अक्सर माना जाता है कि जब कोई प्रोफेशनल 40 साल का होता है तो वो अपने करियर के शिखर पर होता है और उस वक्त तक उसके पास अच्छा-खासा अनुभव होता है. यहां से उसका स्ट्रगल का दौर खत्म होता है और वो प्रोफेशनल लाइफ में नई कहानियां लिखना शुरू कर देता है. लेकिन, भारत में प्रोफेशनल्स के लिए 40 साल की उम्र एक ऐसा पड़ाव बन गया है, जहां से उसके लिए करियर के रास्ते संकुचित हो जा रहे हैं.
मौजूदा चलन के हिसाब से, 40 साल की उम्र के बाद से रिक्रूटर्स के फोन आना बंद हो जाते हैं. प्रमोशन मिलना बंद हो जाते हैं. कम उम्र के कर्मचारियों को ज्यादा योग्य माना जाता है और उनमें संभावनाएं ज्यादा देखी जाने लगती हैं. भले ही बड़ी-बड़ी स्पीच में अनुभव को तरजीह दी जाती है, लेकिन जब फैसले लेने होते हैं तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है. कई प्रोफेशनल्स के लिए तो यह उम्र करियर का वो पड़ाव होता है, जब सिस्टम में बने रहना एक चुनौती होता है.
मिडलाइफ में करियर संकट
हमेशा से ये कहा जा रहा है कि कोर्पोरेट जगत में 40 की उम्र में अनुभव पावर में तब्दील होने लगता है. 40 की उम्र को लीडरशिप रोल, स्टेबिलिटी और कई तरह के अधिकार वाला माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे ये बातें गलत साबित हो रही हैं. हकीकत ये है कि हर सेक्टर में मिड करियर प्रोफेशनल नौकरी की तलाश कर रहे हैं, उन्हें लगातार रिजेक्शन मिल रहे हैं और भर्ती प्रोसेस पर सवाल उठा रहे हैं. उन्हें सुनने को मिल रहा है, 'हम किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, जो अधिक फुर्तीला हो... इस रोल के लिए फ्रेश एनर्जी वाले लोग चाहिए... आप ओवरक्वालिफाइड हैं'. इस तरह से दरकिनार है.
अनुभव ही बन रहा है बोझ
हाल ही में के एक मामला चर्चा में रहा था, जिससे ये बात सच साबित हो रही है. दरअसल, 15 साल के एक सीनियर एचआर प्रोफेशनल को कई महीनों तक बेरोजगार रहना पड़ा और उन्हें मिड लेवल की नौकरी भी नहीं मिली. इस केस में रिक्रूटर्स ने सैलरी को अड़चन बताया और कुछ का ये भी कहना था कि वो युवा टीम के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे.
अधिकतर सेक्टर्स में रिक्रूटर्स निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि 20 से 30 साल की उम्र के उम्मीदवारों के प्रति रुझान बढ़ रहा है, क्योंकि इन्हें नियुक्त करना सस्ता होता है, इन्हें प्रशिक्षित करना आसान होता है और माना जाता है कि ये नई तकनीकों को तेजी से अपना लेते हैं. स्टार्टअप से लेकर बड़ी कंपनियों में इसका ही ध्यान रखा जा रहा है. ज्यादा मुश्किल उन लोगों के लिए हो रही है, जो नाम तो CXO पद के अधिकारी हैं और ना ही युवा.
क्या कहते हैं आंकड़ें?
लिंक्डइन के अनुसार, 60 प्रतिशत से अधिक प्रोफेशनल्स ने अच्छे काम की तलाश में अपना सेक्टर या रोल ही बदल लिया है. करियर में बदलाव अब कोई अपवाद नहीं रहा, बल्कि यह एक सामान्य बात बन गई है. ज्यादा फायदा ना होने पर तीन में से एक प्रोफेशनल अपनी नौकरी छोड़ दे रहे हैं. जो कंपनियां लर्निंग और स्किल डेवलपमेंट में निवेश करती हैं, उनकी लाभप्रदता (Profitability) 22% ज्यादा होती है. लेकिन विरोधाभास ये है कि कंपनियां कहती हैं कि उन्हें अनुकूलन क्षमता चाहिए, लेकिन वे उन लोगों के लिए ग्रोथ पाथ डिजाइन नहीं कर पा रही हैं, जो पहले ही कई बार खुद को बदल चुके हैं.
एआईएमएस इंटरनेशनल के सीनियर पार्टनर आशीष धवन का कहना है, '40 साल की उम्र में महत्वाकांक्षा खत्म नहीं होती, बल्कि परिपक्व होती है. जो कंपनियां युवा कर्मचारियों को फुर्तीले होने से जोड़ती हैं, वो कुछ समय की सुविधा के लिए लंबे वक्त तक ट्रेडिंग करने का जोखिम उठाते हैं.'
उन्होंने आगे कहा, "कंपनियां युवाओं को फुर्ती और सैद्धांतिक क्षमता समझ रही हैं. आप स्पीड तो किराए पर ले सकते हैं, लेकिन निर्णय लेने की क्षमता रातोंरात नहीं मिल सकती. जब अनुभव को संपत्ति के बजाय लागत समझा जाता है, तो संगठन आज तो पैसा बचाते हैं, लेकिन कल अपनी लचीलापन खो देते हैं."
क्या 40 साल की उम्र नौकरी छोड़ने की उम्र बन गई है?
वैसे किसी पॉलिसी के हिसाब से नहीं, लेकिन प्रेक्टिस में ऐसा दिख रहा है. मिड-करियर प्रोफेशनल्स को बाहर करना आमतौर पर खुले तौर पर नहीं किया जाता. लेकिन, जॉब डिस्क्रिप्शन में कुछ ऐसी शर्तें डालकर, सैलरी बैंड को कम करके, ज़्यादा फोकस कैंपस हायरिंग पर रखकर, "कल्चर फिट" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके अनुभवी लोगों को बाहर किया जा रहा है.