देश में बढ़ते कोचिंग कल्चर और छात्रों पर पड़ रहे मेंटल स्ट्रेस को देखते हुए केंद्र सरकार ने स्कूल शिक्षा में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है. सरकार द्वारा बनाई गई एक समिति का मानना है कि छात्रों की पढ़ाई का बोझ कम करने और उन्हें कोचिंग पर निर्भर होने से बचाने के लिए स्कूल सिस्टम को मजबूत करना जरूरी है. इस समिति ने सुझाव दिया है कि कोचिंग क्लासेज को रोजाना सिर्फ 2 से 3 घंटे तक सीमित किया जाए. साथ ही स्कूलों के पाठ्यक्रम को JEE, NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुसार ढाला जाए, ताकि छात्रों को अलग से कोचिंग की जरूरत न पड़े.
स्कूल सिलेबस और प्रतियोगी परीक्षाओं में अंतर
समिति का कहना है कि स्कूल के सिलेबस और प्रतियोगी परीक्षाओं के पैटर्न में बड़ा अंतर है. बोर्ड परीक्षाओं में जहां लिखित और सोच-समझ पर आधारित सवाल होते हैं, वहीं प्रवेश परीक्षाओं में ऑब्जेक्टिव और मल्टीपल चॉइस सवाल पूछे जाते हैं. इसी वजह से छात्र कोचिंग की ओर मजबूर होते हैं. रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई स्कूलों में शिक्षक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं, जबकि कोचिंग सेंटर विशेषज्ञ शिक्षकों, नियमित टेस्ट और स्टडी मटेरियल की सुविधा देते हैं. यही कारण है कि छात्र स्कूल के बजाय कोचिंग पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं.
समिति ने यह भी चेतावनी दी है कि कम उम्र में ही कोचिंग शुरू करने से छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ता है. एक ही परीक्षा पर पूरा भविष्य टिका होना तनाव और डर पैदा करता है. स्कूलों में करियर गाइडेंस और काउंसलिंग की कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है.
समिति के प्रमुख सुझाव इस प्रकार हैं:
कुल मिलाकर, सरकार का फोकस यह है कि स्कूल ही छात्रों की तैयारी का मुख्य केंद्र बने, कोचिंग की जरूरत कम हो और बच्चों पर पढ़ाई का अनावश्यक दबाव न पड़े.