आज सेना दिवस है और इस दिन भारतीय सेना उस दिन को याद करती है जब भारतीय सेना पूरी तरह से आजाद हो गई और सेना की कमान पहली बार एक भारतीय को सौंप दी गई थी. आज से 70 साल पहले यह कमान कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (केएम करिअप्पा) को दी गई थी. उन्होंने कई साल भारत का नेतृत्व किया. आइए जानते हैं करिअप्पा से जुड़ी कई दिलचस्प बातें...
भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (K.M Cariappa) थे. उन्होंने साल 1947 में हुए भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व भी किया.
के एम करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक में हुआ. उनके पिता कोडंडेरा माडिकेरी में एक राजस्व अधिकारी थे. वे वह अपने परिवार सहित लाइम कॉटेज में रहा करते थे. करिअप्पा के तीन भाई तथा दो बहनें भी थी.
घर में उन्हें सभी लोग प्यार से ‘चिम्मा’ कहकर पुकारते थे. करिअप्पा की प्रारम्भिक शिक्षा माडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल में हुई. शुरू से ही वह पढ़ाई में बहुत अच्छे थे. उन्हें मैथ्स और चित्रकला बेहद पसंद थी. साल 1917 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कालेज में एडमिशन ले लिया.
एक होनहार छात्र के साथ-साथ वह क्रिकेट, हॉकी, टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी रहे. वे भारतीय सेना के उन दो अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गई. फील्ड मार्शल सैम मानेकशा दूसरे ऐसे अधिकारी थे, जिन्हें फील्ड मार्शल का रैंक दिया गया था.
करिअप्पा को 'कीपर' के नाम से पुकारा जाता था. वह फील्ड मार्शल के पद पर पहुंचने वाले इकलौते भारतीय है. फील्ड मार्शल और बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने अयूब खान ने 1946 में उनके तहत काम किया.
अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उन्हें 'Order of the Chief Commander of the Legion of Merit' से सम्मानित किया.
पूरी ईमानदारी से देश को दी गयी उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने साल 1986 में उन्हें 'Field Marshal' का पद प्रदान किया.
Indian Army से साल 1953 में रिटायर होने के बाद करियप्पा ने साल 1954 से 1956 तक न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में बतौर हाई कमिश्नर काम किया. करियप्पा यूनाइटेड किंगडम स्थित Camberly के इंपीरियल डिफेंस कॉलेज में ट्रेनिंग लेने वाले पहले भारतीय थे. यूनाइटेड किंगडम से उन्हें ‘Legion of Merit’ की उपाधि मिली थी.
जनरल करियप्पा के लड़के एयर मार्शल के सी करियप्पा ने अपनी किताब में लिखा है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू को इस बात का डर था कि मेरे पिता उनका तख्तापलट कर सकते हैं इसीलिए नेहरू ने 1953 में मेरे पिता को ऑस्ट्रेलिया का हाई कमिश्नर बना के भेज दिया. हालांकि जनरल करियप्पा के नेहरू और इंदिरा के साथ काफी अच्छे संबंध थे फिर भी नेहरू के मन में एक भय था.