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बीएचयूः इतिहास का हिस्सा बनने की बजाए अपनाए आधुनिक कोर्स

पारंपरिक शिक्षा में उत्कृष्टता बरकरार रखते हुए आधुनिक कोर्स अपनाकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (बीएचयू) ने बढ़त बनाई.

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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1916 में की थी. तब से लेकर आज तक यह यूनिवर्सिटी अपने जनक के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए निरंतर देश के निर्माण में शिक्षा का उपयोग करती आ रही है. लेकिन अपनी स्थापना के सौ साल पूरे करने के करीब पहुंच चुकी यह विख्यात यूनिवर्सिटी एक जगह ठहरकर इतिहास का हिस्सा बन जाने की बजाए समय की मांग के साथ नए-नए कोर्स अपना रही है. वहीं बहुत-से दूसरे पुराने इंस्टीट्यूट अतीत के गर्भ में समा चुके हैं. इस यूनिवर्सिटी की यह गतिशीलता इंडिया टुडे ग्रुप-नीलसन के बेस्ट यूनिवर्सिटी सर्वे में साफ तौर पर देखी जा सकती है. 2013 में चौथे और पिछले साल तीसरे स्थान पर रहने के बाद लगातार बढ़त बनाते हुए बीएचयू इस बार दूसरे स्थान पर पहुंच गई.

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इस यूनिवर्सिटी के निरंतर आगे बढऩे की वजह यह है कि आर्ट्स और साइंस के क्षेत्र में उत्कृष्टता के अलावा इसने समय के साथ हो रहे बदलाव को पहचाना है और खुद को उसके अनुसार ढाला है. मसलन, 2008 में शुरू किए गए कोर्स सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूजन ऐंड इन्क्लूसिव पॉलिसी को लिया जा सकता है. यह कोर्स हमारे सामाजिक-राजनैतिक समाज में व्याप्त प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भेदभाव की राजनीति का विश्लेषण करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है. सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान से जुड़े आंदोलनों को व्यापक विषयों में शामिल करते हुए यह सेंटर इतिहास को नए सिरे से पढऩे पर जोर देता है. यह यूनिवर्सिटी अब सबऑल्टर्न स्टडीज में एमफिल और पीएचडी भी कराती है. यहां अध्ययन में जितना ध्यान थ्योरी पर दिया जाता है, उतना ही प्रयोगों पर भी दिया जाता है. इस तरह शैक्षिक रूप से उपेक्षित क्षेत्रों में भी रिसर्च की जा सकती है.

मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च को यूजीसी की आठवीं योजना के तहत 1998 में शुरू किया गया था. यह विभाग भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. यहां संघर्ष के विभिन्न क्षेत्रों की दशाओं का अध्ययन किया जाता है. फरवरी, 2014 में इस विभाग के प्रोफेसर प्रियंकर उपाध्याय को डबलिन सिटी यूनिवर्सिटी में आइसीसीआर चेयर प्रोफेसरशिप का सम्मान दिया गया. अगर सोशल एक्सक्लूजन और पीस रिसर्च सेंटर विभिन्न राजनैतिक धाराओं का अध्ययन करता है और सार्वजनिक नीति निर्माण की दिशा में काम करता है तो सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड रूरल डिपार्टमेंट हफ्ते में दो बार हर्बल कल्टीवेशन ट्रेनिंग कोर्स चलाता है, जो छात्रों को उनकी जड़ों से जोडऩे का काम करता है और उन्हें इस बात का प्रशिक्षण देता है कि हर्बल चाय, तेल और औषधीय काढ़ा कैसे तैयार किया जाता है.

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हम जानते हैं कि फैकल्टी ऑफ विजुअल आर्ट्स में फाइन आर्ट्स की बारीकियों का अध्ययन किया जाता है. लेकिन इसमें एप्लाइड आर्ट के तौर पर प्लास्टिक, टैक्सटाइल और पॉटरी की कक्षाओं को शामिल करना फाइन आर्ट्स की व्यापकता को प्रदर्शित करता है. इस तरह के कोर्स के लिए यह दुर्लभ चीज है, लेकिन फाइन आर्ट्स का फुल टाइम अध्ययन करने वाले छात्रों के दिमाग में इससे अपनी कला के बारे में नई अवधारणा विकसित होती है. विज्ञापन और डिजाइन को भी जोडऩे वाला यह कोर्स आज के बाजार आधारित कोर्सों से अलग है.

यह यूनिवर्सिटी चॉयस-बेस्ड क्रेडिट सिस्टम के तहत एक-दूसरे से संबद्ध विभिन्न कोर्सों का अध्ययन शुरू करने की तैयारी कर रही है. इस तरह का कोर्स अगले शैक्षिक सत्र से शुरू होने वाला है. कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी का मानना है कि विभिन्न कोर्सों को आपस में जोडऩे का विचार बीएचयू के उस नजरिए के अनुकूल ही है, जिसका उद्देश्य छात्रों को समग्र शिक्षा देना है. वे कहते हैं, “हर व्यक्ति में कई तरह की प्रतिभाएं होती हैं और अगर आप उसकी ऊर्जा को किसी एक क्षेत्र में सीमित कर देते हैं तो बाकी की प्रतिभाएं खत्म हो जाती हैं और उसका व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है. एक-दूसरे से जुड़ी शिक्षा का विचार हमारे व्यक्तित्व को पूरी तरह विकसित होने का मौका देता है. हम अपने छात्रों को ऐसा अवसर और मंच देना चाहते हैं, जहां वे करियर बनाने के इस उद्देश्य को पूरा कर सकें.”

