गांधीवादी अहिंसक मार्ग के बजाय सशस्त्र क्रांति को चुनने के बाद, भारत के महानतम सपूतों में से एक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जनवरी 1941 में देश को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. तय योजना के मुताबिक, नेताजी कालका मेल में सवार हुए, अपने रास्ते पर निकल पड़े. कालका मेल भारत की सबसे पुरानी एक्सप्रेस ट्रेन है और जल्द ही 160 वर्ष पूरे करने वाली है.
नेताजी कलकत्ता के एक घर के एकांतवास में रह रहे थे. उन पर अंग्रेजों की पैनी नजर थी. इसिलए वह एक कमरे में पर्दे के पीछे अकेले रहते थे. वह बाघ की खाल पर पालथी मारकर बैठे और चंडी की एक पवित्र पुस्तक के सामने योग करते हुए उनकी दाढ़ी बढ़ती जा रही थी. वह दिन में सिर्फ एक बार भोजन करते थे. वह सिर्फ दूध और फल खाते. उनका भतीजा चुपचाप खाना पर्दे के पीछे रख देते थे. नेता जी के पास जाने की अनुमति सिर्फ उनके भतीजे को थी. एक सुबह जब भतीजे ने पर्दे के पीछे खाना रखा तो वो काफी देर तक वहीं पड़ा रहा. आखिरकार जब पर्दा उठाया गया तो पता चला कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने एल्गिन रोड स्थित घर से जा चुके थे.
पुलिस की विशेष शाखा ने अपनी रिपोर्ट में यह दर्ज किया है. नेताजी भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने पथ पर निकल पड़े थे. निकलते समय वह अपने गर्म कपड़े, कलम, यहां तक कि जूते भी पीछे छोड़ गए थे. कई लोग इसे नेताजी का "महान पलायन" कहते हैं.
44 की उम्र तक पहुंचने के कुछ ही दिन पहले, 17 जनवरी को सुबह 1:30 बजे, नेताजी अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस के साथ निकले. शिशिर कुमार बोस उन्हें अपनी जर्मन वांडरर सेडान कार में बिठाकर बिहार के गोमोह (अब झारखंड में) ले गए. उन्होंने इसे भागने की बजाय एक नए भारत के निर्माण की दिशा में एक बड़ी छलांग बताया. राजद्रोह के मुकदमे के दौरान नेताजी जैसे कद के राष्ट्रवादी नेता के भाग जाने से ब्रिटिश अधिकारियों को बेहद शर्मिंदगी उठानी पड़ी.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिस ट्रेन में सवार हुए थे, वह भारत की पहली मेल/एक्सप्रेस ट्रेन थी. यह उत्तर प्रदेश हावड़ा-दिल्ली ईस्ट इंडियन रेलवे मेल थी और उसमें सवार यात्रियों में मोहम्मद जियाउद्दीन भी थे, जो पठानी कोट, पायजामा और अर्धचंद्राकार चश्मे पहने हुए थे. इस वजह से किसी का ध्यान उन पर नहीं गया. मोहम्मद जियाउद्दीन के रूप में वह ट्रेन यात्रा विश्वव्यापी सफर का हिस्सा बनी, जो आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा इंडियन नेशनल आर्मी (आजाद हिंद फौज) की स्थापना के रूप में सामने आई.
पहले कालका मेल हावड़ा और दिल्ली के बीच चलती थी. बाद में, हिमालय की तलहटी में स्थित कालका के रेलवे से जुड़ने के बाद, इसका नाम बदलकर कालका मेल कर दिया गया. यह ट्रेन तत्कालीन राजधानी कलकत्ता से ब्रिटिशों को उनकी ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला तक ले जाती थी. 2021 में सुभाष चंद्र बोस के सम्मान में इस ट्रेन का नाम बदलकर नेताजी एक्सप्रेस कर दिया गया.
कुछ महीनों बाद, अप्रैल में, कालका मेल, जिसे सभी इसी नाम से पुकारते हैं, भारत के हावड़ा-दिल्ली मुख्य मार्ग पर 160 वर्षों की निर्बाध यात्रा पूरी कर लेगी. नेताजी के गोमोह छोड़ने के कुछ दिनों बाद, उन्होंने एक अन्य ट्रेन, फ्रंटियर मेल, से पेशावर की यात्रा की. 26 जनवरी को, जब नेताजी संभवतः ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र से बाहर निकल चुके थे, तब दुनिया को पता चला कि नेताजी अपने कलकत्ता स्थित घर से लापता हो गए थे.
