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दिल्ली के MCD से कितना अलग है मुंबई का BMC? वहां मेयर के पास हैं इतनी पावर

मुंबई महानगरपालिका (BMC) का चुनाव अभी चर्चा में हैं. महाराष्ट्र के 29 नगर निगम के साथ बीएमसी में भी चुनाव संपन्न हो चुका है. अब मुंबई के मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव होगा. ऐसे में समझते हैं कि मुंबई और दिल्ली में मेयर कैसे चुने जाते हैं और इनका हिसाब-किताब क्या है?

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बीएमसी और एमसीडी में मेयर के पास कितनी ताकत होती है (Photo - Pexels)
बीएमसी और एमसीडी में मेयर के पास कितनी ताकत होती है (Photo - Pexels)

मुंबई महानगरपालिका का चुनाव संपन्न हो चुका है. सभी काउंसलर चुन लिए गए हैं, अब सिर्फ मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव होना बाकी है. क्योंकि, मुंबई में मेयर का सीधे चुनाव नहीं होता है. यहां हर वार्ड से पार्षद (काउंसलर) का चुनाव होता है. फिर सभी पार्षद मिलकर मेयर और डिप्टी मेयर चुनते हैं. ठीक इसी तरह दिल्ली नगर निगम (MCD) के मेयर का भी चुनाव होता है. वहां भी चुने हुए वार्ड मेंबर्स मेयर का चुनाव करते हैं.    

मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन और दिल्ली नगर निगम में कई अंतर है. मुंबई में जो मेयर चुने जाते हैं उनका कार्यकाल 2.5 वर्षों का होता है. इसलिए एक पार्षद अपने कार्यकाल में वहां दो बार मेयर को चुनता है. यहां मेयर का मुख्य काम नगर निगम की मीटिंग्स अध्यक्षता करना होता है.

बीएमसी और एमसीडी में क्या अंतर है?
वहीं मुंबई के मामले में  दिल्ली की स्थिति थोड़ी अलग है. क्योंकि यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है और यहां नगर निगम का गठन विधान सभा-संसद के कानूनों के तहत होता है. इसलिए मेयर के चुनाव में पार्षदों के साथ-साथ इनकी भी अहम भूमिका होती है.वहीं दिल्ली में मेयर का कार्यकाल आमतौर पर लगभग 1 वर्ष का होता है. यहां हर साल मेयर का चुनाव होता है और सभी पार्षद मिलकर चुनते हैं. हर साल मेयर चुनने का एक रोटेशन होता है. इसके तहत  महिला, सामान्य वर्ग और एससी-एसटी का क्रम निर्धारित होता है. 

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मुंबई और दिल्ली के नगर निकाय में और भी की समानताएं हैं. दोनों ही जगह अप्रत्यक्ष तरीके से मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव होता है. दोनों ही जगह कुछ सदस्यों को मनोनीत किया जाता है. मुंबई और दिल्ली में कॉरपोरेशन अलग-अलग कमेटियों का गठन करती है.

दोनों जगह मेयर के पास कितनी ताकत होती है
मुंबई और दिल्ली दोनों ही जगह के मेयर बहुत ताकतवर समझे जाते हैं, लेकिन असल शक्ति किसी और के पास होती है. मुंबई और दिल्ली दोनों ही महानगरों  मेयर की शक्तियां बहुत सीमित रहती हैं. इनके पास कोई प्रशासनिक शक्ति नहीं होती है. असली नियंत्रण नगर आयुक्त और राज्य सरकार के हाथ में होता है, जो प्रशासनिक, वित्तीय और अन्य दूसरे फैसले लेते हैं.

मुंबई या दिल्ली के मेयर बजट तैयार नहीं कर सकते हैं. परियोजनाओं को मंज़ूरी देना या शहर की नीति स्थापित करना उसका अधिकार नहीं है. असली  निर्णय नगर आयुक्त लेते हैं, जो राज्य सरकार की ओर से नियुक्त किए जाते हैं. 

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