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हालांकि अभी इस तरह का कोर्स शुरू होने में कुछ समय बाकी है, लेकिन इस बीच यूनिवर्सिटी के विभिन्न विभाग अपना स्तर बढ़ाने की दिशा में प्रयासरत हैं. 2014 में इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के दो सीनियर प्रोफेसर&पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर एस. चूणामणि गोपाल और द्रव्यगुण विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर के.सी. चूणेकर को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

यहां के छात्र भी अपने-अपने क्षेत्र में पीछे नहीं हैं. लेखक और संगीतज्ञ शुभंकर डे फैकल्टी ऑफ परफॉर्मिंग आट्र्स से संगीतशास्त्र में मास्टर हैं. उन्होंने 2013-14 में युवा मामलों एवं खेल मंत्रालय से वित्तीय सहायता प्राप्त इंटर-यूनिवर्सिटी जोनल और नेशनल यूथ फेस्टिवल में संगीत के कई पुरस्कार हासिल किए. राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 2015 के यूथ फेस्टिवल में तबला वादन वर्ग में आनंद मिश्र पहले उप-विजेता रहे. प्लांट फिजियोलॉजी विभाग के रिसर्च के छात्र प्रसन्न कुमार को फरवरी, 2014 में लखनऊ में आयोजित 16वें भारतीय कृषि वैज्ञानिक और किसान सम्मेलन में युवा वैज्ञानिक का पुरस्कार दिया गया. यहां हर विभाग के छात्रों को हर साल औसतन पांच जूनियर रिसर्च फेलोशिप दी जाती हैं, जो बीएचयू में शिक्षा और शोध के महत्व को दर्शाता है. 2013-14 के शिक्षा सत्र में विभिन्न विभागों के प्राध्यापकों की 325 राष्ट्रीय और 18 अंतरराष्ट्रीय पुस्तकें प्रकाशित हुईं. फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज को 2001 में ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन की ओर से क्वालिटी इंप्रूवमेंट प्रोग्राम सेंटर के तौर पर मान्यता दी गई थी. यह फैकल्टी बीएचयू मैनेजमेंट रिव्यू नाम से एक रिसर्च जर्नल निकालती है. इस जर्नल में मैनेजमेंट के सर्वश्रेष्ठ समसामयिक शोधों को रेखांकित किया जाता है. इस फैकल्टी के माध्यम से बीएचयू ने इथोपिया और जर्मनी के कॉलेजों के अलावा अमेरिका की पांच यूनिवर्सिटी के साथ एमओयू पर दस्तखत किए हैं.

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वाइस चांसलर त्रिपाठी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की पुरानी प्रतिष्ठा को याद करते हुए कहते हैं, “तत्कालीन संगीत फैकल्टी के प्रथम डीन ओंकारनाथ ठाकुर ने (इटली के तानाशाह बेनिटो) मुसोलिनी की अनिद्रा की बीमारी का इलाज नींद लाने वाली धुनें बजाकर किया था. कई दिनों तक न सो पाने से चिड़चिड़े मुसोलिनी ने उनके इस इलाज को आजमाने का फैसला किया. नतीजा अपने आप में एक मिसाल है. मुसोलिनी कई दिनों की अनिद्रा की भरपाई करते हुए किसी बच्चे की तरह कई दिनों तक सोते रहे.” मुसोलिनी की यह कहानी भले प्रामाणिक न हो, लेकिन इस बात में संदेह नहीं है कि आज भी बीएचयू की प्रतिष्ठा किसी चट्टान की तरह अपनी जगह अडिग है.

यूनिवर्सिटी के तीन अनोखे सेंटर
-सेंटर फॉर स्टडी ऑफ एक्सक्लूजन ऐंड इक्सक्लूसिव पॉलिसी
-सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ नेपाल
-मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च

सम्मान बटोरे
हाइड्रोजन एनर्जी सेंटर के अध्यापकों और विद्वानों ने हाइड्रोजन एनर्जी के इंटरनेशनल जर्नल के लिए पेपर तैयार करने में सहयोग दिया. प्रसिद्ध चीनी विद्वान जिनझी मू ने भी इसकी तारीफ की.

परंपरा का निर्वाह
बीएचयू के ग्रेजुएट छात्रों के दीक्षांत समारोह की पोशाक में गाउन की जगह अब कुर्ता-पाजामा और सफेद रंग के साफे ने ले ली है, जो मदन मोहन मालवीय जी पहना करते थे.

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प्रसिद्ध पूर्व छात्र
पुलिकेल एम. अजयन
बेंजामिन एम. और मैरी ग्रीनवुड एंडरसन प्रोफेसर इन इंजीनियरिंग
राइस यूनिवर्सिटी

नागेंद्र कुमार सिंह
डॉ बी.पी. पाल चेयर
इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट

दिव्या सिंह
पूर्व कप्तान


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