कालका मेल में सवार होने के दस दिन बाद नेताजी ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र से बाहर स्थित काबुल पहुंचे. अखिल फॉरवर्ड ब्लॉक के नेताओं की सहायता से नेताजी मार्च 1941 तक मध्य एशिया के सोवियत गणराज्यों से होते हुए मॉस्को पहुंचे. एक महीने बाद वे बर्लिन में थे, जहां उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना शुरू किया.
आज, शुक्रवार, 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती है. बोस को याद करने के लिए किसी विशेष अवसर की आवश्यकता नहीं है, लेकिन जयंती उनकी स्मृतियों को ताजा करने का एक माध्यम है. 44 वर्ष की आयु में नेताजी अपने राजनीतिक जीवन के शिखर पर थे. उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय अपनी लड़ाई को चुना. उनका पलायन कोई गुमशुदा होना नहीं था, बल्कि एक ऐसी आवश्यकता थी जिसे उन्होंने पूरा करना अनिवार्य समझा.
नेताजी ने 1941 में भारत क्यों छोड़ा?
1941 की शुरुआत तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस राजनीतिक रूप से घिर चुके थे. कांग्रेस ने अनिच्छा से द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना भेजने का फैसला किया. कांग्रेस अध्यक्ष पद से उनके इस्तीफे, फॉरवर्ड ब्लॉक के गठन और उनके अडिग रुख ने उन्हें ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों का प्रमुख निशाना बना दिया था. बोस ने ब्रिटिशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उन्हें जेल भेज दिया गया.
अमेरिकी इतिहासकार पीटर वार्ड फे ने अपनी पुस्तक 'द फॉरगॉटन आर्मी' में लिखा है, बरसात के मौसम और शरद ऋतु के दौरान उन्होंने अपनी जेल का दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली और उनकी हताशा बढ़ती गई. नवंबर के अंत में उन्होंने कानूनी दांव-पेच छोड़ दिए और गांधीजी के विचारों को अपनाते हुए अपने जेलरों से कहा कि अब से वे कुछ नहीं खाएंगे और केवल पानी पीएंगे. कहीं वे बीमार न पड़ जाएं और उनकी देखरेख में मर न जाएं, इस डर से जेलरों ने उन्हें एल्गिन रोड स्थित पारिवारिक घर में छोड़ दिया, जहां बाहर पुलिस चौकियों से उन पर नजर रखी जा सकती थी.
फे ने आगे कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध ने वैश्विक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया था और बोस का मानना था कि भारत की स्वतंत्रता संवैधानिक धैर्य की प्रतीक्षा नहीं कर सकती. हालांकि, प्रतीक्षा करना निष्प्रभावी रहा. नेताजी के सामने सवाल यह नहीं था कि कार्रवाई करनी है या नहीं, बल्कि यह था कि कैसे करनी है.
सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश भारत से अलग होने का प्लान कैसे बनाया?
नेताजी का प्लान अनुशासन, छल और समय के तालमेल पर आधारित थी. यह योजना तात्कालिक नहीं थी, लेकिन परिवार के एक सदस्य के बयान से पता चलता है कि बोस ने अंग्रेजों से भागने की प्लानिंग काफी पहले 1939 में ही कर ली थी. इसके लिए भेष बदलना जरूरी था. चाचा के बाएं कान के ठीक नीचे एक तिल हुआ करता था, जो उनके चेहरे की सबसे प्रमुख और विशिष्ट पहचान थी. अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन के बीच भी, उन्होंने चुपचाप आवश्यक ऑपरेशन करवाकर तिल हटवा लिया. 1939 के अंत तक, उसका हल्का सा निशान भी गायब हो गया था. अब तिल से उनकी पहचान नहीं हो सकती थी. यह माना जा सकता है कि चाचा ने अंग्रेजों के चंगुल से भागने की अपनी भावी योजनाओं के मद्देनजर ऐसा किया था. नेताजी के भतीजे अशोक नाथ बोस ने अपनी पुस्तक 'माई अंकल नेताजी' में ये सब लिखा है.
अशोक नाथ बोस ने आगे बताया कि उन्होंने उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत में पठानों द्वारा पहने जाने वाले स्टाइल में भारी ऊनी कपड़े से नए कपड़े सिलवाए और एक फेज (सिर पर पहनने वाली टोपी) भी बनवाई.
