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संविधान की प्रस्तावना से 'धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी' शब्द हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई टली

अधिवक्ता अश्विनी ने मेडिकल इमरजेंसी बताते हुए कोर्ट से एडजर्नमेंट की मांग की, वहीं सुब्रमण्यम स्वामी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बहस करना चाहते हैं. इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसा सही नहीं है कि हम एक व्यक्ति की बात सुनें और दूसरे की नहीं. कोर्ट का कहना है कि अगली तारीख पर कोई स्थगन नहीं दिया जाएगा और मामले की सुनवाई की जाएगी. 

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42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े तथा राष्ट्र की एकता शब्द को बदलकर राष्ट्र की एकता और अखंडता कर दिया।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े तथा राष्ट्र की एकता शब्द को बदलकर राष्ट्र की एकता और अखंडता कर दिया।

संव‍िधान की प्रस्तावना से समाजवादी और धर्म न‍िरपेक्ष शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की जा रही है. ये याचिकाएं सुब्रमण‍ियम स्वामी और अध‍िवक्ता अश्व‍िनी उपाध्याय की ओर से दायर की गई हैं. अधिवक्ता अश्विनी ने मेडिकल इमरजेंसी बताते हुए कोर्ट से एडजर्नमेंट की मांग की, वहीं सुब्रमण्यम स्वामी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बहस करना चाहते हैं. इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसा सही नहीं है कि हम एक व्यक्ति की बात सुनें और दूसरे की नहीं. कोर्ट का कहना है कि अगली तारीख पर कोई स्थगन नहीं दिया जाएगा और मामले की सुनवाई की जाएगी. 

क्या है 1976 का वो 42वां संशोधन हो रही जिसमें बदलाव की मांग 

जून 1975 से मार्च 1977 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान में कई बार संशोधन किए. लेकिन सबसे बड़ा संशोधन दिसंबर 1976 में किया गया. इंदिरा सरकार ने संविधान में 42वां संशोधन कर दिया. ये अब तक सबसे विवादित संशोधन माना जाता है. इस संशोधन के जरिए संविधान में कई सारे बदलाव किए गए थे, इसलिए इसे 'मिनी कॉन्स्टीट्यूशन' भी कहा जाता है.

42वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में तीन शब्द- 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' और 'अखंडता' को जोड़ा गया था. ये पहली और आखिरी बार था, जब संविधान की प्रस्ताव में बदलाव हुआ था. इन शब्दों को जोड़ने के पीछे तर्क दिया गया था कि देश को धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर विकसित करने के लिए ये जरूरी है.

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1976 में हुए 42वें संशोधन में सबसे अहम बात ये थी कि किसी भी आधार पर संसद के फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. साथ ही सांसदों और विधायकों की सदस्यता को भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. संसद का कार्यकाल भी पांच साल से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया था. 

42वें संशोधन के प्रावधानों में से एक मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक तत्व को वरीयता देना भी था. इस कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता था. इतना ही नहीं, केंद्र सरकार को ये भी शक्ति मिल गई थी कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए वो किसी भी राज्य में सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी. 

1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद 44वें संविधान संशोधन के जरिए 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को रद्द कर दिया गया था. हालांकि, संविधान की प्रस्तावना में हुए बदलाव से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई थी.

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