एक वो दौर आया जब उसके साथ के दूसरे बच्चों ने उसे कमजोर समझकर इग्नोर करना शुरू कर दिया था. आयशा उस वक्त जब उसके दोस्त उसे इग्नोर कर रहे थे, वो और मजबूत होती जा रही थीं. यही वो समय था जब वो अपनी बातें फोन पर रिकॉर्ड करने लगीं, वो उसकी खूबसूरत फीलिंग्स थीं, जो सभी को प्रेरित करती थीं. अब उसे मोटिवेशन स्पीच के लिए बुलाया गया तो वो तैयार हो गईं. आयशा की सेहत जब बहुत गिरने लगी तो उसने बेड पर लेटे-लेटे ही लिखना शुरू कर दिया था. वो कम से कम 5000 शब्द रोज लिखती थीं. उनके इन्हीं लेखों ने एक किताब का रूप ले लिया. उसकी किताब ‘My Little Epiphanies‘ उनकी मौत से कुछ घंटे पहले ही छपकर आई थी. उनकी किताब आज भी लोगों को प्रेरित कर रही है, शायद इसी प्रेरणा को फिल्म में ढाला गया है.
फोटो: आयशा की किताब का कवर पेज
Image Credit: Bloomsberry.png