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70 साल की पढ़ाई, फिर भी टॉप-100 में जगह नहीं, जानें इंड‍ियन यूनिवर्सिटीज की असल कहानी

QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग, टाइम्स हायर एजुकेशन (THE) और शंघाई एकेडमिक रैंकिंग ऑफ वर्ल्ड यूनिवर्सिटीज दुनिया की तीन सबसे बड़ी और भरोसेमंद रैंकिंग लिस्ट जो हर साल दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालयों की सूची जारी करती हैं. इन तीनों में एक बात कॉमन है: टॉप-100 में अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप और पूर्वी एशिया की यूनिवर्सिटीज छाई रहती हैं. भारत इनमें कहीं नहीं है. हाल के सालों में सबसे नजदीक IIT दिल्ली पहुंचा है लेकिन QS 2026 रैंकिंग में भी वो टॉप-120 से बाहर है.

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टॉप रैंकिंग में क्यों पिछड़ा भारत, आईआईटी स‍िस्टम पर भी उठे सवाल
टॉप रैंकिंग में क्यों पिछड़ा भारत, आईआईटी स‍िस्टम पर भी उठे सवाल

एक ऐसे देश के लिए, जो हर साल सबसे ज्यादा छात्रों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजता है ये सिर्फ रैंकिंग का आंकड़ा नहीं है बल्कि एक गहरी चुभन वाला सवाल है. अगर हमारे संस्थान 70 साल से भी ज्यादा पुराने हैं तो फिर भारत की कोई यूनिवर्सिटी दुनिया के सबसे बड़े अकादमिक मंच पर क्यों नहीं दिखती?

शिक्षा मंत्रालय के AISHE डेटा के मुताबिक भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी 53,000 से ज्यादा कॉलेज और 1,391 विश्वविद्यालय यानी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक चलाता है . हर साल लाखों छात्र इनमें पढ़ते हैं. फिर भी जब भारतीय छात्र रैंकिंग लिस्ट में 'अपने देश की' किसी टॉप यूनिवर्सिटी को ढूंढते हैं तो अक्सर निराशा ही हाथ लगती है.

दिलचस्प बात ये है कि करीब 2000 साल पहले हालात इसके उलट थे. नालंदा, तक्षशिला और वल्लभी जैसे भारतीय विश्वविद्यालयों में चीन, फारस और दक्षिण-पूर्व एशिया से छात्र पढ़ने आते थे. ये अपने समय के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय गणित, चिकित्सा, दर्शन और कानून के बड़े केंद्र थे. तो आज क्या बदल गया? और क्या 2047 तक इस स्थिति से उबरा जा सकता है?

रैंकिंग आखिर देखती क्या है?

हर ग्लोबल रैंकिंग का अपना पैमाना है.शंघाई रैंकिंग (ARWU) लगभग पूरी तरह रिसर्च पर टिकी होती है, इनमें नोबेल पुरस्कार, ज्यादा उद्धृत (highly cited) रिसर्चर और टॉप जर्नल्स में छपे शोध पत्र शामिल है. ये लिस्ट खास तौर पर पीएचडी और रिसर्च करने वाले छात्रों के लिए अहम मानी जाती है.

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टाइम्स हायर एजुकेशन (THE) रैंकिंग पढ़ाई, रिसर्च, सिटेशन, इंडस्ट्री इनकम और इंटरनेशनल मौजूदगी सबको मिलाकर आंकलन करती है. QS रैंकिंग अकादमिक प्रतिष्ठा, नियोक्ताओं की राय और रिसर्च इम्पैक्ट को ज्यादा महत्व देती है. पिछले 10 सालों के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय विश्वविद्यालय पढ़ाई की मात्रा और ग्रेजुएट्स की संख्या में तो मजबूत हैं लेकिन रिसर्च की गहराई, सिटेशन, पीएचडी आउटपुट और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में पीछे रह जाते हैं और यही चीजें रैंकिंग में सबसे ज्यादा वजन रखती हैं.

रिसर्च आउटपुट: असली समस्या

Scopus और वेब ऑफ साइंसेज जैसे डेटाबेस बताते हैं कि भारत रिसर्च पेपर बहुत छापता है, लेकिन प्रति पेपर उसका असर (citation impact) अमेरिका, चीन, जर्मनी और ब्रिटेन से काफी कम है. इसकी सबसे बड़ी वजह है फंडिंग. भारत GDP का 0.8% से भी कम रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च करता है. वहीं चीन 2.5% से ज़्यादा, अमेरिका करीब 3% और दक्षिण कोरिया 4% से भी ऊपर खर्च करता है.

