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3 शहर, 3 जेलें, 3 फंदे...आज ही शहीद हुए थे बिस्मिल-अश्फाक और रोशन सिंह

इतिहास के पन्नों में ऐसे भी क्रांतिकारियों का नाम भी दर्ज है, जिनका जन्म स्थान एक ही है और वह एक दिन फांसी के फंदे पर देश के लिए लटक गए. जानिए- उनके बारे में...

काकोरी कांड के 3 क्रांतिकारी काकोरी कांड के 3 क्रांतिकारी

  • काकोरी कांड में शाहजहांपुर के इन तीन बेटों की दी गई थी फांसी
  • फांसी के लिए चुनी गई थी गोरखपुर, फैजाबाद, इलाहाबाद की जेल

आज के ही रोज 19 दिसंबर 1927 को भारत के शहीद क्रांतिकारियों अशफाक उल्ला खां, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा दी गई थी. तीनों क्रांतिकारियों को ये सजा काकोरी कांड के लिए दी गई थी जिसमें ये दोषी पाए गए थे. आपको बता दें, तीनों की फांसी की सजा एक ही तारीख पर दी गई थी. लेकिन फांसी के लिए तीन अलग- अलग जेल चुनी गई थीं.

- अशफाक उल्ला खां को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में फांसी की सजा दी गई थी.

-  पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को फैजाबाद जेल में फांसी की सजा दी गई थी.

- ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल में फांसी दी गई थी.

एक ही जगह हुआ था तीनों क्रांतिकारियों का जन्म

आप इसे महज इत्तेफाक ही मान सकते हैं. अशफाक उल्ला खां, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह का जन्म एक जगह पर हुआ और फांसी भी एक दिन दी गई. तीनों का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था.

कैसे हुआ था काकोरी कांड

काकोरी कांड की घटना 9 अगस्त 1925 के दिन को हुई थी. रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 8 अगस्त, 1925 को क्रांतिकारियों की एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें योजना बनाई गई कि सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन काकोरी स्टेशन पर आने वाली ट्रेन को लूटना है जिसमें सरकारी खजाना था. क्रांतिकारी जिस धन को लूटना चाहते थे, दरअसल वह धन अंग्रेजों ने भारतीयों से ही हड़पा था. 

इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउजर पिस्टल भी इस्तेमाल किए गए और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के केवल 10 सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था. इस दौरान हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को चेन खींचकर रोक लिया था.  

इसी दौरान क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रैगर दबा दिया. जिससे गोली चली और अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गई. मौके पर ही उसकी मौत हो गई. इस घटना के दौरान सभी क्रांतिकारियों ने अपना नाम बदल दिया था. अशफाक उल्ला खां ने अपना नाम 'कुमारजी' रखा था. जैसे ही ब्रिटिश सरकार को इस घटना के बारे में मालूम चला वह पागल हो गई थी. जिसके बाद कई निर्दोषों को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया था.

26 सितंबर 1925 के दिन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के करीब 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था. उनके खिलाफ राजद्रोह करने, सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने और मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया गया. बाद में राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी.

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