1940 में रिहाई के बाद, बोस ने एकांतवास में चले गए. दाढ़ी बढ़ा ली और आध्यात्मिक साधना का बहाना बनाकर सभाओं से दूर रहने लगे. उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि वे वह नेता नहीं थे जिसकी अंग्रेजों को तलाश थी. एक छोटी सी चूक भी सब कुछ खत्म कर सकती थी. उन्होंने अपने परिवार के कुछ सदस्यों और कुछ राजनीतिक सलाहकारों पर भरोसा किया.
मियां अकबर शाह, आबाद खान और भगत राम तलवार जैसे फॉरवर्ड ब्लॉक के नेताओं ने नेताजी को ब्रिटिश भारत से "ग्रेट एस्केप" करने में सहायता की. उत्तर पश्चिम सीमांत क्षेत्र के पठान नेता मियां अकबर शाह ने जनवरी 1941 में नेताजी के घर छोड़ने से एक महीने पहले कलकत्ता में उनसे मुलाकात भी की थी.
भतीजे शिशिर कुमार बोस के अनुसार, जिन्होंने नेताजी को अपनी कार में बिठाकर प्रस्थान कराया, प्रस्थान की रात नेताजी बिल्कुल शांत थे. दक्षिण एशिया से फैक्चुअल कंटेंट के विश्व के सबसे बड़े कलेक्शन, वाइल्डनेस फिल्म्स के अर्काइव से प्राप्त एक इंटरव्यू में शिशिर कुमार बोस ने कहा कि मैं बहुत तनाव में था, चूंकि मैं स्वयं बहुत संकोची व्यक्ति था, इसलिए कम से कम बाहरी रूप से तो मैं बहुत शांत था और उन्होंने अपने कमरे से निकलने से लेकर कुछ दिनों बाद भारतीय सीमा पार करने तक, पूरी योजना को बारीकी से तैयार किया था.शिशिर को विशेष रूप से इसलिए चुना गया था क्योंकि वह ब्रिटिश राज की नजरों से छिपा हुआ था और एक भरोसेमंद ड्राइवर था जिसमें यात्रा के लिए जरूरी धैर्य था.
नेताजी की विदाई को ज़मीनी स्तर पर कैसे अंजाम दिया गया
नेताजी की शिशिर कुमार बोस के साथ कलकत्ता से लगभग 300 किलोमीटर उत्तर में स्थित गोमोह तक की कार यात्रा लंबी, ठंडी और तनावपूर्ण थी. उनके एक अन्य भतीजे, अशोक नाथ बोस, की उस समय धनबाद के कोयला क्षेत्र में तैनाती थी. यही नेताजी का अगला पड़ाव बना. धनबाद गोमोह से लगभग 30 किलोमीटर दूर है, जहां से उन्होंने कालका मेल ट्रेन पकड़ी, लेकिन गोमोह ही एकमात्र विकल्प नहीं था. आसनसोल और धनबाद भी विकल्पों की सूची में थे. लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि वे बड़े शहर थे और वहां पुलिस की अच्छी खासी मौजूदगी थी.
300 किलोमीटर की यात्रा के बाद, पूरा दिन एक सुनियोजित नाटक की तरह बीता. अशोक नाथ बोस ने लिखा है कि 17 जनवरी, 1941 को सुबह लगभग 7 बजे, मेरे भाई शिशिर कुमार बोस धनबाद के पास बरारी स्थित मेरे बंगले में आए और मुझे बताया कि वे चाचा को भेष बदलकर कलकत्ता से लाए हैं. उन्होंने आगे बताया कि शिशिर ने नेताजी को जानबूझकर लगभग एक मील दूर छोड़ा और बंगले का रास्ता बताया ताकि किसी भी नौकर को शक न हो.
कुछ मिनटों बाद, मेरे नौकर ने एक अजनबी के आने की सूचना दी. नौकर द्वारा लाए गए विजिटिंग कार्ड में उनका नाम मोहम्मद जियाउद्दीन, ट्रैवलिंग इंस्पेक्टर, एम्पायर ऑफ इंडिया लाइफ एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड लिखा था. अशोक नाथ बोस ने बताया कि उनका वेश इतना सधा हुआ था कि उन्हें पहचानना लगभग नामुमकिन था.
