लिए बहुत कम मेहनताना लेते हैं.
बच्चे और पत्नी कर रहे मदद
रामगोपाल बताते हैं कि उनकी पत्नी सुशीला देवी रिटायर टीचर हैं. मैंने अपनी शुरुआत उनकी पेंशन से की थी. तब मैंने एक कारपेंटर रखा था, फिर जब लोग बच्चों के कपड़े भी देने लगे तो उन्होंने एक टेलर भी रखा. ये टेलर भी बुजुर्ग हैं, इन्हें काम मिला तो ये भी इस मुहिम में साथ हो गए. रामगोपाल कहते हैं कि अब मुझे बेटा-बहू और मेरी बेटी भी मदद कर रही हैं. इसके साथ-साथ समाज के लोग भी लकड़ी पहुंचाने या बेंच-कपड़े बंटवाने में मदद कर देते हैं.