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पोस्टपार्टम डिप्रेशन: जब अपने ही नवजात से दूरी बनाने लगती है मां, इन लक्षणों पर लें डॉक्टर से सलाह

पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक ऐसी स्थ‍ित‍ि है जो नई मांओं को भीतर तक तोड़ देती है. आइए जानते हैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन के क्या लक्षण होते हैं, इसे कैसे पहचान सकते हैं और कब मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए.

प्रतीकात्मक फोटो (Getty) प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

मां बनने का खूबसूरत अहसास भी कई बार डिप्रेशन की चपेट में आकर दुखदायी बन जाता है. गर्भ काल खत्म होने के बाद पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक ऐसी स्थ‍ित‍ि है जो नई मांओं को भीतर तक तोड़ देती है. आइए जानते हैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन के क्या लक्षण होते हैं, इसे कैसे पहचान सकते हैं और कब मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए. 

आंकड़ों के अनुसार पूरी दुनिया में एक साल में डिप्रेशन औसतन 7 लाख लोगों की जान लेता है. वैसे तो डिप्रेशन कई तरह का होता है, इसमें से एक है पोस्टपार्टम डिप्रेशन. यह प्रसव के बाद महिलाओं में हो जाता है. अक्सर देखा जाता है कि महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद स्ट्रेस में रहने लगती हैं, उनके मूड स्विंग्स होते हैं, कई बार वो बिना वजह रोने लगती है, मनोचिकित्सक कहते हैं कि ये समस्याएं अगर बढ़ जाती हैं तो ये सब पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं. 

दुनिया में हर 1000 नई मांओं में से 350-700 में ये लक्षण देखने को मिलते हैं. ये मात्र प्रसव के बाद के थकान के लक्षण नहीं हैं, ये बीमारी के लक्षण हैं जिसे अगर समय पर पहचाना ना जाए तो बड़ा रूप ले सकती है. ये बीमारी शारीरिक ना होकर मानसिक होती है और यही वजह है कि ज्यादातर लोग इसे अनदेखा कर देते हैं. 

क्या हैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण?

पोस्टपार्टम यानि बेबी ब्लूज मां और उसके बच्चे के रिश्ते पर असर डालता है. पोस्टपार्टम प्रसव के 2-3 दिन बाद से दिखना शुरू होता है और कई हफ्तों तक रह सकता है. कई बार पोस्टपार्टम डिप्रेशन के चलते मांओं में अपने ही बच्चे के प्रति अपनत्व महसूस होना कम हो जाता है. अगर समय पर इसे संभाला नहीं गया तो ये लक्षण बड़े भी हो सकते हैं जैसे माओं में खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के विचार तक आ सकते हैं. 

इन 5 लक्षणों को गंभीरता से लें 

1. भूख ना लगना
2. थकान होना
3. चिड़चिड़ापन होना
4. मूड स्विंग
5. उदासी

क्यों होता है नई मांओं में बेबी ब्लूज?

लखनऊ में नई मां और बच्चों पर शोध कर रही आरती कुमार कहती हैं कि जब तक बच्चा मां के गर्भ में रहता है तब तक वो उसी का हिस्सा रहता है. फिर बाहर आने के बाद मां को एहसास होता है कि उसके शरीर का एक भाग किसी ने बाहर निकाल दिया हो. शारीरिक रूप से मां का वो हिस्सा सामने तो होता है लेकिन पहले जैसा नहीं होता और ये भी एक वजह है कि महिला स्ट्रेस में रहने लग जाती है. अगर मां पर बेटा पैदा करने का प्रेशर हो और वो बेटी को जन्म दे तो भी मां डिप्रेशन में जा सकती है. 

पोस्टपार्टम का कारण हार्मोनल भी होता है. विशेषज्ञों की मानें तो गर्भावस्था के दौरान हॉर्मोन्स बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं लेकिन प्रसव के बाद अचानक उसका स्तर नीचे आ जाता है जिसका सीधा असर मां के मूड पर होता है. पोस्टपार्टम एक और कारण होता है परिवार का रवैया. अगर परिवार नई मां का सहयोग नहीं करता, अगर मां की नींद पूरी नहीं होती, तो भी मां का स्ट्रेस बढ़ता है जो आगे जाकर डिप्रेशन का रूप ले सकता है. बच्चे का ज्यादा रोना, माओं का सही से स्तनपान ना करा पाना और अनप्लांड प्रेगनेंसी भी अवसाद के कुछ कारण हो सकते हैं. 

क्या है पोस्टपार्टम का इलाज?

मानसिक बीमारी होने की वजह से डॉक्टर्स मरीजों को किसी मनोवैज्ञानिक के पास जाने की सलाह देते हैं. शोध के मुताबिक मां जितना ज्यादा समय अपने बच्चे के साथ व्यतीत करती हैं उतना जल्दी वो अपने अवसाद से बाहर आ सकती हैं. परिवार अगर मां का साथ दे तो भी इस स्थिति से जल्दी बाहर निकला जा सकता है. इसके अलावा कंगारू मदर केयर तकनीक भी पोस्टपार्टम के लिए कारगर साबित हुई है. 

बेबी ब्लूज नई मांओं में आम बात हो गई है लेकिन फिर भी लोग अब भी इसके प्रति उतने जागरूक नहीं हैं. हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां जब एक औरत मां बनती है तो उससे उपेक्षाएं बढ़ा दी जाती हैं. ऐसे में यदि उसमें पोस्टपार्टम डिप्रेशन के कोई लक्षण दिखते भी हैं तो वो उसे किसी से बता नहीं पाती. पहले तो उसे खुद ही पता नहीं होता कि जो एहसास उसे हो रहा है वो क्या है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि परिवार ही नई मां में हो रहे बदलाव पर नजर रखे और कोई भी असाधारण लक्षण दिखते ही सावधान हो जाये. 

 

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