कम फंडिंग का मतलब है कमजोर लैब, सीमित रिसर्च ग्रांट, कम PhD स्कॉलर और लंबे प्रोजेक्ट्स की कमी. ऊपर से भारतीय फैकल्टी पर पढ़ाने का बोझ इतना ज्यादा होता है कि गंभीर रिसर्च के लिए समय और संसाधन ही नहीं बचते.

PhD और पोस्ट-डॉक्टोरल सिस्टम की कमी

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दुनिया की टॉप यूनिवर्सिटीज PhD और पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च पर खड़ी होती हैं. हॉर्वर्ड, MIT, ऑक्सफोर्ड जैसे संस्थानों में रिसर्च का असली इंजन यही लोग होते हैं. भारत में पीएचडी छात्रों की संख्या कम है और पोस्ट-डॉक्टोरल पद लगभग न के बराबर. इससे रिसर्च की निरंतरता टूट जाती है.

यहां प्रमोशन भी अक्सर रिसर्च नहीं बल्कि सीनियरिटी और सरकारी नियमों से तय होते हैं जबकि दुनिया में प्रमोशन का आधार रिसर्च, सिटेशन और ग्रांट्स होते हैं.

अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी और संस्थागत ढांचा

रैंकिंग में विदेशी फैकल्टी, विदेशी छात्र और अंतरराष्ट्रीय रिसर्च को बहुत महत्व दिया जाता है. दुनिया की टॉप यूनिवर्सिटीज खुली भर्ती, ऊंची सैलरी और लचीले नियमों से दुनिया भर के टैलेंट को खींचती हैं. भारत में सैलरी कैप, रेगुलेशन और वीजा नियम विदेशी फैकल्टी की एंट्री मुश्किल बना देते हैं. नतीजा ये होता है कि कैम्पस ज्यादातर घरेलू बनकर रह जाते हैं. हालांकि भारत में विदेशी यूनिवर्सिटीज के कैंपस खुलना शुरू हुए हैं, लेकिन इससे ये डर भी है कि कहीं घरेलू सिस्टम और कमजोर न हो जाए.

अधूरा यूनिवर्सिटी मॉडल

IITs और ज्यादातर केंद्रीय विश्वविद्यालय शुरू से ही इंजीनियर, साइंटिस्ट और अफसर तैयार करने के लिए 'स्पेशलाइज्ड' संस्थान रहे हैं. जबकि दुनिया की टॉप यूनिवर्सिटीज इंजीनियरिंग, मेडिसिन, लॉ, सोशल साइंस, पब्लिक पॉलिसी और ह्यूमैनिटीज आदि सबको एक ही छत के नीचे जोड़ती हैं. IIT बेहतरीन इंजीनियर बनाता है लेकिन वहां मेडिकल कॉलेज, रिसर्च हॉस्पिटल या बड़ा सोशल साइंस इकोसिस्टम नहीं होता. रैंकिंग में यही बहु-विषयक (मल्टी-ड‍िस्प‍िलनरी) ताकत भारी पड़ती है.

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गवर्नेंस और ऑटोनॉमी

भारतीय विश्वविद्यालय UGC, राज्य सरकार, मंत्रालय और कई काउंसिल्स के बीच भर्ती, फीस, कोर्स और अंतरराष्ट्रीय समझौते व हर चीज पर रोक-टोक में फंसे रहते हैं. दुनिया की टॉप यूनिवर्सिटीज को अकादमिक और वित्तीय आजादी होती है. वे मौके के हिसाब से तेज फैसले ले पाती हैं. रैंकिंग इसी लचीलापन को इनाम देती है.

भारत कहां खड़ा है?

हाल के सालों में कुछ प्राइवेट यूनिवर्सिटीज जैसे अशोका यूनिवर्सिटी, OP जिंदल ग्लोबल और अमृता विश्व विद्यापीठम QS और THE की 500-1000 रेंज में दिखने लगी हैं. ये अभी टॉप-200 से दूर हैं, लेकिन इनका उभरना इसलिए अहम है क्योंकि इनके पास तेज भर्ती, विदेशी फैकल्टी और इंटरनेशनल पार्टनरशिप की आजादी है.

NEP 2020, इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमि‍नेंस जैसी नीतियां दिशा तो दिखाती हैं लेकिन रैंकिंग दशकों की रिसर्च संस्कृति को आंकती है तुरंत नतीजे नहीं. चीन को भी यहां तक पहुंचने में 20 साल से ज्यादा लगे. भारत के लिए भी ये लंबी लेकिन जरूरी दौड़ है.

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