सुभाष बोस के लापता होने की खबर उनके प्रस्थान के नौ दिन बाद 27 जनवरी, 1941 की सुबह लगभग 2 बजे से 3 बजे के बीच 'द हिंदुस्तान स्टैंडर्ड' अखबार तक पहुंची. एसोसिएटेड प्रेस के एक संवाददाता ने एक दिन पहले बोस के सचिव से बात की थी. लेकिन कलकत्ता पुलिस की स्पेशल ब्रांच की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की पकड़ से बचकर निकल चुके हैं.
नेताजी ने ब्रिटिश भारत से निकलने के लिए गोमोह को क्यों चुना ?
बरारी स्थित बंगले में इसके बाद पूरा दिन लगातार नाटक चलता रहा. नेताजी एक अतिथि अधिकारी की तरह प्रतीक्षा करते, बोलते, चाय पीते और विश्राम करते रहे. संदेह से बचने के लिए बातचीत सावधानीपूर्वक अंग्रेजी में की गई. शाम ढलते ही नेताजी की एक्टिंग अंतिम चरण में पहुंच गई.
खाना जल्दी परोसा गया. अंग्रेजी में औपचारिक विदाई हुई और नेताजी टैक्सी पकड़ने के बहाने पैदल ही निकल गया. आधे घंटे बाद, यात्रा फिर से शुरू हुई, जब अंधेरी सड़क पर गोमोह की ओर जाने वाली कार ने नेताजी को अपने साथ लिया. अशोक ने गौर किया कि बाकी का माहौल भावुक था, लेकिन बाहरी तौर पर शांत था.
अशोक नाथ बोस ने लिखा कि चाचा ने हमें बताया कि वे पेशावर होते हुए काबुल और फिर वहां से मॉस्को और अंततः बर्लिन जा रहे थे. उन्होंने आगे बताया कि वे दिल्ली-कालका मेल में सवार होंगे, लेकिन दिल्ली पहुंचने से पहले किसी रास्ते के स्टेशन पर उतर जाएंगे ताकि राजधानी को बाईपास कर सकें और फिर फ्रंटियर मेल से पेशावर जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनकी भागने की बात को 8 या 9 दिनों तक गुप्त रखा जा सके, तो उन्हें उम्मीद है तब तक वे ब्रिटिश भारतीय सरकार की पकड़ से बाहर हो जाएंगे.
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हावड़ा-दिल्ली मेल, जो साम्राज्य की जीवनरेखा थी, साम्राज्य के सबसे वांछित व्यक्तियों में से एक और भारत के महानतम सपूतों में से एक को ले गई. गोमोह से बोस दिल्ली और उसके आगे की यात्रा पर निकले, बाद में पेशावर के लिए फ्रंटियर मेल में सवार हो गए. निगरानी को लेकर इतना आश्वस्त औपनिवेशिक राज्य को इस चूक का एहसास तब हुआ जब बहुत देर हो चुकी थी.
भारत से निकलकर जब वो जर्मनी पहुंचे तो उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया. उन्होंने फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की. इसका भारत में प्रसारण किया और धुरी शक्तियों पर भारत को एक अत्यावश्यक राजनीतिक मुद्दा मानने का दबाव डाला. उनके युद्धकालीन गठबंधनों के बारे में चाहे जो भी राय हो, बोस ने वह कर दिखाया जो कुछ ही भारतीय नेता कर पाए थे.
भारत की सबसे पुरानी एक्सप्रेस ट्रेन, कालका मेल, देश से भी पुरानी है. कालका मेल, जिसके जरिए नेताजी भारत से विदा हुए थे, आधुनिक स्वरूप में भारतीयता और राष्ट्रवाद से भी पहले की है.
ये है कालका मेल की कहानी
ईस्ट इंडियन रेलवे द्वारा 1866 में शुरू की गई यह ट्रेन शुरुआत में हावड़ा और दिल्ली के बीच चलती थी. बाद में, कालका मेल के रूप में इसने शाही राजधानी कलकत्ता को ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला से जोड़ा. दशकों बीतने के साथ, राजशाही का पतन हुआ, राजधानियों के नाम बदले गए और सरकारें बदलती रहीं, लेकिन ट्रेन चलती रही। जनवरी 2021 में, केंद्र ने बोस की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में और उनके भागने में तथा स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका को सम्मानित करने के लिए इसका नाम बदलकर नेताजी एक्सप्रेस कर दिया.इस अप्रैल में, कालका मेल अपनी निर्बाध सेवा के 160 वर्ष पूरे कर लेगी.