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एजुकेशन न्यूज़

करियर गया, बार-बार नौकरी गई, मजदूरी से भरी फीस, पढ़‍िए एक IFS अफसर के पिता की कहानी

किशोरी लाल
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दिल्ली के अशोकनगर में रहने वाले किशोरी लाल के बुरे वक्त ने ऐसी करवट ली कि उनकी पूरी दुनिया बदल गई. कभी क्र‍िकेट में अपना करियर बनाना चाहते थे, लेकिन पिता का साया सिर से उठने के बाद उनकी दुनिया ही बदल गई. लेकिन उन्होंने हिम्मत कभी नहीं हारी, न ही हौसले का हाथ छोड़ा, अपने बच्चों की पढ़ाई मजदूरी करके कराते रहे. साल 2021 में उनके बेटे का चयन यूपीएससी में हो गया और उन्होंने IFS (Indian Foreign Service) रैंक हासिल की. आइए जानते हैं किशोरीलाल की कहानी. 

किशोरी लाल
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किशोरी लाल दलित समाज से आते हैं. अपनी पत्नी, दो बेटी और एक बेटे के साथ दिल्ली के अशोक नगर में रहते हैं. किशोरी जी बचपन से क्रिकेट के शौक़ीन थे. अच्छे प्लेयर हुआ करते थे. एक वक्त के बाद अपना प्राइवेट क्र‍िकेट क्लब शुरू किया था. पहले डिस्ट्रिक्ट और बाद में स्टेट लेवल पर लगातार 20 साल तक क्रिकेट खेला. भारत का शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जहां उन्होने क्रिकेट टूर्नामेंट ना खेला हो. बहुत तगड़ी टीम थी इनकी. मॉडर्न स्कूल बाराखंभा रोड में कपिल देव और यशपाल शर्मा के अगेंस्ट में क्रिकेट खेला. 

किशोरी लाल
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भारत का शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जहां उन्होने क्रिकेट टूर्नामेंट ना खेला हो. बहुत तगड़ी टीम थी इनकी. मॉडर्न स्कूल बाराखंभा रोड में कपिल देव और यशपाल शर्मा के अगेंस्ट में क्रिकेट खेला. लोग कहते थे कि किशोरी क्रिकेट खेलना शानदार तरीके से सिखाता है. किशोरी जी क्रिकेट की कोचिंग देनी शुरू कर दी. उनकी कोचिंग में 200 से 250 के करीब बच्चे आते थे. ट्रेनिंग ऐसी कि पूछो मत. इनके ट्रेन्ड किए हुए लड़के स्पोर्ट्स कोटे से कई सरकारी नौकरियों में गए. कुछ PTI टीचर बने, कुछ दिल्ली पुलिस में और कुछ वकील बने और कुछ की नौकरी DDA में लग गई. 

किशोरी लाल
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20 साल तक जमकर क्रिकेट खेला. अचानक पिता की मृत्यु हो गई.  परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. बीए सेकंड ईयर की पढाई चल रही थी वो बीच में ही रुक गई. तब तक शादी हो गई. कई जिम्मेदारियां आ गई और क्रिकेट हमेशा-हमेशा के लिए छूट गया. पिता की मृत्यु के बाद घर पर कोई कमाने वाला नहीं था. किशोरी घर के पास ही एक फैक्ट्री में काम करने लगे. महीने के 300 रूपये मिलते थे. सन 2000 में फक्ट्रियां सील हो गई और मजदूरी का काम छूट गया.

लक्ष्य आनंद
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किशोरी के दो बेट‍ियों के अलावा एक बेटा 'लक्ष्य आनंद' जब पैदा हुआ तब भी वो अन-स्किल्ड लेबर की तरह काम कर रहे थे. वो एक हॉस्पिटल में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते थे. वहां कुछ बात हुई तो हॉस्पिटल वाले ने नौकरी से निकाल दिया. कोई स्थाई नौकरी नहीं थी इसलिए काम मिलता-छुटता रहता था. एक प्राइवेट स्कूल में केयर टेकर की नौकरी करने लगे. अभी कोरोना के दौरान स्कूल वालों ने नौकरी से निकाल दिया. 

लक्ष्य आनंद
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किशोरी ने 20-22 साल तक मजदूरी का काम किया. 12-12 घंटे तक बिना कोई छुट्टी लिए काम करते रहे. अब उम्र ज्यादा हो जाने के कारण नौकरी मिलनी बंद हो गई.  इन सब के बीच ध्यान देने वाली बात यह थी कि किशोरी को जो काम करना पड़ा वो किया लेकिन बच्चों की पढाई नहीं रोकी. बच्चों की पढाई लगातार जारी रही. हां, कई बार यह हुआ कि मकान का किराया टाइम से ना दे पाने पर मकान मालिक ने मकान खाली करवा दिया. लक्ष्य बहुत मेहनती और पढ़ने में काफी तेज था. बेटे ने हिम्मत नहीं हारी और बाप ने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी. बेटे को खूब पढ़ाया. बेटा और बेटियां दिल्ली के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे. किशोरी जी का बेटा लक्ष्य बड़ा हो गया था. DTU से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर रहा था. परिवार की जिम्मेदारी समझने लगा. विदेशों में ऑनलाइन ट्यूशन क्लासेज देने लगा. उससे पैसे आने लगे और घर का खर्च चलने लगा. 

किशोरी लाल
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अभी कुछ दिन पहले की बात है। किशोरी जी अपने दोस्तों के साथ कहीं बैठे थे. एक फ़ोन आया और किशोरी जी रोने लगे. दोस्तों ने पूछा अरे क्या हो गया? तू अभी तो ठीक था अचानक रोने क्यूं लगा? किशोरी जी बोले मेरा बेटा IFS बन गया. ये वो दिन था जिस दिन से कोशिरी जी के जीवन की पूरी कहानी बदल गई. किशोरी जी बताते हैं- पहले मुंह में ज़ुबान तो थी लेकिन बोलने लायक नहीं थी. आज बोलने लायक है.  जो कभी बात नहीं करते थे आज मुझसे बात करते हैं जो कल तक पूछते नहीं थे आज वो अपनी कार रोक देते हैं. 

(All Photo: twitter@rahulp_pandey)